सोने को लेकर इस वक्त एक दिलचस्प तस्वीर सामने आ रही है. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ रही हैं. डॉलर को सपोर्ट मिल रहा है और अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड भी ऊंची है. आम तौर पर ऐसी स्थिति सोने के लिए अच्छी नहीं मानी जाती. लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग दिखाई दे रही है.
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अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने के बावजूद सोना पूरी तरह नहीं टूटा है. बल्कि Standard Chartered का मानना है कि सोने के पीछे कुछ ऐसी ताकतें काम कर रही हैं, जो इसकी कीमत के नीचे एक मजबूत सहारा यानी solid floor बना रही हैं.
सवाल है कि आखिर वो ताकतें कौन सी हैं. और अगर अमेरिका में ब्याज दरें आगे और बढ़ती हैं, तो क्या सोना फिर भी ऊपर जा सकता है.
22 सितंबर को क्या रहा सोने का भाव
सबसे पहले सोने की कीमत पर नजर डालते हैं. 22 सितंबर को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर 5 अक्टूबर 2026 की डिलीवरी वाला सोना ₹670 की गिरावट के साथ ₹1,52,424 प्रति 10 ग्राम पर ट्रेड कर रहा था.
अब बात करते हैं अमेरिकी Federal Reserve की. अमेरिकी फेड ने पिछले हफ्ते ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की थी.
आमतौर पर ब्याज दर बढ़ने पर सोने पर दबाव आता है. इसकी वजह यह है कि जब अमेरिकी बॉन्ड और दूसरे ब्याज देने वाले निवेश ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं, तो सोने जैसे ऐसे एसेट की मांग प्रभावित हो सकती है, जो खुद कोई ब्याज नहीं देता.
लेकिन Standard Chartered के मुताबिक इस बार सोने और real interest rates के बीच पुराना रिश्ता कमजोर होता दिखाई दे रहा है.
यानी पहले अगर real interest rates बढ़ते थे, तो सोने पर ज्यादा दबाव देखने को मिलता था. लेकिन अब सोना उतना संवेदनशील नहीं दिख रहा.
Fed की rate hike के बाद सोने में जो गिरावट आई थी, उससे सोना काफी हद तक वापस उबर चुका है. अब बाजार की नजर technical support पर है, खासकर 50-day moving average के आसपास.
50-day moving average क्यों है अहम
50-day moving average को बाजार में एक तरह के औसत भाव के स्तर के तौर पर देखा जाता है. अगर सोना इस स्तर के आसपास टिकता है, तो ट्रेडर्स इसे एक अहम technical support के तौर पर देख सकते हैं.
लेकिन सोने की कहानी सिर्फ चार्ट तक सीमित नहीं है. Standard Chartered के मुताबिक निवेशकों का ध्यान अब short-term ब्याज दरों से हटकर कुछ बड़े और लंबे समय वाले मुद्दों पर जा रहा है.
इनमें de-dollarization, currency debasement और market intervention का जोखिम प्रमुख हैं.
De-dollarization से सोने को कैसे फायदा
De-dollarization का आसान मतलब है कि दुनिया के कुछ देश और केंद्रीय बैंक डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं.
वहीं currency debasement का मतलब मुद्रा की purchasing power यानी खरीदने की ताकत कमजोर होने की चिंता से है.
ऐसे माहौल में सोने को एक वैकल्पिक reserve asset के तौर पर देखा जाता है. यही वजह है कि Standard Chartered का मानना है कि official sector यानी केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीद कीमतों को नीचे जाने से रोकने में लगातार मदद कर रही है.
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