Gold Price Outlook: 2026 तक 4,900 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकता है सोना? Goldman Sachs ने बताई बड़ी वजह, सेंट्रल बैंकों की खरीदारी बनी सबसे बड़ा सहारा

तनीषा त्यागी

• 06:37 PM • 21 Jul 2026

गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि 2026 तक सोना 4,900 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकता है. जानिए सेंट्रल बैंकों की खरीदारी, चीन की चाल और ब्याज दरें क्यों अभी सबसे अहम हैं.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

मई में दुनिया के सेंट्रल बैंकों ने करीब 81 टन सोना खरीदा

चीन ने अकेले 48 टन जोड़कर खरीदारी में सबसे बड़ा हिस्सा लिया

तीन महीनों में औसत मासिक खरीद 67 टन रही, पुराना स्तर पीछे

सोने की कीमतों को लेकर एक बार फिर बड़ा अनुमान सामने आया है. दुनिया की प्रमुख इन्वेस्टमेंट बैंकिंग संस्थाओं में शामिल Goldman Sachs का मानना है कि अगर मौजूदा ट्रेंड जारी रहता है, तो साल 2026 के अंत तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 4,900 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है. भारतीय कीमतों में देखें तो यह स्तर लगभग 1.52 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के बराबर बैठता है. हालांकि वास्तविक घरेलू कीमतें टैक्स, प्रीमियम और अन्य बाजार कारकों के आधार पर अलग हो सकती हैं. रिपोर्ट का सबसे अहम संदेश यह है कि सोने की तेजी सिर्फ निवेशकों की खरीदारी पर निर्भर नहीं है. इसके पीछे दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों की लगातार बढ़ती खरीदारी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रही है.

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सेंट्रल बैंक लगातार बढ़ा रहे हैं गोल्ड रिजर्व

Goldman Sachs के अनुसार मई महीने में दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों ने करीब 81 टन सोना खरीदा. इनमें सबसे बड़ा योगदान चीन का रहा, जिसने अकेले 48 टन गोल्ड अपने रिजर्व में जोड़ा रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन महीनों के दौरान सेंट्रल बैंकों की औसत खरीदारी करीब 67 टन प्रति महीना रही है. यह आंकड़ा 2022 से पहले की औसत खरीदारी 17 टन प्रति महीने की तुलना में कई गुना अधिक है. इससे साफ संकेत मिलता है कि कई देश अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ा रहे हैं.

आखिर इतनी तेजी से सोना क्यों खरीद रहे हैं देश?

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा सुरक्षित और संतुलित बनाने की रणनीति पर काम कर रही हैं. रूस की विदेशी संपत्तियों पर 2022 में हुई कार्रवाई के बाद कई देशों ने अपने रिजर्व मैनेजमेंट की नीति में बदलाव शुरू किया. अब केवल डॉलर पर निर्भर रहने के बजाय कई देश सोने को एक रणनीतिक रिजर्व एसेट के रूप में देख रहे हैं. इसके साथ ही बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और वित्तीय जोखिमों ने भी गोल्ड की अहमियत बढ़ा दी है.

Goldman Sachs को क्यों दिख रही लंबी तेजी?

ब्रोकरेज का मानना है कि सेंट्रल बैंक अल्पकालिक मुनाफे के लिए सोना नहीं खरीद रहे हैं. उनकी खरीदारी लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा है. यही वजह है कि यह मांग बाजार को मजबूत आधार देती है और कीमतों में बड़ी गिरावट आने की संभावना को सीमित कर सकती है. Goldman Sachs का कहना है कि रिजर्व डाइवर्सिफिकेशन, भू-राजनीतिक तनाव और निजी निवेशकों की अभी भी कम हिस्सेदारी जैसे कारक आने वाले समय में सोने को मजबूत समर्थन दे सकते हैं.

शॉर्ट टर्म में दबाव क्यों रह सकता है?

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि निकट भविष्य में सोने पर कुछ दबाव बना रह सकता है. अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख बनाए रखता है, तो गोल्ड ETF में निवेश कुछ समय के लिए कमजोर रह सकता है. ऊंची ब्याज दरों की उम्मीदें भी सोने की चाल को प्रभावित कर सकती हैं. हालांकि Goldman Sachs का मानना है कि यह दबाव स्थायी नहीं होगा और मध्यम अवधि में बाजार का रुख फिर से मजबूत हो सकता है.

2026 तक कितना महंगा हो सकता है सोना?

Goldman Sachs ने साल 2026 के अंत तक सोने का लक्ष्य 4,900 डॉलर प्रति औंस रखा है. मौजूदा डॉलर-रुपया विनिमय दर के आधार पर यह कीमत भारतीय बाजार में लगभग 1.52 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के बराबर बैठती है. यह अनुमान इस धारणा पर आधारित है कि सेंट्रल बैंकों की खरीदारी मजबूत बनी रहेगी, उभरते देश अपने रिजर्व में विविधता लाते रहेंगे और समय के साथ निजी निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ेगी.

भारतीय बाजार में क्या है स्थिति?

खबर लिखे जाने तक 5 अगस्त 2026 एक्सपायरी वाला MCX गोल्ड करीब 1.16 फीसदी की तेजी के साथ लगभग 1.43 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था. इससे साफ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत संकेतों का असर घरेलू बाजार में भी दिखाई दे रहा है.

निवेशकों के लिए क्या संकेत हैं?

Goldman Sachs की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि सोने का मौजूदा ट्रेंड केवल शॉर्ट टर्म तेजी नहीं, बल्कि लंबी अवधि की संरचनात्मक मजबूती का हिस्सा हो सकता है. यदि सेंट्रल बैंकों की खरीदारी इसी तरह जारी रहती है और वैश्विक अनिश्चितता बनी रहती है, तो सोने की कीमतों को आगे भी मजबूत समर्थन मिल सकता है. हालांकि निवेशकों के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों, वैश्विक ब्याज दरों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि निकट अवधि में यही कारक कीमतों में उतार-चढ़ाव की दिशा तय कर सकते हैं.