Gold Price Forecast 2026: क्या 10 ग्राम सोना ₹1.84 लाख तक पहुंच सकता है? J.P. Morgan का अनुमान.

तनीषा त्यागी

• 05:37 PM • 12 Aug 2026

J.P. Morgan के अनुमान से सोना फिर चर्चा में है. जानिए 2026 में भाव कहां तक जा सकते हैं और भारत में 10 ग्राम सोने की कीमत पर क्या असर पड़ सकता है.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

साल की शुरुआत में सोने ने तेज बढ़त दिखाई, फिर नरमी आई

भारत में 10 ग्राम सोना अभी करीब ₹1.54 लाख पर दिखा

आधिकारिक आंकड़ों से कम, वैकल्पिक डेटा में केंद्रीय खरीद मजबूत दिखी

Gold News : सोने की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है. 2026 की शुरुआत में गोल्ड ने शानदार प्रदर्शन किया था, हालांकि इसके बाद कीमतों में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला. अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या सोना इस साल फिर से अपने ऑल-टाइम हाई के आसपास पहुंच सकता है और अगर तेजी जारी रहती है तो इसकी कीमत कहां तक जा सकती है. जे.पी. मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च ने गोल्ड को लेकर एक ऐसा अनुमान दिया है, जिसने निवेशकों का ध्यान खींचा है. रिसर्च के मुताबिक, 2026 के अंत तक गोल्ड प्राइस करीब 6,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है. वहीं 2027 के अंत तक कीमत 6,300 डॉलर प्रति औंस तक जाने की संभावना जताई गई है. हालांकि, यह सिर्फ एक अनुमान है और इसके रास्ते में कई बड़े जोखिम भी मौजूद हैं. फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति, भू-राजनीतिक तनाव, ब्याज दरें और केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी आने वाले समय में सोने की दिशा तय करने वाले प्रमुख फैक्टर रहेंगे.

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जे.पी. मॉर्गन का गोल्ड प्राइस टारगेट रुपये में कितना है?

जे.पी. मॉर्गन के 6,000 डॉलर प्रति औंस के अनुमान को अगर करीब 95.44 रुपये प्रति डॉलर के कन्वर्जन रेट से भारतीय रुपये में देखें, तो यह लगभग 5.73 लाख रुपये प्रति ट्रॉय औंस बैठता है. वहीं 2027 के लिए 6,300 डॉलर प्रति औंस का अनुमान करीब 6.01 लाख रुपये प्रति ट्रॉय औंस के बराबर है. अब इसे भारतीय निवेशकों के लिए आसान भाषा में 10 ग्राम के हिसाब से समझें. 6,000 डॉलर प्रति औंस का गोल्ड प्राइस लगभग 1.84 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम** के बराबर बैठता है. वहीं 6,300 डॉलर प्रति औंस का अनुमान करीब 1.93 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास आता है. हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. यह केवल अंतरराष्ट्रीय गोल्ड प्राइस का रुपये में कन्वर्जन है. भारत में गोल्ड की वास्तविक कीमत पर डॉलर-रुपया विनिमय दर के अलावा आयात शुल्क, जीएसटी, स्थानीय प्रीमियम और अन्य लागतों का भी असर पड़ता है. इसलिए जे.पी. मॉर्गन के इस अंतरराष्ट्रीय प्राइस टारगेट को सीधे भारत में 10 ग्राम गोल्ड का टारगेट प्राइस नहीं माना जाना चाहिए.

2026 की शुरुआत में गोल्ड ने दिखाई थी जोरदार तेजी

2026 की शुरुआत गोल्ड के लिए काफी मजबूत रही. स्पॉट गोल्ड प्राइसेज में लगातार तेजी देखने को मिली और जनवरी के आखिर में कीमतें काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं. हालांकि, इसके बाद तस्वीर बदली और मार्च के अंत तक गोल्ड में कमजोरी देखने को मिली. कीमत हाल में करीब 4,170 डॉलर प्रति औंस के इंट्रा-ईयर लो तक भी पहुंची. इसके बाद गोल्ड ने कुछ रिकवरी दिखाई, लेकिन फिलहाल कीमत एक सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव करती नजर आ रही है. जे.पी. मॉर्गन के मुताबिक, गोल्ड करीब 4,340 डॉलर प्रति औंस के 200-डे मूविंग एवरेज के ऊपर बना हुआ है. दूसरी तरफ 4,730 डॉलर प्रति औंस का 50-डे मूविंग एवरेज फिलहाल कीमत के लिए एक अहम रुकावट बना हुआ है. यानी तकनीकी संकेतक भी फिलहाल गोल्ड की अगली दिशा को लेकर पूरी तरह स्पष्ट संकेत नहीं दे रहे हैं.

भारत में 10 ग्राम गोल्ड का क्या हाल?

इस खबर को लिखे जाने तक 5 अक्टूबर एक्सपायरी वाला 10 ग्राम गोल्ड करीब 0.54 फीसदी की तेजी के साथ 1.54 लाख रुपये के आसपास ट्रेड करता दिखाई दिया. अगर अलग-अलग समय अवधि में गोल्ड के प्रदर्शन को देखें, तो पिछले एक हफ्ते में करीब 6.40 फीसदी की तेजी देखने को मिली है. वहीं एक महीने में भी गोल्ड करीब 6.40 फीसदी ऊपर रहा है. हालांकि, तीन महीने की अवधि में तस्वीर थोड़ी कमजोर है. इस दौरान गोल्ड में करीब 3.67 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है. यानी शॉर्ट टर्म में सोने में तेजी जरूर लौटती दिखाई दे रही है, लेकिन तीन महीने का प्रदर्शन अभी भी दबाव की ओर इशारा करता है.

केंद्रीय बैंक की खरीदारी क्यों है गोल्ड के लिए अहम?

गोल्ड की तेजी के पीछे पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय बैंकों की बढ़ती खरीदारी एक बड़ा कारण रही है. 2021 से 2025 के बीच केंद्रीय बैंकों ने औसतन हर तिमाही करीब 225 टन गोल्ड खरीदा. यह 2016 से 2020 के औसत खरीद स्तर से लगभग दोगुना था. लेकिन 2026 की शुरुआत में आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो केंद्रीय बैंक की खरीदारी कमजोर दिखाई दी. पहली तिमाही में केंद्रीय बैंकों ने कुल 129 टन गोल्ड बेचा. इसमें तुर्किये की करीब 60 टन की बिक्री भी शामिल रही. वहीं पहली तिमाही में नेट रिपोर्टेड गोल्ड परचेज सिर्फ 16 टन रही. लेकिन यहीं पर गोल्ड मार्केट की तस्वीर थोड़ी दिलचस्प हो जाती है.

आधिकारिक डेटा पूरी कहानी क्यों नहीं बताता?

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों की कुछ गोल्ड परचेज ऐसी होती हैं जिन्हें आधिकारिक तौर पर रिपोर्ट नहीं किया जाता. गोल्ड परचेज की आईएमएफ को रिपोर्टिंग अनिवार्य नहीं होने की वजह से वास्तविक खरीदारी और रिपोर्टेड बाइंग में अंतर हो सकता है. यही वजह है कि केवल आधिकारिक डेटा के आधार पर केंद्रीय बैंक डिमांड का पूरा आकलन करना मुश्किल है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने लंदन ओटीसी मार्केट और स्विस रिफाइनरीज के ट्रेड फ्लोज जैसे वैकल्पिक आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया कि 2026 की पहली तिमाही में वास्तविक केंद्रीय बैंक गोल्ड बाइंग करीब 244 टन हो सकती है. यह आंकड़ा 2025 की चौथी तिमाही में दर्ज 208 टन से ज्यादा है. इसका मतलब यह हुआ कि जहां आधिकारिक डेटा गोल्ड बाइंग में कमजोरी दिखा रहा था, वहीं वैकल्पिक आंकड़े वास्तविक मांग के मजबूत होने का संकेत दे रहे थे.

चीन की बढ़ती गोल्ड बाइंग पर भी नजर

गोल्ड मार्केट में चीन की भूमिका भी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है. जे.पी. मॉर्गन के मुताबिक, 2026 की पहली तिमाही में चीन का नेट गोल्ड इंपोर्ट करीब 317 टन रहा. यह पिछली तिमाही के मुकाबले लगभग तीन गुना था. इसके अलावा पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना की रिपोर्टेड गोल्ड बाइंग में भी तेजी देखने को मिली. फरवरी तक जहां खरीदारी करीब 1 टन प्रति महीने की गति से हो रही थी, वहीं मार्च में यह बढ़कर 5 टन और अप्रैल में 8 टन तक पहुंच गई. चीन की तरफ से गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की रणनीति को सिर्फ सामान्य निवेश मांग के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. इसके पीछे रिजर्व डायवर्सिफिकेशन की सोच भी हो सकती है. 2022 में रूसी केंद्रीय बैंक की संपत्तियों को फ्रीज किए जाने के बाद ऑफशोर डॉलर एसेट्स की सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर सवाल उठे. ऐसे माहौल में गोल्ड को डॉलर के अलावा एक महत्वपूर्ण रिजर्व एसेट के तौर पर देखा जाने लगा है. अगर चीन लंबे समय तक अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाता रहता है, तो इससे गोल्ड प्राइसेज को स्ट्रक्चरल सपोर्ट मिल सकता है.

इंश्योरेंस कंपनियों से भी बढ़ सकती है गोल्ड डिमांड

गोल्ड की मांग सिर्फ केंद्रीय बैंकों तक सीमित नहीं है. चीन की 10 बड़ी इंश्योरेंस कंपनियों को 2025 की शुरुआत में अपने एसेट्स अंडर मैनेजमेंट यानी एयूएम का 1 फीसदी तक फिजिकल गोल्ड में निवेश करने की मंजूरी मिली थी. उस समय इन कंपनियों के कंबाइंड एयूएम का 1 फीसदी लगभग 200 टन गोल्ड के बराबर था. अगर भविष्य में सोने के आवंटन की सीमा बढ़ती है और इंश्योरेंस कंपनियां फिजिकल गोल्ड में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाती हैं, तो इससे गोल्ड डिमांड को अतिरिक्त सपोर्ट मिल सकता है. यानी गोल्ड के लिए डिमांड ड्राइवर्स सिर्फ केंद्रीय बैंक नहीं हैं. इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स भी आने वाले समय में इसकी मांग को प्रभावित कर सकते हैं.

गोल्ड के सामने सबसे बड़ा रिस्क क्या है?

अब गोल्ड की कहानी का दूसरा पहलू समझना भी जरूरी है. गोल्ड को आमतौर पर महंगाई और करेंसी डिबेसमेंट के खिलाफ हेज माना जाता है. लेकिन गोल्ड खुद कोई रियल यील्ड नहीं देता. ऐसे में अगर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और दूसरे इंटरेस्ट-बेयरिंग एसेट्स से मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तो इन्वेस्टर्स के लिए गोल्ड की तुलना में इन एसेट्स की आकर्षकता बढ़ सकती है. यहीं पर फेडरल रिजर्व की पॉलिसी सबसे अहम हो जाती है. अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रोजगार मजबूत बने रहते हैं, लेकिन महंगाई लगातार बढ़ती रहती है, तो फेड इंटरेस्ट रेट्स में कटौती करने के बजाय उन्हें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रख सकता है या जरूरत पड़ने पर रेट हाइक की दिशा में जा सकता है. ऐसी स्थिति गोल्ड के लिए नकारात्मक साबित हो सकती है.

फेड की पॉलिसी गोल्ड की अगली दिशा तय कर सकती है

जे.पी. मॉर्गन के ग्रेग शीयर के मुताबिक, गोल्ड के लिए सबसे बड़ा बेयरिश रिस्क ऐसा सिनेरियो होगा जिसमें अमेरिकी ग्रोथ और एम्प्लॉयमेंट मजबूत रहें, लेकिन इंफ्लेशन बढ़ती रहे और फेडरल रिजर्व को रेट हाइक साइकिल अपनाने की जरूरत महसूस हो. अगर ऐसा होता है तो वेस्टर्न इन्वेस्टर्स की गोल्ड डिमांड कमजोर पड़ सकती है. इसके साथ गोल्ड ईटीएफ से आउटफ्लोज बढ़ सकते हैं. अगर इसी दौरान केंद्रीय बैंक की खरीदारी की रफ्तार भी कमजोर होती है, तो गोल्ड प्राइसेज पर दोहरा दबाव बन सकता है. यानी गोल्ड के लिए सिर्फ जियोपॉलिटिकल टेंशंस और सेंट्रल बैंक डिमांड ही महत्वपूर्ण नहीं हैं. इंटरेस्ट रेट्स और बॉन्ड यील्ड्स भी इसकी कीमत पर बड़ा असर डाल सकते हैं.

क्या 2026 में फिर बनेगा गोल्ड का नया हाई?

कुल मिलाकर गोल्ड की तस्वीर इस समय मिक्स्ड है. एक तरफ जियोपॉलिटिकल टेंशंस, इंफ्लेशन की चिंता, सेंट्रल बैंक डिमांड, चीन की बढ़ती गोल्ड बाइंग और रिजर्व डायवर्सिफिकेशन जैसे फैक्टर्स गोल्ड को सपोर्ट कर रहे हैं. दूसरी तरफ फेडरल रिजर्व की पॉलिसी, इंटरेस्ट रेट्स, ट्रेजरी यील्ड्स और सेंट्रल बैंक परचेजेज में संभावित कमजोरी गोल्ड के लिए बड़े रिस्क हैं. इसके बावजूद जे.पी. मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च का अनुमान गोल्ड बुल्स के लिए काफी मजबूत संकेत देता है. रिसर्च के मुताबिक, 2026 के अंत तक गोल्ड करीब 6,000 डॉलर प्रति औंस और 2027 के अंत तक 6,300 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है. भारतीय रुपये में मौजूदा कन्वर्जन रेट के आधार पर यह क्रमशः करीब 5.73 लाख रुपये और 6.01 लाख रुपये प्रति ट्रॉय औंस बैठता है. वहीं 10 ग्राम के हिसाब से यह करीब 1.84 लाख रुपये और 1.93 लाख रुपये के बराबर है.

हालांकि, भारतीय बाजार में वास्तविक गोल्ड प्राइस इन आंकड़ों से अलग हो सकता है. अब आने वाले महीनों में गोल्ड इन्वेस्टर्स की नजर मुख्य रूप से तीन चीजों पर रहेगी, फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति, जियोपॉलिटिकल कॉन्फ्लिक्ट्स और केंद्रीय बैंक की वास्तविक गोल्ड बाइंग. अगर ये फैक्टर्स गोल्ड के पक्ष में बने रहते हैं, तो 2026 में नए हाई की संभावना मजबूत हो सकती है. वहीं अगर इंटरेस्ट रेट्स लंबे समय तक ऊंचे रहते हैं और केंद्रीय बैंक तथा ईटीएफ डिमांड कमजोर पड़ती है, तो गोल्ड में करेक्शन भी देखने को मिल सकता है. इसलिए केवल किसी एक प्राइस टारगेट को देखकर गोल्ड में निवेश का फैसला करना सही नहीं होगा. निवेश से पहले अपनी रिस्क प्रोफाइल, इन्वेस्टमेंट होराइजन और फाइनेंशियल गोल्स को ध्यान में रखना जरूरी है. यह जानकारी केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्य के लिए है. किसी भी निवेश का फैसला लेने से पहले योग्य फाइनेंशियल एडवाइजर की सलाह जरूर लें.

 

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