2026 में सोना फिर चढ़ेगा या फिसलेगा, WGC ने बताया आगे क्या

डब्ल्यूजीसी की नई रिपोर्ट बताती है कि 2026 की दूसरी छमाही में सोने की चाल ब्याज दर, डॉलर, वैश्विक तनाव, भारत की मांग और केंद्रीय बैंकों की खरीद से तय होगी.

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तनीषा त्यागी

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न्यूज़ हाइलाइट्स

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जनवरी से जून तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 26 फीसदी टूटा

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WGC ने अपनी Gold Mid-Year Outlook 2026 रिपोर्ट जारी की

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अमेरिका ईरान तनाव और मुनाफावसूली ने पहली छमाही में चाल बदली

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दुनिया के कई केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे

क्या 2026 की दूसरी छमाही में सोना फिर से नया रिकॉर्ड बनाएगा या फिर इसकी कीमतों में और बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी? अगर आप सोने में निवेश करते हैं. या फिर शादी-ब्याह के लिए गोल्ड खरीदने की सोच रहे हैं... तो ये खबर आपके लिए बेहद अहम है। क्योंकि वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल यानी WGC ने अपनी Gold Mid-Year Outlook 2026 रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि आने वाले महीनों में आखिर कौन-कौन से फैक्टर्स सोने की कीमतों की दिशा तय करेंगे। आज समझेंगे कि इस साल अब तक सोने की कीमतों में क्या हुआ, आगे कीमतें बढ़ेंगी या घटेंगी, किन वजहों से गोल्ड में तेजी आ सकती है और किन हालात में कीमतों पर दबाव बन सकता है।

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इस साल सोने की चाल

साल 2026 की शुरुआत सोने के लिए काफी शानदार रही। जनवरी के आखिर में सोने ने नया रिकॉर्ड बनाया और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत करीब 5,400 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। लेकिन इसके बाद तस्वीर बदल गई। जून के आखिर तक सोने की कीमत गिरकर करीब 4,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई। यानी रिकॉर्ड हाई से करीब 26 फीसदी की गिरावट देखने को मिली।

अगर भारत की बात करें, तो खबर लिखे जाने तक MCX पर 5 अगस्त 2026 एक्सपायरी वाला सोना करीब 1.43 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार करता नजर आया। वहीं 29 जनवरी 2026 को सोने ने इस साल का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर हासिल किया था। इसके बाद से बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव का माहौल बना हुआ है और निवेशकों की नजर हर नए ग्लोबल घटनाक्रम पर बनी हुई है।

इस साल सोने में इतना उतार-चढ़ाव क्यों आया?

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का कहना है कि पहली छमाही में सबसे बड़ा असर भू-राजनीतिक तनाव का रहा। खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने सोने को मजबूत सपोर्ट दिया। जब भी दुनिया में तनाव बढ़ता है, निवेशक शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले एसेट्स से पैसा निकालकर सोने की तरफ आते हैं। इसी वजह से शुरुआत में सोने में तेजी देखने को मिली. इसके अलावा निवेशकों की खरीद-बिक्री, मुनाफावसूली और बदलते बाजार के माहौल का भी कीमतों पर असर पड़ा।

WGC के मुताबिक अब सोने की कीमत तय करने में एशियाई बाजारों की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। यानी अब सिर्फ अमेरिका और यूरोप ही नहीं, बल्कि एशिया के निवेशक भी गोल्ड की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

2026 की दूसरी छमाही में सोने का क्या होगा?

WGC का मानना है कि अगर मौजूदा आर्थिक हालात ऐसे ही बने रहते हैं, तो सोने की कीमतें बहुत ज्यादा ऊपर या नीचे नहीं जाएंगी। यानी कीमतें मौजूदा स्तर से करीब 5% ऊपर या नीचे रह सकती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बाजार को उम्मीद है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल अक्टूबर तक कम से कम एक बार ब्याज दरों में बदलाव कर सकता है। वहीं Bank of England, Bank of Japan और European Central Bank भी सख्त मौद्रिक नीति जारी रख सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो साल के आखिर तक सोना करीब 4,100 डॉलर प्रति औंस के आसपास रह सकता है।

कब आएगी बड़ी तेजी?

लेकिन अगर दुनिया में हालात बिगड़ते हैं जैसे भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है या फिर बड़े केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती शुरू कर देते हैं, तो सोना फिर से तेज रफ्तार पकड़ सकता है। WGC का कहना है कि ऐसे हालात में सोना दोबारा 4,500 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है। और अगर वैश्विक संकट और गहरा हुआ, तो कीमतें 5,000 डॉलर प्रति औंस के करीब भी जा सकती हैं।

कब बढ़ेगा दबाव?

दूसरी तरफ अगर दुनिया की अर्थव्यवस्था मजबूत रहती है, अमेरिकी डॉलर और मजबूत होता है, ब्याज दरें उम्मीद से ज्यादा बढ़ती हैं और निवेशक फिर से शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले एसेट्स में पैसा लगाना शुरू कर देते हैं... तो सोने पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर सोना लगातार 4,000 डॉलर प्रति औंस से नीचे टिकता है, तो बिकवाली और बढ़ सकती है। हालांकि WGC का कहना है कि इतिहास गवाह है कि बड़ी गिरावट के बाद केंद्रीय बैंक, बड़े निवेशक और आम खरीदार फिर से खरीदारी शुरू कर देते हैं। यही वजह है कि बहुत बड़ी गिरावट की संभावना सीमित मानी जा रही है।

भारत पर क्या असर?

अब बात भारत की। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने अपनी रिपोर्ट में भारत को भी एक बड़ा फैक्टर बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार द्वारा सोने पर आयात शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने का असर घरेलू मांग पर पड़ सकता है। WGC का अनुमान है कि इससे साल 2026 में भारत की गोल्ड डिमांड करीब 50 से 60 टन तक घट सकती है। यानी करीब 10 फीसदी की कमी देखने को मिल सकती है। इसकी वजह यह है कि आयात शुल्क बढ़ने से सोना महंगा हो जाएगा, जिससे ज्वेलरी, गोल्ड बार और सिक्कों की खरीदारी कुछ समय के लिए कम हो सकती है। हालांकि रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत में सोने की मांग सिर्फ कीमतों पर निर्भर नहीं करती। त्योहार, शादियां, सांस्कृतिक परंपराएं और लंबे समय का निवेश आज भी लोगों को सोना खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए लंबी अवधि में भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड मार्केट्स में बना रहेगा।

रिपोर्ट में एक और अहम बात कही गई है

हैं। WGC का कहना है कि अगर केंद्रीय बैंक सिर्फ 20 से 30 टन अतिरिक्त सोना भी खरीदते हैं, तो इससे सोने की कीमत में करीब 1% तक का असर देखने को मिल सकता है। यानी केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी आने वाले समय में गोल्ड की कीमतों को सपोर्ट दे सकती है।

कुल मिलाकर वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट यही कहती है कि 2026 की दूसरी छमाही में सोने की चाल पूरी तरह दुनिया के आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। अगर तनाव बढ़ता है या अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है, तो सोना फिर से नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ सकता है। लेकिन अगर डॉलर मजबूत रहता है और ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो कीमतों पर दबाव भी बना रह सकता है। यानी अगर आप सोने में निवेश करने की सोच रहे हैं, तो सिर्फ कीमत देखकर फैसला लेने के बजाय दुनिया के बड़े घटनाक्रम, ब्याज दरों और बाजार के रुख पर भी नजर रखना जरूरी होगा। क्योंकि आने वाले महीनों में गोल्ड की दिशा सिर्फ मांग और सप्लाई नहीं, बल्कि वैश्विक हालात तय करेंगे।

 

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