Gold Price : सोने की कीमतों में एक बार फिर तेज हलचल देखने को मिल रही है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना तीन महीने के ऊंचे स्तर के करीब पहुंच गया है. सोमवार को सोने की कीमत 0.5 फीसदी तक चढ़कर 4,620 डॉलर प्रति औंस के ऊपर पहुंच गई. इससे पहले पिछले सप्ताह भी सोने में जोरदार तेजी रही थी और पूरे सप्ताह के दौरान इसकी कीमत 5 फीसदी से ज्यादा बढ़ी थी. सोने में इस तेजी के पीछे सिर्फ एक वजह नहीं है. अमेरिकी सरकारी बॉन्ड बाजार में हुए बड़े बदलाव, कमजोर होते डॉलर और अमेरिका के बढ़ते कर्ज को लेकर चिंता ने निवेशकों का रुख एक बार फिर सोने जैसे वैकल्पिक निवेश की तरफ कर दिया है.
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अमेरिकी सरकार के कदम से क्यों चमका सोना
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने लंबे समय वाले सरकारी कर्ज की खरीद बढ़ाने का अचानक फैसला किया है. इसका मकसद बॉन्ड बाजार में उधारी की लागत को नियंत्रित करने और लंबे समय वाले सरकारी कर्ज पर दबाव कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. इस कदम के बाद अमेरिकी बॉन्ड पर मिलने वाला प्रतिफल यानी यील्ड नरम हुआ और डॉलर पर भी दबाव देखने को मिला. सोने के लिए कमजोर डॉलर आमतौर पर सकारात्मक माना जाता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है. डॉलर कमजोर होने पर दूसरी मुद्राओं में निवेश करने वाले लोगों के लिए सोना अपेक्षाकृत सस्ता हो सकता है. इससे सोने की मांग को सहारा मिलता है. यही वजह है कि अमेरिकी वित्त मंत्रालय के फैसले के बाद सोने की तेजी और मजबूत हुई. पिछले सप्ताह 5 फीसदी से ज्यादा की बढ़त ने भी संकेत दिया कि निवेशक आर्थिक और वित्तीय जोखिमों को लेकर फिर से सोने की तरफ देख रहे हैं.
सोने में लौट आया पुराना तेजी वाला दांव
सोने की मौजूदा तेजी में एक अहम रुझान फिर चर्चा में है, जिसे मुद्रा कमजोर होने पर सुरक्षित निवेश की ओर रुख करने वाला दांव कहा जा सकता है. जब निवेशकों को किसी देश की मुद्रा की खरीद क्षमता, सरकारी कर्ज या वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता बढ़ती है, तो वे ऐसे निवेश की तरफ जा सकते हैं जिसे मुद्रा जोखिम से बचाव के तौर पर देखा जाता है. सोना ऐसे माहौल में प्रमुख विकल्प माना जाता है.
2025 में भी इसी तरह की चिंता के बीच सोने में जोरदार तेजी आई थी. अब अमेरिकी वित्तीय स्थिति और सरकारी कर्ज को लेकर नई चिंताओं के बीच वही कहानी फिर बाजार में दिखाई दे रही है.
रे डालियो ने सोने को लेकर क्यों बढ़ाई चिंता
सोने की तेजी को अरबपति निवेशक रे डालियो की टिप्पणी से भी सहारा मिला है. ब्रिजवॉटर एसोसिएट्स के संस्थापक डालियो ने निवेशकों को अपने निवेश पोर्टफोलियो में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि निवेशकों को लंबे समय वाले सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी कम करने और पोर्टफोलियो का करीब 10 से 15 फीसदी हिस्सा सोने में रखने पर विचार करना चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने बिटकॉइन में भी थोड़ी हिस्सेदारी रखने की बात कही है.
डालियो की चिंता का मुख्य कारण अमेरिका का बढ़ता सरकारी कर्ज और वित्तीय घाटा है. उनका मानना है कि अगर सरकार की कमाई और खर्च के बीच बड़ा अंतर बना रहता है और कर्ज चुकाने की लागत बढ़ती जाती है, तो आने वाले वर्षों में अमेरिका के कर्ज संकट का जोखिम बढ़ सकता है. उनके अनुमान के मुताबिक अगर मौजूदा दिशा में बड़ा बदलाव नहीं आता है, तो अमेरिका को करीब तीन साल के भीतर कर्ज संकट का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि उन्होंने इसमें करीब दो साल का अंतर संभव बताया है.
अमेरिका के कर्ज को लेकर चिंता इतनी बड़ी क्यों है
अमेरिकी सरकार की वित्तीय स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इस साल अमेरिका की सरकारी आय करीब 5.5 लाख करोड़ डॉलर रहने का अनुमान है, जबकि सरकारी खर्च लगभग 7.5 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है. यानी करीब 2 लाख करोड़ डॉलर का वित्तीय अंतर बन सकता है.
इसके अलावा सिर्फ कर्ज पर ब्याज चुकाने में ही करीब 1 लाख करोड़ डॉलर खर्च होने का अनुमान है. वहीं करीब 10 लाख करोड़ डॉलर के कर्ज को दोबारा वित्तपोषित करने की जरूरत है. यही वजह है कि लंबे समय वाले अमेरिकी सरकारी कर्ज पर दबाव बढ़ा है. जब सरकारी बॉन्ड पर यील्ड बढ़ती है, तो पहले से जारी बॉन्ड की कीमतों पर दबाव आता है. ऐसे माहौल में सोने को वैकल्पिक निवेश के तौर पर फायदा मिल सकता है.
अमेरिकी वित्त मंत्रालय के फैसले से क्या बदला
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने लंबे समय वाले सरकारी कर्ज की खरीद से जुड़े कार्यक्रम का आकार बढ़ाने का फैसला किया है. कुछ खरीद अभियानों का आकार बढ़ाकर कम से कम 4 अरब डॉलर प्रति अभियान किया गया है. इस कदम का उद्देश्य सरकारी बॉन्ड बाजार में मांग और नकदी का समर्थन करना है. हालांकि शुरुआती प्रतिक्रिया के बावजूद इससे अमेरिका के कर्ज को लेकर मौजूद बड़ी वित्तीय चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
30 साल वाले अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर यील्ड अब भी ऊंचे स्तर के आसपास बनी हुई है. इसलिए निवेशक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिकी सरकार का यह कदम सिर्फ कुछ समय के लिए बाजार को सहारा देगा या इससे बॉन्ड बाजार में लंबे समय के लिए कोई बड़ा बदलाव आएगा.
सोने के साथ चांदी और बिटकॉइन में भी तेजी
सोने की तेजी अकेली नहीं है. चांदी में भी मजबूती देखने को मिली है. सोमवार को चांदी करीब 0.4 फीसदी चढ़कर 69.29 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई. वहीं बिटकॉइन भी 77,000 डॉलर के स्तर को पार कर गया और पिछले सप्ताह इसमें भी मजबूत तेजी देखने को मिली. डालियो का मानना है कि अगर सरकारी कर्ज और मुद्रा से जुड़ी चिंताएं बढ़ती हैं, तो सोने और बिटकॉइन जैसे ऐसे निवेश साधनों को फायदा मिल सकता है जो सीधे तौर पर किसी सरकार की देनदारी पर निर्भर नहीं होते. हालांकि दोनों निवेश साधनों का जोखिम अलग-अलग है. सोने को आमतौर पर सुरक्षित निवेश माना जाता है, जबकि बिटकॉइन में कीमतों का उतार-चढ़ाव काफी ज्यादा हो सकता है.
क्या इसका मतलब सरकारी बॉन्ड से पूरी तरह पैसा निकालना है ?
ऐसा जरूरी नहीं है. डालियो की सलाह का मतलब यह नहीं है कि निवेशकों को सभी सरकारी बॉन्ड अपने पोर्टफोलियो से पूरी तरह हटा देने चाहिए. एक तरीका यह हो सकता है कि लंबे समय वाले सरकारी बॉन्ड में हिस्सेदारी कम की जाए, लेकिन कम अवधि वाले सरकारी बॉन्ड में नकदी और पूंजी की सुरक्षा के लिए कुछ निवेश रखा जाए. यानी मौजूदा बहस सिर्फ सोना खरीदने या बॉन्ड बेचने तक सीमित नहीं है. असली मुद्दा निवेश पोर्टफोलियो में अलग-अलग आर्थिक जोखिमों के बीच संतुलन बनाने का है.
आगे सोने की कीमत किस पर निर्भर करेगी
आने वाले समय में सोने की दिशा के लिए अमेरिकी डॉलर, सरकारी बॉन्ड की यील्ड, अमेरिका की वित्तीय नीति और सरकारी कर्ज सबसे अहम कारक रहेंगे. अगर डॉलर कमजोर रहता है और बॉन्ड यील्ड पर दबाव बना रहता है, तो सोने को आगे भी सहारा मिल सकता है. वहीं अगर अमेरिकी बॉन्ड बाजार में स्थिरता लौटती है और डॉलर मजबूत होता है, तो सोने की तेजी पर कुछ दबाव भी आ सकता है. इसके अलावा निवेशकों की नजर इस बात पर भी रहेगी कि अमेरिकी सरकार बढ़ते वित्तीय घाटे और कर्ज को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाती है.
फिलहाल तस्वीर साफ है. सोना तीन महीने के ऊंचे स्तर के करीब है और पिछले सप्ताह की जोरदार तेजी के बाद भी इसमें निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है. अमेरिका के बढ़ते कर्ज को लेकर चिंता, कमजोर डॉलर और सरकारी बॉन्ड बाजार में अमेरिकी वित्त मंत्रालय के हस्तक्षेप ने सोने के लिए एक बार फिर सकारात्मक माहौल तैयार कर दिया है. लेकिन आगे सोने की कीमत कहां जाएगी, इसका जवाब अमेरिकी कर्ज, डॉलर और बॉन्ड बाजार की अगली चाल में छिपा है.
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