सोने को हमेशा सुरक्षित निवेश का सबसे मजबूत विकल्प माना जाता है. लेकिन इस समय यही कीमती धातु अपने रिकॉर्ड हाई से करीब 30 प्रतिशत नीचे कारोबार कर रही है. चांदी की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. रिकॉर्ड स्तर से इसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है. ऐसे में निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह गिरावट किसी बड़े संकट का संकेत है या फिर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए नया अवसर बन सकती है. आइए समझते हैं कि आखिर सोना और चांदी में इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई है और आगे की तस्वीर कैसी दिख रही है.
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रिकॉर्ड हाई के बाद क्यों फिसला सोना?
साल 2026 की शुरुआत में 29 जनवरी 2026 को सोने ने करीब 5,600 डॉलर प्रति औंस का रिकॉर्ड हाई बनाया था. इसके बाद बाजार में लगातार बिकवाली का दौर शुरू हुआ और कीमतें करीब 4,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गईं. यानी रिकॉर्ड स्तर से लगभग 30 प्रतिशत की गिरावट. इसी अवधि में चांदी ने भी रिकॉर्ड ऊंचाई बनाई थी, लेकिन बाद में इसमें और बड़ी गिरावट देखने को मिली. अपने उच्चतम स्तर से चांदी करीब 54 प्रतिशत तक टूट चुकी है. इस तेज गिरावट ने निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है.
भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद क्यों टूटा गोल्ड?
आमतौर पर जब दुनिया में तनाव बढ़ता है तो निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की ओर रुख करते हैं. लेकिन इस बार तस्वीर अलग रही. इसकी सबसे बड़ी वजह ब्याज दरों को लेकर बदली उम्मीदें हैं. पहले माना जा रहा था कि अमेरिका का केंद्रीय बैंक जल्द ब्याज दरों में कटौती करेगा. इससे सोने को मजबूती मिल सकती थी. लेकिन महंगाई को लेकर चिंता और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण दरों में कटौती की संभावना कमजोर पड़ गई. जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं तो बिना ब्याज वाला निवेश जैसे सोना अपेक्षाकृत कम आकर्षक हो जाता है. इसी वजह से निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू कर दी.
शेयर बाजार ने भी बढ़ाया दबाव
सोने की कमजोरी के पीछे एक और अहम कारण शेयर बाजार रहा. हाल के महीनों में टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला. कई बड़े निवेशकों ने नकदी जुटाने के लिए अपने गोल्ड होल्डिंग्स बेचे. यानी सोने में गिरावट सिर्फ मांग कम होने की वजह से नहीं, बल्कि निवेशकों की बदलती रणनीति का भी नतीजा रही.
क्या यह गिरावट अस्थायी है?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा कमजोरी को स्थायी गिरावट नहीं माना जाना चाहिए. उनका कहना है कि यह एक सामान्य मार्केट करेक्शन है. इतिहास भी यही संकेत देता है. पिछले कई दशकों में सोने में इससे कहीं बड़ी गिरावटें देखने को मिल चुकी हैं.
- 1980 के बाद सोना करीब 71 प्रतिशत तक टूटा था.
- 1974 के बाद इसमें लगभग 49 प्रतिशत की गिरावट आई थी.
- 2011 के बाद भी गोल्ड करीब 46 प्रतिशत तक फिसला था.
इन आंकड़ों की तुलना में मौजूदा 30 प्रतिशत का करेक्शन अपेक्षाकृत छोटा माना जा रहा है.
तकनीकी संकेत क्या कहते हैं?
तकनीकी विश्लेषण के अनुसार 3,950 से 4,000 डॉलर प्रति औंस का दायरा सोने के लिए मजबूत सपोर्ट जोन माना जा रहा है. पहले भी कई बार इसी स्तर से कीमतों में रिकवरी देखने को मिली है. यदि यह सपोर्ट बना रहता है तो आने वाले समय में सोना दोबारा मजबूती दिखा सकता है.
आगे क्या है एक्सपर्ट्स का आउटलुक?
बाजार के कई जानकारों का मानना है कि अगर वैश्विक आर्थिक हालात स्थिर रहते हैं और आगे चलकर ब्याज दरों में नरमी आती है तो सोना आने वाले महीनों में करीब 4,400 डॉलर तक पहुंच सकता है.
लंबी अवधि के नजरिए से देखें तो 2026 के अंत तक 4,900 से 5,000 डॉलर का स्तर भी देखने को मिल सकता है. वहीं अनुकूल परिस्थितियों में 2027 के दौरान सोना नया रिकॉर्ड हाई भी बना सकता है.
केंद्रीय बैंकों की खरीदारी बनी हुई है मजबूत सहारा
सोने के लिए एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि दुनिया के कई केंद्रीय बैंक लगातार अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं. हालांकि ETF के जरिए कुछ बिकवाली देखने को मिली है, लेकिन केंद्रीय बैंक लंबे समय के नजरिए से सोने में भरोसा बनाए हुए हैं. कई देश डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत भी गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं. इससे भविष्य में सोने की मांग को मजबूती मिल सकती है.
घरेलू बाजार में भी रही कमजोरी
घरेलू कमोडिटी बाजार में भी सोने और चांदी दोनों में दबाव देखने को मिला. खबर लिखे जाने तक अगस्त 2026 एक्सपायरी वाला सोना करीब 1.44 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा था. वहीं सितंबर 2026 एक्सपायरी वाली चांदी लगभग 2.29 लाख रुपये प्रति किलो के स्तर पर ट्रेड करती दिखाई दी.
क्या अभी खरीदारी करनी चाहिए?
अगर आपका निवेश नजरिया बहुत कम अवधि का है तो बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है. लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए कई विशेषज्ञ मौजूदा करेक्शन को घबराने की बजाय धैर्य रखने का समय मान रहे हैं. हालांकि निवेश का फैसला हमेशा अपनी वित्तीय स्थिति, जोखिम उठाने की क्षमता और निवेश अवधि को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए. केवल कीमतों में गिरावट देखकर निवेश करना सही रणनीति नहीं मानी जाती.
निष्कर्ष
रिकॉर्ड हाई से करीब 30 प्रतिशत की गिरावट ने जरूर निवेशकों को चौंकाया है, लेकिन इतिहास बताता है कि सोना पहले भी कई बड़े करेक्शन से गुजर चुका है. आने वाले समय में ब्याज दरों का रुख, महंगाई, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और वैश्विक आर्थिक हालात तय करेंगे कि सोने और चांदी की अगली बड़ी चाल किस दिशा में होगी.
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