सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट के बाद एक बार फिर तेजी देखने को मिली है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में 9 अक्टूबर को स्पॉट गोल्ड करीब 1.5% उछलकर 4,194 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया. वहीं, दिसंबर डिलीवरी वाले अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स में करीब 1.4% की तेजी आई और भाव 4,216 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ. चांदी की कीमतों में भी मजबूती दिखी और स्पॉट सिल्वर करीब 2.4% चढ़कर 60.77 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई.
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हालांकि, कीमतों में आई इस तेजी से यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि सोने-चांदी में गिरावट का दौर खत्म हो गया है. एक तरफ UBS जैसे बड़े बैंक लंबी अवधि में सोने की कीमतों में बड़ी बढ़त की उम्मीद कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में मजबूती आने पर सोना फिर 4,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास फिसल सकता है. ऐसे में निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि मौजूदा रिकवरी के पीछे कौन-से कारण हैं और आगे कीमतों की दिशा किन बातों पर निर्भर करेगी.
दो महीने के निचले स्तर से सोने की वापसी
हालिया तेजी से पहले सोना करीब दो महीने के निचले स्तर तक फिसल गया था. कीमतें गिरने के बाद कुछ निवेशकों ने कम भाव पर खरीदारी शुरू की. बाजार में इस रणनीति को 'बार्गेन हंटिंग' कहा जाता है. इसमें निवेशक किसी एसेट की कीमत गिरने पर उसे खरीदने का मौका तलाशते हैं.
सोने की रिकवरी को केवल इस खरीदारी से जोड़कर देखना सही नहीं होगा. अमेरिकी डॉलर में नरमी, ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड का हालिया ऊंचे स्तरों से नीचे आना और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने भी कीमतों को सहारा दिया.
सोना अपने आप कोई ब्याज नहीं देता. इसलिए जब अमेरिकी बॉन्ड से बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना बढ़ती है, तो निवेशकों के लिए सोने में पैसा लगाने का आकर्षण कम हो सकता है. इसके उलट, डॉलर और बॉन्ड यील्ड में नरमी सोने को मजबूती दे सकती है.
UBS को सोने में गिरावट का भी डर, तेजी की भी उम्मीद
UBS ने सोने की कीमतों को लेकर निकट अवधि में सावधानी बरतने के साथ लंबी अवधि में तेजी का अनुमान भी दिया है. बैंक के मुताबिक, अगर अमेरिकी रियल बॉन्ड यील्ड ऊंची बनी रहती है और डॉलर मजबूत होता है, तो सोना दोबारा 4,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच सकता है.
लेकिन UBS के नजरिए में यह स्तर सिर्फ गिरावट का संकेत नहीं है. कीमतें इतनी नीचे आने पर लंबी अवधि के निवेशक खरीदारी कर सकते हैं, जिससे सोने को सहारा मिलने की संभावना रहेगी.
बैंक के अनुमान के मुताबिक, सोने की कीमतों का संभावित लक्ष्य इस तरह है.
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दिसंबर 2026 तक: 4,600 डॉलर प्रति औंस.
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मार्च 2027 तक: 5,000 डॉलर प्रति औंस.
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जून 2027 तक: 5,200 डॉलर प्रति औंस.
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सितंबर 2027 तक: 5,400 डॉलर प्रति औंस.
ये अनुमान हैं, कीमतों की गारंटी नहीं. बाजार की परिस्थितियां बदलने पर वास्तविक भाव इन स्तरों से अलग रह सकते हैं.
केंद्रीय बैंकों की खरीदारी से मिल सकता है सहारा
लंबी अवधि में सोने की मांग को सहारा देने वाले कई कारण हैं. इनमें केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, चीन की मांग और सरकारी कर्ज को लेकर बढ़ती चिंताएं शामिल हैं.
UBS के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में चीन के केंद्रीय बैंक ने 23 टन और उज्बेकिस्तान ने 7 टन सोना खरीदा. बैंक का अनुमान है कि केंद्रीय बैंकों की सालाना खरीदारी 750 से 1,000 टन के बीच रह सकती है.
केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी सोने की मांग को मजबूती दे सकती है. हालांकि, कीमतों पर इसका वास्तविक असर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि निवेशकों की मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं.
अमेरिकी महंगाई के आंकड़े बिगाड़ सकते हैं खेल
सोने की मौजूदा रिकवरी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में अमेरिकी महंगाई और फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें शामिल हैं.
अगर अमेरिकी महंगाई के आंकड़े उम्मीद से ज्यादा आते हैं, तो ब्याज दरों के ऊंचे बने रहने की आशंका बढ़ सकती है. इससे डॉलर और बॉन्ड यील्ड को मजबूती मिल सकती है, जो सोने की कीमतों पर दबाव डाल सकती है.
इसलिए आने वाले दिनों में निवेशकों को इन तीन संकेतों पर खास नजर रखनी चाहिए.
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अमेरिकी महंगाई के आंकड़े और फेड की ब्याज दरों को लेकर संकेत.
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डॉलर की चाल और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड.
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केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी और वैश्विक निवेश मांग.
चांदी में भी तेजी, लेकिन उतार-चढ़ाव का जोखिम ज्यादा
चांदी की कीमतों में भी सोने के मुकाबले ज्यादा तेजी देखने को मिली. स्पॉट सिल्वर करीब 2.4% बढ़कर 60.77 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई. हालांकि, चांदी की कीमतें सिर्फ निवेश की मांग से तय नहीं होतीं. इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर जैसे उद्योगों में इसका इस्तेमाल भी इसकी मांग को प्रभावित करता है.
अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है और औद्योगिक मांग घटती है, तो चांदी पर दबाव बढ़ सकता है. दूसरी ओर, औद्योगिक इस्तेमाल और निवेश की मांग मजबूत रहने पर इसे सहारा मिल सकता है.
भारतीय खरीदारों के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ रुपये की चाल भी अहम है. डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से आयात महंगा हो सकता है, जबकि ऊंची घरेलू कीमतें खरीदारी को प्रभावित कर सकती हैं.
निवेशकों को अब क्या करना चाहिए?
सोने और चांदी में आई तेजी राहत जरूर देती है, लेकिन इससे गिरावट का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. UBS का अनुमान लंबी अवधि में सोने की संभावनाओं की ओर इशारा करता है, जबकि 4,000 डॉलर तक गिरावट की आशंका बताती है कि निकट अवधि में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है.
निवेशकों के लिए केवल कीमतों में आई तेजी या किसी बैंक के लक्ष्य के आधार पर फैसला लेने के बजाय अपनी निवेश अवधि, जोखिम उठाने की क्षमता और पोर्टफोलियो में सोने-चांदी की हिस्सेदारी को ध्यान में रखना जरूरी है.
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