Share Market News: ईरान-अमेरिका में भड़की जंग, शेयर मार्केट होगा क्रैश ? Biz Tak

चिराग ठाकुर

• 01:55 PM • 12 Jul 2026

होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव से कच्चे तेल, पेट्रोल-डीजल, एलपीजी और शेयर बाजार पर असर का खतरा बढ़ा है. जानिए भारत की तैयारी, तेल भंडार और आगे की चुनौती.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव से दुनिया की तेल सप्लाई पर खतरा बढ़ा

दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता

तेल महंगा हुआ तो महंगाई और कंपनियों की लागत बढ़ सकती

पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है और इसकी गूंज अब वैश्विक तेल बाजार से लेकर भारतीय शेयर बाजार तक सुनाई देने लगी है. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर सख्ती बढ़ा दी है, जबकि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक बार फिर सैन्य कार्रवाई तेज कर दी है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह तनाव लंबा खिंचता है, तो क्या कच्चे तेल की कीमतें फिर तेज़ी से बढ़ेंगी? क्या पेट्रोल-डीजल और एलपीजी महंगे हो सकते हैं? और क्या भारतीय शेयर बाजार पर भी इसका असर देखने को मिलेगा? आर्थिक जानकारों का मानना है कि फिलहाल भारत के सामने तत्काल ईंधन संकट नहीं है, लेकिन अगर हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर महंगाई, कंपनियों की लागत और बाजार की चाल पर पड़ सकता है.

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क्या हुआ जिसने बढ़ा दी वैश्विक चिंता?

ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने घोषणा की है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाज उनकी मंजूरी के बिना आगे नहीं बढ़ सकेंगे. इसी बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड का दावा है कि होर्मुज से गुजर रहे एक व्यापारी जहाज पर ईरानी बलों ने हमला किया. इसके बाद अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर फिर एयरस्ट्राइक शुरू कर दी. इस घटनाक्रम के बाद पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ गया है. अमेरिका का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का कोई नियंत्रण नहीं है, जबकि ईरान लगातार सख्त चेतावनियां दे रहा है. ऐसे में दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग पर अनिश्चितता बढ़ गई है.

शेयर बाजार के लिए क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट?

होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे अहम लाइनों में से एक है. दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होकर गुजरती है. अगर इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है. तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है. इसके साथ ही कंपनियों की लागत बढ़ती है और सरकार पर भी आर्थिक दबाव बढ़ सकता है. यही वजह है कि कारोबारी सप्ताह की शुरुआत से पहले निवेशकों की नजर इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई है.

भारत पर असर क्यों ज्यादा हो सकता है?

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का आयात करता है. ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल महंगा रहता है, तो इसका असर कई सेक्टरों पर दिखाई दे सकता है. सबसे ज्यादा दबाव ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, एयरलाइन कंपनियों, केमिकल उद्योग, पेंट कंपनियों, लॉजिस्टिक्स कारोबार और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ सकता है. इन उद्योगों की लागत बढ़ने से उनके मुनाफे पर असर पड़ सकता है, जिसका असर शेयर बाजार में भी देखने को मिल सकता है. यानी इस संकट का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेशकों के पोर्टफोलियो तक भी पहुंच सकता है.

मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने क्या सलाह दी?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भारत के लिए लंबी अवधि की तैयारी पर जोर दिया है. उनका कहना है कि पिछले होर्मुज संकट के दौरान भारत ने कई अहम सबक सीखे. सरकार ने तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाई, घरेलू स्तर पर सप्लाई बनाए रखने की कोशिश की और वैकल्पिक रणनीतियों के जरिए स्थिति को संभाला. हालांकि उनका मानना है कि अगर भविष्य में इससे भी बड़ा संकट आता है, तो सिर्फ इतना पर्याप्त नहीं होगा.

क्यों बढ़ाने होंगे रणनीतिक तेल भंडार?

अहलूवालिया का कहना है कि भारत को अपने Strategic Petroleum Reserve यानी रणनीतिक कच्चे तेल के भंडार को और मजबूत करना चाहिए. फिलहाल भारत के पास करीब 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल स्टोर करने की क्षमता है. लेकिन अगर वैश्विक संकट लंबा चलता है और तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो इससे बड़े भंडार की जरूरत पड़ सकती है. उनके मुताबिक सबसे बड़ा सबक सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है. किसी भी देश या कंपनी के लिए एक ही सप्लाई रूट या एक ही स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में बड़ा जोखिम बन सकती है. यही वजह है कि भारत को एक तरफ तेल आयात के नए स्रोत तलाशते रहना होगा और दूसरी तरफ अपने रणनीतिक भंडार को लगातार मजबूत करना होगा.

IEA ने भी जताई चिंता

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA ने भी चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है, तो वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है. अगर ऐसा होता है, तो इसका असर सिर्फ ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा. दुनिया भर के शेयर बाजारों में भी तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. निवेशकों का जोखिम लेने का रुझान कमजोर पड़ सकता है और बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है.

फिलहाल भारत के सामने तत्काल संकट नहीं, लेकिन खतरा बना हुआ है

मौजूदा स्थिति में भारत के सामने कोई तत्काल ईंधन संकट नहीं है. लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ता तनाव भारतीय अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों और शेयर बाजार के लिए एक अहम चेतावनी संकेत जरूर है.अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो सबसे पहले असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दे सकता है. इसके बाद महंगाई बढ़ने का दबाव बनेगा और फिर इसका असर शेयर बाजार पर भी देखने को मिल सकता है.यही वजह है कि विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भारत को अभी से अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी होगी. रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने, आयात के स्रोतों में विविधता लाने और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने जैसे कदम भविष्य के किसी भी बड़े संकट से निपटने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.