अर्थशास्‍त्रियों की अब भारत के लिए बड़ी चेतावनी, चीन की गलती से क्या सीख सकता है देश?

सौरभ दीक्षित

• 06:26 PM • 19 Sep 2026

ईएसी-पीएम रिपोर्ट कहती है कि भारत की प्रजनन दर 1.9 पर आ गई है. कई राज्यों में जन्म दर लंबे समय से कम है, इसलिए जनसंख्या नीति पर नए सिरे से सोच जरूरी है.

NewsTak
Google CTA

न्यूज़ हाइलाइट्स

रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे

बिहार और उत्तर प्रदेश हटाएं तो बाकी भारत की दर और कम

साल 2001 से 2023 के बीच जन्मों में करीब 61 लाख कमी

भारत की आबादी को लेकर दशकों तक सबसे बड़ी चिंता यह रही कि देश में जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है. इसी सोच के आधार पर लंबे समय तक परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सरकारी नीतियों में अहम जगह मिली. लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है.

Read more!

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद यानी EAC-PM की नई वर्किंग पेपर रिपोर्ट 'The Ghost of Population Past: How Population Control Persists in India' में भारत की बदलती जनसांख्यिकी पर विस्तार से चर्चा की गई है. रिपोर्ट के लेखक संजीव सान्याल, आकांक्षा अरोड़ा और विराट सिंह हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल प्रजनन दर यानी Total Fertility Rate, TFR अब 1.9 पर आ चुकी है. यह करीब 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है. इसका मतलब है कि देश में औसतन एक महिला के जीवनकाल में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या उस स्तर से कम हो गई है, जो लंबी अवधि में आबादी को मौजूदा स्तर के आसपास बनाए रखने के लिए जरूरी मानी जाती है.

भारत की पूरी तस्वीर एक जैसी नहीं

देश की औसत TFR 1.9 है, लेकिन राज्यों के आंकड़े देखने पर तस्वीर और ज्यादा बदल जाती है.

EAC-PM के मुताबिक अगर बिहार और उत्तर प्रदेश को अलग कर दिया जाए, तो बाकी भारत की TFR करीब 1.6 रह जाती है. यानी देश के बड़े हिस्से में प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे पहुंच चुकी है.

दक्षिण भारत के कई राज्यों में यह गिरावट और ज्यादा गहरी है. आंध्र प्रदेश में TFR करीब 1.4, तेलंगाना और कर्नाटक में 1.5, जबकि केरल और तमिलनाडु में यह 1.3 है.

महाराष्ट्र में यह करीब 1.4, पश्चिम बंगाल में 1.3 और दिल्ली में 1.2 है. सिक्किम में यह आंकड़ा करीब 1.0 तक पहुंच गया है. रिपोर्ट के मुताबिक इन राज्यों में दो दशक से ज्यादा समय से प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे बनी हुई है.

भारत में बच्चों के जन्म की संख्या भी घटी

जनसंख्या में बदलाव को सिर्फ TFR से समझना पर्याप्त नहीं है. हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या भी तस्वीर का दूसरा अहम हिस्सा है.

रिपोर्ट के मुताबिक 2001 में भारत में करीब 2.93 करोड़ बच्चों का जन्म हुआ था. 2023 तक यह संख्या घटकर करीब 2.32 करोड़ रह गई. यानी दो दशक से कुछ ज्यादा समय में सालाना जन्म की संख्या में करीब 61 लाख की कमी आई.

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की कुल आबादी इस दौरान काफी बढ़ चुकी है. इसके बावजूद हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या कम हो रही है.

कई राज्य अब ज्यादा उम्र वाली आबादी की तरफ बढ़ रहे हैं

कम प्रजनन दर का असर सिर्फ बच्चों की संख्या तक सीमित नहीं रहता. लंबे समय तक जन्म दर कम रहने से धीरे-धीरे आबादी की उम्र बढ़ने लगती है.

EAC-PM के मुताबिक जिन राज्यों में जनसांख्यिकीय बदलाव पहले हुआ है, वहां औसत यानी median age करीब 35 साल है. इसके मुकाबले पूरे भारत की median age करीब 30 साल है. रिपोर्ट इन राज्यों की जनसांख्यिकीय स्थिति की तुलना ज्यादा उम्र वाली अर्थव्यवस्थाओं से करती है.

इसका सीधा असर आने वाले वर्षों में कामकाजी आबादी, बुजुर्गों की संख्या, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा की जरूरतों पर पड़ सकता है.

चीन से क्यों मिल रही है चेतावनी?

यहीं से चीन का उदाहरण महत्वपूर्ण हो जाता है.

चीन ने 1980 में देशभर में वन-चाइल्ड पॉलिसी लागू की थी. कई दशकों तक सरकार की आबादी नीति का बड़ा हिस्सा जन्म को सीमित करने पर केंद्रित रहा. बाद में चीन ने 2016 में टू-चाइल्ड पॉलिसी अपनाई और फिर 2021 में थ्री-चाइल्ड पॉलिसी की तरफ बढ़ गया.

यानी नीति की दिशा पूरी तरह बदल गई. पहले सरकार कम बच्चे पैदा करने पर जोर दे रही थी और बाद में ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने लगी.

लेकिन नीति बदलने के बावजूद जन्म दर में वैसी वापसी नहीं हुई जिसकी उम्मीद की जा रही थी.

चीन में अब आबादी घट रही है

चीन के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2025 में वहां 79.2 लाख बच्चों का जन्म हुआ, जबकि 1.131 करोड़ लोगों की मौत हुई. साल के अंत तक चीन की आबादी 140.489 करोड़ थी, जो एक साल पहले की तुलना में 33.9 लाख कम थी. यह आबादी में लगातार चौथी सालाना गिरावट थी.

चीन में 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 2025 के अंत तक 32.338 करोड़ यानी कुल आबादी का करीब 23 फीसदी थी. 65 साल से ज्यादा उम्र की आबादी 22.365 करोड़ यानी करीब 15.9 फीसदी थी.

यानी चीन को अब उस जनसांख्यिकीय बदलाव का सामना करना पड़ रहा है जिसमें बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है और नई पीढ़ी का आकार छोटा होता जा रहा है.

नीति बदलना आसान नहीं

चीन के उदाहरण से सबसे बड़ी सीख यह निकलती है कि सरकार अगर एक बार लंबे समय तक कम बच्चों वाली सामाजिक व्यवस्था को बढ़ावा देती है, तो बाद में सिर्फ नीति बदलकर परिवारों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए तैयार करना आसान नहीं होता.

बच्चा पैदा करने का फैसला सिर्फ सरकारी प्रोत्साहन पर निर्भर नहीं करता. घर की कीमत, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, नौकरी की स्थिति, शादी की उम्र, महिलाओं की करियर प्राथमिकताएं और परिवार को लेकर बदलती सोच जैसे कई फैक्टर इसमें भूमिका निभाते हैं.

इसलिए अगर किसी समाज में छोटे परिवार को सामान्य जीवनशैली का हिस्सा मान लिया जाए, तो इसे बदलने में लंबा समय लग सकता है.

भारत और चीन में बड़ा फर्क भी है

हालांकि भारत की स्थिति को चीन के बिल्कुल समान नहीं माना जा सकता.

भारत की राष्ट्रीय TFR करीब 1.9 है, जबकि चीन में प्रजनन दर इससे काफी नीचे है. साथ ही भारत के सभी राज्यों में जनसांख्यिकीय बदलाव एक जैसी रफ्तार से नहीं हुआ है.

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में प्रजनन दर अभी भी देश के कई दूसरे राज्यों से ज्यादा है. दूसरी तरफ दक्षिण भारत के कई राज्यों में यह काफी नीचे पहुंच चुकी है.

यानी भारत के सामने एक ऐसी स्थिति है जिसमें देश के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग जनसांख्यिकीय दौर से गुजर रहे हैं.

एक ही नीति से पूरे देश को देखना मुश्किल

भारत की सबसे बड़ी चुनौती यही क्षेत्रीय अंतर हो सकता है.

कुछ राज्यों में युवा आबादी अभी भी बड़ी है और वहां आने वाले वर्षों में कामकाजी लोगों की संख्या बढ़ सकती है. दूसरी तरफ कम प्रजनन दर वाले राज्यों में कामकाजी उम्र की आबादी की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और बुजुर्ग आबादी का हिस्सा बढ़ सकता है.

इसका असर रोजगार, राज्यों की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक खर्च पर पड़ सकता है.

EAC-PM की रिपोर्ट इसी वजह से राष्ट्रीय औसत के बजाय राज्यों के अलग-अलग जनसांख्यिकीय प्रोफाइल को समझने पर जोर देती है.

क्या भारत को जनसंख्या नियंत्रण की पुरानी नीति बदलनी चाहिए?

EAC-PM की रिपोर्ट का एक प्रमुख तर्क यही है कि भारत को जनसंख्या घटाने को सरकारी नीति का लक्ष्य मानने के नजरिए पर दोबारा विचार करना चाहिए.

रिपोर्ट में जनसंख्या नियंत्रण, प्रजनन दर घटाने और आबादी स्थिरीकरण से जुड़ी भाषा को नीतिगत दस्तावेजों से हटाने की सिफारिश की गई है. साथ ही नसबंदी से जुड़े कुछ प्रोत्साहन और दो-बच्चे के मानदंड से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा की बात भी कही गई है.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि परिवार नियोजन या गर्भनिरोधक सेवाओं को खत्म किया जाए.

रिपोर्ट खुद जनसंख्या नियंत्रण और प्रजनन स्वास्थ्य के बीच अंतर करती है. किसी दंपति को अगर बच्चे पैदा करने में अंतर रखना है या परिवार का आकार सीमित रखना है, तो उसे जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं और गर्भनिरोधक विकल्प उपलब्ध रहना चाहिए.

मुद्दा यह है कि सरकार का लक्ष्य लोगों की व्यक्तिगत पसंद तय करना नहीं, बल्कि बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति के हिसाब से अपनी नीति को अपडेट करना हो.

भारत के पास अभी बदलाव का मौका

भारत के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अभी चीन जैसी जनसांख्यिकीय स्थिति में नहीं पहुंचा है.

देश की कुल प्रजनन दर 1.9 है और कई राज्यों में यह दो दशक से ज्यादा समय से रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है. इसका मतलब है कि बदलाव शुरू हो चुका है, लेकिन देश की पूरी आबादी अभी एक जैसी उम्र संरचना में नहीं पहुंची है.

यही वह समय है जब सरकार को यह देखना होगा कि आने वाले दशकों में भारत को कितने युवा कामगार मिलेंगे, बुजुर्गों की संख्या कितनी बढ़ेगी और स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा पर कितना दबाव आएगा.

चीन का अनुभव बताता है कि जनसंख्या नीति में दिशा बदलना संभव है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक व्यवहार में बदलाव लाना उससे कहीं ज्यादा मुश्किल हो सकता है.

इसलिए भारत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश की आबादी कितनी बढ़ेगी. बड़ा सवाल यह है कि 2047 और उसके बाद भारत की आबादी की उम्र, कामकाजी क्षमता और राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय संतुलन कैसा होगा.

EAC-PM की रिपोर्ट इसी बदलती तस्वीर को पहचानने और पुरानी जनसंख्या नीति को नई वास्तविकता के हिसाब से देखने की जरूरत पर जोर देती है.