भारत की अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही की 7.8 फीसदी ग्रोथ को लेकर बहस तेज हो गई है. सरकार इसे मजबूत प्रदर्शन बता रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वैश्विक अनिश्चितता, महंगे तेल और सप्लाई चेन की दिक्कतों के बावजूद भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है.
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दूसरी तरफ आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस आंकड़े पर सवाल उठाए हैं. राजन ने रोजगार, निजी निवेश और विदेशी निवेश की रफ्तार पर चिंता जताई है. वहीं गर्ग ने अलग गणना के आधार पर जून तिमाही की ग्रोथ करीब 2.6 फीसदी बताई है. इसी से जीडीपी के आंकड़ों पर नई बहस शुरू हुई है.
सरकार 7.8 फीसदी की ग्रोथ को कैसे सही बता रही
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही, यानी अप्रैल से जून, में भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ 7.8 फीसदी रही. रियल जीडीपी का मतलब है कि महंगाई के असर को हटाकर अर्थव्यवस्था में असली बढ़त कितनी हुई. पिछले साल इसी तिमाही में ग्रोथ 6.9 फीसदी थी. इस आधार पर सरकार का कहना है कि अर्थव्यवस्था ने इस बार ज्यादा तेजी दिखाई.
मुख्य आंकड़े. • नई सीरीज के मुताबिक पहली तिमाही की रियल जीडीपी 81.36 लाख करोड़ रुपये रही. • तुलना वाली पिछली समान तिमाही में यह 75.46 लाख करोड़ रुपये थी. • मौजूदा कीमतों पर नॉमिनल जीडीपी 80 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपये हो गई. • नॉमिनल जीडीपी में करीब 10.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
2.6 फीसदी का आंकड़ा कहां से आया
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कुछ जीडीपी आंकड़ों के आधार पर कहा कि अगर पिछले साल के आंकड़ों से तुलना की जाए तो ग्रोथ करीब 2.6 फीसदी बैठती है. सरकार ने इस तरीके को गलत बताया है. सरकारी सूत्रों के मुताबिक यह आंकड़ा निकालते समय जीडीपी की दो अलग सीरीज के आंकड़ों को साथ जोड़ दिया गया.
सरकार का कहना है कि जीडीपी की गणना में आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया है. इसके साथ ही आंकड़ों के स्रोत, अलग-अलग क्षेत्रों का वजन, गणना का तरीका और कीमतों को शामिल करने का तरीका भी बदला है. ऐसे में पुरानी सीरीज और नई सीरीज के आंकड़ों की सीधी तुलना करने से नतीजा गड़बड़ हो सकता है.
आसान भाषा में बात करें तो अगर मापने का तरीका बदल जाए, तो पुराने और नए नतीजों की सीधी तुलना करना मुश्किल हो जाता है. सरकार यही दलील दे रही है कि 2.6 फीसदी वाला हिसाब इसी वजह से सही नहीं है.
रियल और नॉमिनल जीडीपी में फर्क क्या है
रियल जीडीपी में कीमतों के असर को हटाने की कोशिश होती है, जबकि नॉमिनल जीडीपी मौजूदा कीमतों पर गिनी जाती है. इसी वजह से दोनों आंकड़ों में फर्क दिखता है. सरकार ने यह भी कहा है कि जीडीपी डिफ्लेटर को सीपीआई या डब्ल्यूपीआई जैसे महंगाई के दूसरे आंकड़ों से सीधे नहीं मिलाना चाहिए, क्योंकि जीडीपी में सिर्फ लोगों की खरीदारी ही नहीं, बल्कि निवेश, सरकारी सेवाएं, निर्यात और देश में बनी कुल आर्थिक वैल्यू भी शामिल होती है.
आंकड़ों के अंतर पर भी चर्चा
सरकारी सूत्रों के मुताबिक जीडीपी को उत्पादन और खर्च, दोनों तरीकों से मापा जाता है. इन दोनों से निकले नतीजों में जो फर्क रह जाता है, उसे आंकड़ों का अंतर कहा जाता है. सूत्रों का कहना है कि पहली तिमाही में इस अंतर की दिशा बदली और इसका ताजा ग्रोथ रेट पर करीब 3.2 फीसदी अंक का असर पड़ा. सरकार का दावा है कि अगर इस असर को अलग करके खर्च वाले आंकड़े देखें, तो वहां भी अच्छी ग्रोथ दिखती है.
रघुराम राजन ने क्या सवाल उठाए
रघुराम राजन का कहना है कि सिर्फ जीडीपी का ऊंचा आंकड़ा काफी नहीं है. अगर अर्थव्यवस्था तेज बढ़ रही है, तो इसका असर अच्छी नौकरियों, निजी निवेश और विदेशी निवेश पर भी साफ दिखना चाहिए. उनका कहना है कि भारत की बड़ी युवा आबादी तभी ताकत बनेगी, जब उसे रोजगार और सही मौके मिलेंगे. अगर ऐसा नहीं होता, तो यही बात आगे चलकर चुनौती बन सकती है.
सरकार की तरफ से क्या जवाब आया
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने नई जीडीपी सीरीज का बचाव किया है. उनका कहना है कि आधार वर्ष को बदलना जरूरी था और नई सीरीज आज की अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से दिखाती है. सान्याल के मुताबिक मजबूत जीडीपी की झलक दूसरे संकेतों में भी दिख रही है, जैसे कंपनियों का मुनाफा और कारों की बिक्री.
एक नजर में पूरी बहस
• सरकार 7.8 फीसदी की ग्रोथ को नई जीडीपी सीरीज के हिसाब से सही बता रही है. • सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि अलग गणना से ग्रोथ करीब 2.6 फीसदी निकलती है. • सरकार का जवाब है कि पुरानी और नई सीरीज को मिलाकर तुलना करना सही नहीं है. • रघुराम राजन का ध्यान इस बात पर है कि ग्रोथ का असर नौकरियों, निवेश और आमदनी पर कितना दिख रहा है.
फिलहाल बहस सिर्फ 7.8 फीसदी और 2.6 फीसदी के बीच नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि तेज ग्रोथ का फायदा आम लोगों तक कितनी तेजी से पहुंच रहा है. आने वाले समय में नौकरियां, निवेश और आम आदमी की कमाई ही इस आर्थिक कहानी का सबसे बड़ा पैमाना होंगी.
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