देश में जून 2026 के दौरान खुदरा महंगाई (Retail Inflation) बढ़कर 4.38% पर पहुंच गई है. मई में यह 3.93% थी. खास बात यह है कि करीब 17 महीने बाद रिटेल महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4% के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर निकल गई है.महंगाई में यह बढ़ोतरी ऐसे समय आई है जब पिछले कुछ महीनों से कीमतों में नरमी देखने को मिल रही थी. जून में खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों में तेजी ने महंगाई को फिर ऊपर धकेल दिया.
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अनुमान से ज्यादा रही महंगाई
रॉयटर्स के सर्वे के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों ने जून में महंगाई 4.30 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था. लेकिन असली आंकड़ा इससे थोड़ा ज्यादा रहा.पिछले महीने भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया था. साथ ही उसने कहा था कि मार्च 2027 पर खत्म होने वाले वित्त वर्ष में महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है.
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी
- ईंधन की बढ़ती लागत
- पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव
- कमजोर मानसून की आशंकाएं, जिससे कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी
RBI के लिए क्यों अहम है यह आंकड़ा?
RBI के मुताबिक, ईंधन के ऊंचे दाम और एल नीनो से फसल पर पड़ने वाले खतरे की वजह से महंगाई बढ़ सकती है. बैंक ने इस अवधि के लिए 5.1 फीसदी महंगाई का अनुमान रखा है.आरबीआई ने बार-बार कहा है कि उसकी नजर खास तौर पर कोर महंगाई पर है. अभी यह बहुत बड़ी चिंता नहीं बनी है, लेकिन अगर खाना और ऊर्जा लंबे समय तक महंगे रहे, तो कच्चे माल, ढुलाई और कामकाज की लागत बढ़ सकती है.आरबीआई का कहना है कि ऐसी स्थिति में आगे चलकर कोर महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है. इसी वजह से महंगाई का यह रुझान अहम माना जा रहा है.
तेल की कीमतों का असर
जून में अमेरिका और ईरान के बीच थोड़े समय के लिए संघर्ष रुका था, लेकिन पिछले हफ्ते दोनों पक्षों के बीच तनाव फिर बढ़ गया. हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बढ़ने से दुनिया भर में तेल की कीमतें ऊपर गई हैं.यह समुद्री रास्ता दुनिया में तेल और गैस की सप्लाई के लिए बहुत अहम है. भारत अपनी ईंधन जरूरत का करीब 85 फीसदी आयात करता है, इसलिए वहां किसी भी रुकावट का असर भारत पर जल्दी पड़ सकता है.भारत अपने कच्चे तेल के करीब 50 फीसदी आयात, एलएनजी के 60 फीसदी आयात और लगभग पूरी एलपीजी सप्लाई के लिए इसी रास्ते पर निर्भर है. यही वजह है कि ईंधन महंगा होने पर देश के खर्च पर सीधा दबाव बढ़ता है.
मानसून और खेती पर क्या असर है
देश के कई हिस्सों में पिछले दो हफ्तों में भारी बारिश और बाढ़ देखने को मिली है, लेकिन इसके बावजूद कमजोर मानसून का खतरा बना हुआ है. भारत पर इस साल एल नीनो का असर पड़ने का जोखिम भी है.क्रिसिल के मुताबिक, सूखे जून के बाद मानसून ने तेज रफ्तार पकड़ी और 8 जुलाई तक पूरे देश में बारिश की कमी 40 फीसदी से घटकर 15 फीसदी रह गई. दूसरी तरफ, मौसम विभाग का अनुमान है कि जुलाई में बारिश लंबी अवधि के औसत से 6 फीसदी कम रह सकती है.
CRISIL क्रिसिल का कहना है कि कभी बहुत कम और कभी बहुत ज्यादा बारिश, खेती पर उतना ही बुरा असर डाल सकती है जितना कमजोर मानसून. इससे बुवाई के फैसले, फसल की हालत और गांवों की आमदनी प्रभावित हो सकती है.
नतीजा क्या निकलता है
जून में खुदरा महंगाई बढ़ने के पीछे दो बड़े कारण साफ दिख रहे हैं.
- पहला, अमेरिका-ईरान तनाव से महंगा होता ईंधन
- दूसरा, मौसम की अनिश्चितता से बढ़ता खाद्य दबाव
RBI, CRISIL और मौसम विभाग के आकलन से यही संकेत मिलता है कि आने वाले महीनों में महंगाई पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा. अगर तेल और खाने की कीमतों का दबाव बना रहा, तो इसका असर आम लोगों के खर्च और अर्थव्यवस्था की रफ्तार दोनों पर पड़ सकता है.
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