महंगी चीनी पर सरकार का बड़ा फैसला! इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का रस और शीरा रोकने की तैयारी, पूरी डिटेल

सौरभ दीक्षित

• 01:34 PM • 06 Oct 2026

भारत में गन्ने से सिर्फ चीनी ही नहीं बनती. गन्ने से एथनॉल भी बनाया जाता है. पिछले कुछ सालों में सरकार ने पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का लक्ष्य बढ़ाया है. इसी वजह से चीनी मिलों को गन्ने के रस, सिरप और अलग-अलग तरह के शीरे से एथनॉल बनाने की अनुमति दी गई. इसका फायदा यह हुआ कि देश में एथनॉल का उत्पादन बढ़ा और पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिली.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

चीनी की कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा रखी है

देश में चीनी का उत्पादन और कम हो सकता है

सरकार चीनी की सप्लाई बनाए रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है

चीनी की कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा रखी है. बाजार में चीनी पहले के मुकाबले महंगी है और अब सरकार को डर है कि आने वाले सीजन में देश में चीनी का उत्पादन और कम हो सकता है. वजह है बारिश की कमी. खासकर महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में मानसून की बारिश सामान्य से कम रही है.

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ऐसे में सरकार अब चीनी की घरेलू सप्लाई बनाए रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. सरकार अगले एथनॉल सप्लाई वर्ष यानी 2026-27 से गन्ने के रस और B-Heavy शीरे को एथनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल करने पर रोक लगा सकती है. सीधी भाषा में समझें तो सरकार चाहती है कि फिलहाल गन्ने से जितनी चीनी बन सकती है, उसका बड़ा हिस्सा चीनी के रूप में ही बाजार में आए. उसे एथनॉल बनाने में डायवर्ट न किया जाए.

आखिर सरकार को ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ रहा है?

इसके पीछे सीधी वजह है चीनी की सप्लाई. भारत में गन्ने से सिर्फ चीनी ही नहीं बनती. गन्ने से एथनॉल भी बनाया जाता है. पिछले कुछ सालों में सरकार ने पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का लक्ष्य बढ़ाया है. इसी वजह से चीनी मिलों को गन्ने के रस, सिरप और अलग-अलग तरह के शीरे से एथनॉल बनाने की अनुमति दी गई. इसका फायदा यह हुआ कि देश में एथनॉल का उत्पादन बढ़ा और पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिली.

लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. अगर गन्ने की फसल कम हुई और उसका एक हिस्सा एथनॉल बनाने में चला गया, तो बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हो सकती है. सरकार इसी स्थिति से बचना चाहती है. मौजूदा एथनॉल सप्लाई वर्ष में करीब 30 लाख टन चीनी एथनॉल बनाने के लिए डायवर्ट की गई. यह कुल चीनी उत्पादन का करीब 10 फीसदी है. सरकार अब चाहती है कि आने वाले सीजन में इतनी बड़ी मात्रा में चीनी को एथनॉल की तरफ न मोड़ा जाए.

सरकार की योजना के मुताबिक 1 नवंबर से शुरू होने वाले 2026-27 एथनॉल सप्लाई वर्ष में चीनी मिलों को गन्ने का रस और B-Heavy शीरा एथनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. हालांकि C-Heavy शीरे से एथनॉल बनाने की अनुमति जारी रहने की संभावना है.

अब सवाल है कि ये B-Heavy और C-Heavy शीरा क्या होता है? गन्ने से चीनी निकालने की प्रक्रिया में अलग-अलग तरह के शीरे निकलते हैं. B-Heavy शीरे में चीनी की मात्रा C-Heavy शीरे के मुकाबले ज्यादा होती है. इसलिए B-Heavy शीरे को एथनॉल बनाने में इस्तेमाल करने से ज्यादा चीनी एथनॉल की तरफ चली जाती है. वहीं C-Heavy शीरे में चीनी की मात्रा कम होती है.

इसलिए सरकार C-Heavy शीरे से एथनॉल बनाने की अनुमति देकर एक तरह से बीच का रास्ता निकाल सकती है. इससे एथनॉल का उत्पादन पूरी तरह बंद नहीं होगा और चीनी की सप्लाई पर भी दबाव कम किया जा सकेगा.

Ethanol का क्या होगा?

यहां एक और बड़ा सवाल है. भारत ने पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का लक्ष्य बढ़ाया है. ऐसे में अगर चीनी मिलों से मिलने वाला एथनॉल कम हो गया तो जरूरत कैसे पूरी होगी? इसका जवाब है अनाज. आंकड़े बताते हैं कि एथनॉल बनाने में चीनी आधारित कच्चे माल की हिस्सेदारी पहले ही घट रही है और अनाज आधारित एथनॉल का हिस्सा बढ़ रहा है. 2025-26 एथनॉल सप्लाई वर्ष में करीब 2,750 मिलियन लीटर एथनॉल चीनी आधारित कच्चे माल से आया. यह कुल जरूरत का करीब 26 फीसदी था. वहीं करीब 7,610 मिलियन लीटर एथनॉल अनाज आधारित स्रोतों से आया. इसमें मक्का और चावल की बड़ी भूमिका रही. मक्का से करीब 5,180 मिलियन लीटर और चावल से करीब 3,050 मिलियन लीटर एथनॉल मिलने का अनुमान है.

अगर सरकार गन्ने के रस और B-Heavy शीरे को एथनॉल बनाने से रोकती है, तो अगले एथनॉल सप्लाई वर्ष में चीनी आधारित कच्चे माल की हिस्सेदारी घटकर करीब 10 से 12 फीसदी रह सकती है. यानी एथनॉल के लिए देश को अनाज पर और ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है.

अब आते हैं उस वजह पर, जिसने सरकार की चिंता बढ़ाई है. देश में चीनी उत्पादन के लिहाज से महाराष्ट्र और कर्नाटक बेहद महत्वपूर्ण राज्य हैं. लेकिन इस साल इन इलाकों में मानसून की बारिश कम रही है. कम बारिश का सीधा असर गन्ने की फसल पर पड़ सकता है. अगर गन्ने की पैदावार कम हुई, तो चीनी का उत्पादन भी प्रभावित होगा. वैसे भी पिछले कुछ वर्षों में चीनी उत्पादन पर दबाव दिखा है.

2021-22 सीजन में एथनॉल के लिए चीनी डायवर्ट करने के बाद चीनी का उत्पादन करीब 35.8 मिलियन टन था. 2025-26 सीजन में यह घटकर करीब 28.1 मिलियन टन रह गया. दूसरी तरफ चीनी की खपत बढ़ रही है. पिछले पांच सीजन में चीनी की खपत करीब 27.3 मिलियन टन से बढ़कर 28.7 मिलियन टन हो गई है. यानी उत्पादन नीचे और खपत ऊपर. यही गणित सरकार के लिए चिंता का कारण है.

चीनी की कीमत पहले ही 20 फीसदी बढ़ चुकी है. इसका असर आम आदमी की जेब पर भी दिख रहा है. सोमवार को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 55.28 रुपये प्रति किलो रही. यह एक साल पहले के मुकाबले करीब 20 फीसदी ज्यादा है. हालांकि अच्छी बात यह है कि पिछले एक महीने में चीनी की कीमत करीब 10 फीसदी कम हुई है. सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक आने वाले दिनों में कीमत करीब 52 रुपये प्रति किलो तक नीचे आ सकती है.

क्योंकि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में अगले दो हफ्तों में गन्ने की पेराई शुरू होने वाली है. जब नई फसल से चीनी बाजार में आने लगेगी तो सप्लाई बढ़ सकती है और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. 

पांच साल में एथनॉल के लिए चीनी डायवर्जन करीब चार गुना

यहां एक आंकड़ा पूरी कहानी समझने में मदद करता है. क्रिसिल के विश्लेषण के मुताबिक 2019-20 में एथनॉल बनाने के लिए करीब 8 लाख टन चीनी डायवर्ट की गई थी. 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 30 लाख टन हो गया. यानी सिर्फ पांच साल में एथनॉल के लिए चीनी डायवर्ट होने की मात्रा करीब चार गुना बढ़ गई. इसका एक कारण सरकार की एथनॉल नीति है. भारत पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. लेकिन अब सरकार को दो लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना है. एक तरफ पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का लक्ष्य है. दूसरी तरफ लोगों के लिए बाजार में पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध रखना भी जरूरी है.