Trump Tariff : भारत पर 100% अमेरिकी टैरिफ का खतरा बढ़ा, जानिए रूस के तेल से कैसे जुड़ा है पूरा मामला

तनीषा त्यागी

• 01:33 PM • 20 Sep 2026

ट्रंप के नए कानून से भारत पर 100 फीसदी अमेरिकी टैरिफ का खतरा बढ़ा है. अभी शुल्क लागू नहीं हुआ, लेकिन रूसी तेल खरीद, निर्यात और महंगाई पर असर पड़ सकता है.

Trump 100% Tariff Impact India
रूसी तेल के बड़े खरीदारों पर 100% टैरिफ का बढ़ा खतरा. (File Photo: ITG)
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न्यूज़ हाइलाइट्स

नया अमेरिकी कानून रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ाता

भारत पर अभी कोई 100 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लागू नहीं हुआ है

अमेरिका भारत के कई निर्यात सेक्टरों के लिए बड़ा बाजार बना हुआ

Trump Tariff : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक नए फैसले के बाद भारत के लिए अमेरिकी टैरिफ का जोखिम एक बार फिर बढ़ गया है. ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले एक कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है. हालांकि, यहां एक अहम बात समझना जरूरी है. इस कानून के साइन होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तुरंत 100 फीसदी टैरिफ लागू हो गया है. फिलहाल यह अमेरिकी राष्ट्रपति के पास मौजूद एक अतिरिक्त विकल्प है, जिसका इस्तेमाल परिस्थितियों के आधार पर किया जा सकता है.

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क्या है नया अमेरिकी कानून ?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026' नाम के कानून पर हस्ताक्षर किए हैं. इस कानून का फोकस रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़ा है. कानून के तहत राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है, जो रूस से तेल और गैस जैसी ऊर्जा खरीदते हैं. इसमें भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदार भी शामिल हैं. इसका मतलब यह है कि अगर अमेरिकी प्रशासन आगे चलकर इस अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो भारत से अमेरिका जाने वाले कुछ सामान पर 100 फीसदी तक का अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है. लेकिन अभी ऐसा कोई 100 फीसदी टैरिफ भारत पर लागू नहीं हुआ है. यही वजह है कि फिलहाल इसे भारत के लिए एक संभावित जोखिम के तौर पर देखा जा रहा है, न कि लागू हो चुके नए टैरिफ के तौर पर.

भारत को लेकर चिंता क्यों बढ़ी

भारत और रूस के बीच ऊर्जा कारोबार इस पूरे मामले का एक अहम हिस्सा है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना शुरू किया. इसके चलते रूसी तेल भारत के लिए कच्चे तेल के प्रमुख स्रोतों में शामिल हो गया. अमेरिका का नया कानून इसी तरह की खरीद पर दबाव बढ़ाने की दिशा में एक कदम है. अगर भारत पर आगे चलकर भारी टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर सिर्फ ऊर्जा कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा. भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है. यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को भारत के एक्सपोर्ट और एनर्जी सिक्योरिटी, दोनों के नजरिए से देखा जा रहा है.

भारतीय एक्सपोर्ट पर क्या असर पड़ सकता है

भारत और अमेरिका के बीच बड़ा कारोबारी रिश्ता है. भारत से अमेरिका को टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग गुड्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, केमिकल्स और कई दूसरे उत्पादों का निर्यात किया जाता है. अगस्त 2026 में भारत का अमेरिका को माल निर्यात करीब 8.4 अरब डॉलर रहा. यह आंकड़ा एक साल पहले की तुलना में 21.83 फीसदी ज्यादा था.

ऐसे में अगर अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर बहुत ऊंचा टैरिफ लगाता है, तो भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं. कीमत बढ़ने की स्थिति में अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों से आने वाले समान उत्पादों का रुख कर सकते हैं. इसका असर भारतीय एक्सपोर्टर्स पर पड़ सकता है. खासकर वे कंपनियां और सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं, जिनकी अमेरिकी बाजार पर निर्भरता ज्यादा है.

कंपनियों और रोजगार पर भी पड़ सकता है असर

टैरिफ बढ़ने का सीधा असर सिर्फ किसी एक कंपनी के कारोबार पर नहीं पड़ता. अगर भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में महंगा हो जाता है, तो कंपनियों के लिए वहां अपने उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना मुश्किल हो सकता है. अगर एक्सपोर्ट ऑर्डर में कमी आती है, तो उत्पादन, बिक्री और कंपनियों की कमाई पर दबाव बन सकता है. इसका असर उन सेक्टर्स में रोजगार से जुड़ी गतिविधियों पर भी पड़ सकता है, जो अमेरिकी बाजार को बड़ी मात्रा में सामान भेजते हैं. हालांकि, वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन टैरिफ का इस्तेमाल किस स्तर पर करता है और किन उत्पादों को इसके दायरे में रखा जाता है.

रूस से सस्ता तेल खरीदना बनेगा चुनौती

इस पूरे मामले का दूसरा और बेहद अहम पहलू रूस से मिलने वाला कच्चा तेल है. अगर अमेरिकी दबाव बढ़ता है और भारत को रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करनी पड़ती है, तो भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे देशों से ज्यादा तेल खरीदना पड़ सकता है. अगर दूसरे स्रोतों से मिलने वाला कच्चा तेल महंगा पड़ता है, तो भारत का कुल इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है. इससे देश के व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ने की संभावना बन सकती है. कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की स्थिति में यह दबाव और बढ़ सकता है.

रुपये और महंगाई पर असर

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है. ऐसे में तेल का आयात महंगा होने पर देश को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं. इससे व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव बनने की संभावना रहती है. दूसरी तरफ महंगे कच्चे तेल का असर अर्थव्यवस्था की लागत पर भी पड़ सकता है. क्रूड महंगा होने पर पेट्रोल और डीजल की लागत से लेकर ट्रांसपोर्ट और दूसरी कई गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर आगे चलकर महंगाई से जुड़े दबाव में भी दिखाई दे सकता है. यानी भारत के सामने इस पूरे मामले में दो अलग-अलग स्तरों पर चुनौती है. एक तरफ अमेरिका को होने वाले एक्सपोर्ट पर भारी टैरिफ का खतरा है और दूसरी तरफ रूस से मिलने वाले कच्चे तेल की खरीद पर अमेरिकी दबाव बढ़ सकता है.

भारत सरकार का क्या रुख है ?

भारत की तरफ से यह स्पष्ट किया गया है कि देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले करेगा. इस बीच अमेरिकी कानून के तहत राष्ट्रपति को टैरिफ के स्तर और उसके इस्तेमाल को लेकर व्यापक अधिकार दिए गए हैं. इसलिए आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि ट्रंप प्रशासन इस अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है. फिलहाल भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि क्या अमेरिका वास्तव में भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाता है और अगर ऐसा होता है, तो इसका दायरा कितना बड़ा होगा.

अभी 100% टैरिफ लागू नहीं हुआ है

इस पूरे घटनाक्रम को समझते समय सबसे जरूरी बात यही है कि भारत पर 100 फीसदी अमेरिकी टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है. नए कानून ने अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार दिया है, लेकिन इसका इस्तेमाल कब और किस तरह किया जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है. इसलिए फिलहाल भारत के लिए यह एक बढ़ा हुआ ट्रेड रिस्क है. आगे अमेरिकी प्रशासन के फैसले, भारत के रूसी तेल आयात और दोनों देशों के बीच ट्रेड बातचीत पर नजर रहेगी. अगर अमेरिका भारत के खिलाफ इस अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो उसका असर सिर्फ भारत-अमेरिका व्यापार तक सीमित नहीं रह सकता. भारतीय एक्सपोर्ट, कंपनियों, ऊर्जा आयात, व्यापार घाटे, रुपये और महंगाई तक इसका प्रभाव पहुंच सकता है. आने वाले समय में सबसे अहम बात यही होगी कि भारत और अमेरिका इस टैरिफ जोखिम को किस तरह संभालते हैं और रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत की नीति किस दिशा में आगे बढ़ती है.

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