India-US Trade Deal: 12.5% अतिरिक्त टैरिफ पर भारत का सख्त रुख, अमेरिका से कहा- व्यापार बातचीत से चले, एकतरफा फैसलों से नहीं

तनीषा त्यागी

• 03:27 PM • 12 Jul 2026

अमेरिका के 12.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ प्रस्ताव पर भारत ने कड़ा विरोध जताया है. जानिए USTR जांच, चावल विवाद और आगे व्यापार वार्ता पर इसका क्या असर पड़ सकता है.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

अमेरिका ने 54 देशों के आयात पर 12.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ सुझाया

भारत ने कहा व्यापार विवाद का हल केवल बातचीत और संतुलन से

सरकार ने USTR रिपोर्ट में ठोस सबूत और स्पष्टता की कमी बताई

India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत के बीच एक नया विवाद सामने आ गया है. अमेरिका ने भारत सहित कई देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर 12.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है. इस प्रस्ताव पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है और अमेरिका से इस फैसले की समीक्षा करने की मांग की है.

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भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बीच नया विवाद

भारत का कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार से जुड़े किसी भी मुद्दे का समाधान एकतरफा टैरिफ या दबाव की नीति से नहीं, बल्कि आपसी बातचीत और द्विपक्षीय व्यापार वार्ता के जरिए निकाला जाना चाहिए. भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन किसी भी विवाद का समाधान संतुलित और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए.

USTR की जांच क्या है?

पूरा मामला अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि यानी USTR की सेक्शन 301 जांच से जुड़ा हुआ है. इस जांच में यह आरोप लगाया गया कि कई देशों में जबरन मजदूरी यानी फोर्स्ड लेबर से तैयार उत्पादों के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. इसी जांच के आधार पर भारत सहित 54 देशों से अमेरिका आने वाले उत्पादों पर 12.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया. हालांकि भारत ने इस जांच की प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

भारत ने रिपोर्ट की कमियों की ओर किया इशारा

सार्वजनिक सुनवाई के दौरान कॉमर्स डिपार्टमेंट के संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने कहा कि भारत जबरन मजदूरी को खत्म करना अपनी कानूनी और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी मानता है. उन्होंने कहा कि भारत इस विषय को पूरी गंभीरता से लेता है और अंतरराष्ट्रीय नियमों तथा सिद्धांतों का सम्मान करता है. भारत का कहना है कि USTR की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं. केवल यह कहना कि किसी देश में जबरन मजदूरी से जुड़े उत्पादों के आयात पर पूरी तरह रोक नहीं है, इसे अनुचित व्यापारिक व्यवहार का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

46 देशों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं

भारत ने अपनी आपत्ति में यह भी कहा कि USTR ने 46 अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं को एक ही श्रेणी में रखकर निष्कर्ष निकाला है, जबकि हर देश की आर्थिक परिस्थितियां, कानूनी ढांचा और व्यापार व्यवस्था अलग-अलग है. भारत के अनुसार जांच कुछ सीमित उदाहरणों और व्यापक व्यापारिक आंकड़ों पर आधारित है. रिपोर्ट में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया कि भारत की किसी नीति से अमेरिकी उद्योग को वास्तविक नुकसान पहुंच रहा है या भारतीय कंपनियों को अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल रहा है. इसी आधार पर भारत ने अमेरिका से प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ पर दोबारा विचार करने की अपील की है.

चावल के आयात को लेकर भी भारत ने दिया जवाब

सुनवाई के दौरान एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी APEDA की ओर से भी भारत का पक्ष रखा गया. वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास के प्रथम सचिव श्रेयंस गुप्ता ने अमेरिका के उस दावे का विरोध किया, जिसमें कहा गया था कि भारत में जबरन मजदूरी से उत्पादित चावल का आयात किया जाता है.

उन्होंने कहा कि भारत में चावल का आयात बेहद सीमित मात्रा में होता है और यह केवल कुछ विशेष किस्मों की मांग को पूरा करने के लिए किया जाता है. उन्होंने यह भी बताया कि भारत में आयात किए जाने वाले चावल का कुल मूल्य, अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले भारतीय चावल की तुलना में तीन फीसदी से भी कम है.

चावल निर्यात पर पहले से लागू हैं सख्त नियम

भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका को चावल निर्यात करने की अनुमति केवल उन्हीं राइस मिलों और प्रोसेसिंग यूनिट्स को दी जाती है, जो कृषि मंत्रालय के साथ पंजीकृत होती हैं. इसका मतलब है कि भारतीय चावल के निर्यात की पूरी प्रक्रिया पहले से ही तय नियमों और निगरानी व्यवस्था के तहत संचालित होती है. भारत का मानना है कि ऐसे में अमेरिकी रिपोर्ट में लगाए गए आरोप वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाते.

उद्योग जगत भी टैरिफ प्रस्ताव के खिलाफ

सरकार के अलावा भारतीय उद्योग संगठनों ने भी प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ का विरोध किया है. फिक्की का कहना है कि अतिरिक्त टैरिफ का असर केवल भारतीय निर्यातकों तक सीमित नहीं रहेगा. इससे अमेरिकी आयातकों, निर्माता कंपनियों, रिटेल कारोबार और अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं की लागत भी बढ़ेगी. FCCI के अनुसार भारत का कानूनी ढांचा, उद्योगों की अनुपालन व्यवस्था और दोनों देशों के बीच मजबूत सप्लाई चेन इस तरह के अतिरिक्त शुल्क को उचित नहीं ठहराते.

CII ने भी उठाए सबूतों पर सवाल

भारतीय उद्योग परिसंघ यानी CII ने भी प्रस्तावित 12.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ का विरोध किया है. संगठन का कहना है कि उपलब्ध तथ्यों और सबूतों के आधार पर इस तरह का अतिरिक्त शुल्क उचित नहीं ठहराया जा सकता. CII का मानना है कि USTR यह साबित करने में सफल नहीं रहा कि भारत की नीतियां अमेरिकी व्यापार पर किसी प्रकार का अनुचित बोझ डाल रही हैं.

कब शुरू हुई थी पूरी जांच?

USTR ने मार्च 2026 में सेक्शन 301 के तहत जबरन मजदूरी और अत्यधिक औद्योगिक क्षमता से जुड़े मुद्दों पर 60 अर्थव्यवस्थाओं की जांच शुरू की थी. इसके बाद जून 2026 में रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें भारत और चीन सहित 54 देशों के उत्पादों पर 12.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव सामने आया.

आगे क्या होगा?

अब नजर इस बात पर रहेगी कि अमेरिका भारत की आपत्तियों को कितना महत्व देता है और क्या प्रस्तावित टैरिफ पर दोबारा विचार करता है. फिलहाल भारत का रुख साफ है. सरकार का कहना है कि वह हर मुद्दे पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन व्यापारिक विवादों का समाधान एकतरफा फैसलों के बजाय आपसी विश्वास, संतुलित वार्ता और द्विपक्षीय सहयोग के जरिए ही निकाला जाना चाहिए.