India US Trade Deal : भारत-अमेरिका ट्रेड डील में फिर फंसा पेंच, टैरिफ से लेकर रूस और FEMA तक बने रोड़ा, जानिए पूरा मामला

सौरभ दीक्षित

• 05:55 PM • 05 Oct 2026

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत अंतिम दौर में पहुंच गई है, लेकिन टैरिफ, रूस से तेल खरीद, FEMA नियम, विदेशी बैंकों की टैक्स दर और Section 301 की जांच जैसे मुद्दे अभी भी बड़ी अड़चन बने हुए हैं. जानिए किन वजहों से भारत-अमेरिका ट्रेड डील में देरी हो रही है.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

भारत-अमेरिका ट्रेड डील की बातचीत अंतिम दौर में चल रही है

टैरिफ, रूस से तेल खरीद और FEMA के नियमों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं

Section 301 की अमेरिकी जांच से भारतीय निर्यातकों पर अतिरिक्त टैरिफ का खतरा बढ़ा

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील अभी अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंची है. दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम दौर में जरूर पहुंच गई है, लेकिन आधिकारिक समझौते पर हस्ताक्षर होने में अभी समय लग सकता है. अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि यानी USTR जेमिसन ग्रीर ने हाल ही में साफ किया है कि बातचीत अंतिम चरण में होने का मतलब यह नहीं है कि दोनों देश तुरंत समझौते पर हस्ताक्षर कर देंगे. उनकी यह टिप्पणी भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात के एक दिन बाद आई है. इससे पहले माना जा रहा था कि भारत और अमेरिका ने ट्रेड डील की ज्यादातर अहम शर्तों पर सहमति बना ली है. लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी दोनों देशों के बीच सहमति बाकी है.

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फरवरी में बनी थी ट्रेड एग्रीमेंट की रूपरेखा

भारत और अमेरिका ने फरवरी में द्विपक्षीय ट्रेड एग्रीमेंट यानी Bilateral Trade Agreement के लिए एक फ्रेमवर्क पर सहमति जताई थी. इस समझौते के तहत भारत ने अगले पांच वर्षों में करीब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की मंशा जताई थी. इसका मकसद दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाना और लंबे समय के लिए कारोबारी रिश्तों को मजबूत करना था. लेकिन अब इस डील के रास्ते में कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर बातचीत अभी बाकी है.

टैरिफ दरों को लेकर खींचतान

ट्रेड डील में सबसे अहम मुद्दों में से एक टैरिफ यानी आयात शुल्क है. भारत चाहता है कि उसे एशिया के दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों, खासकर ASEAN देशों और चीन की तुलना में बेहतर या कम टैरिफ दरें मिलें. भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर भारतीय सामान पर दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा शुल्क लगता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर हो सकती है. वहीं अमेरिका सिर्फ पारंपरिक सामान पर टैरिफ कम करने तक सीमित नहीं रहना चाहता. वह बातचीत में डिजिटल ट्रेड और मार्केट एक्सेस जैसे मुद्दों को भी शामिल करना चाहता है. यानी दोनों देशों के बीच बातचीत सिर्फ सामान के आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है. डिजिटल कारोबार और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दे भी इस डील का हिस्सा बन रहे हैं.

रूस से तेल खरीदना बना बड़ा पेंच

भारत की रूस से ऊर्जा खरीद भी ट्रेड डील में एक बड़ी अड़चन बनी हुई है. फरवरी में अमेरिका ने भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ को हटाने पर सहमति जताई थी. इसके पीछे भारत की तरफ से रूसी तेल की खरीद बंद करने की प्रतिबद्धता को एक अहम वजह माना गया था. लेकिन इसके बाद रूस को लेकर अमेरिका का रुख और सख्त हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को कानून बनाया है. इसमें रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार देशों से होने वाले आयात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है.

इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है. यही वजह है कि भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में भविष्य के टैरिफ को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. अगर रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका की शर्तें ट्रेड डील से जुड़ती हैं, तो बातचीत और जटिल हो सकती है.

FEMA के नियम भी अमेरिका की चिंता

ट्रेड डील की बातचीत में सिर्फ टैरिफ ही मुद्दा नहीं है. अमेरिका ने भारत के निवेश माहौल को लेकर भी कुछ चिंताएं जाहिर की हैं. अमेरिकी विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भारत के Foreign Exchange Management Act यानी FEMA से जुड़े नियमों का मुद्दा उठाया गया है. अमेरिका की चिंता यह है कि एक ही ग्रुप के फंड्स के लिए FDI और FPI को एक साथ नियंत्रित करने वाले नियम विदेशी निवेशकों के लिए कुछ मुश्किलें पैदा कर सकते हैं. इससे IPO में भागीदारी की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है. अमेरिका का मानना है कि ऐसे नियम विदेशी निवेशकों और कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना कुछ हद तक मुश्किल बना सकते हैं.

विदेशी बैंकों की टैक्स दर पर भी सवाल

अमेरिका ने भारत में विदेशी बैंकों पर लगने वाले टैक्स को लेकर भी सवाल उठाए हैं. अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में विदेशी बैंकों की प्रभावी टैक्स दर घरेलू बैंकों की तुलना में करीब 4.63 प्रतिशत अंक ज्यादा है. रिपोर्ट में विदेशी बैंकों के लिए प्रभावी टैक्स दर करीब 38.22 प्रतिशत बताई गई है. अमेरिका का तर्क है कि घरेलू और विदेशी बैंकों के बीच टैक्स दर में इस तरह का अंतर भारत में विदेशी बैंकों के लिए कारोबार करने की आकर्षकता को प्रभावित कर सकता है.

Section 301 की जांच से भी बढ़ी चिंता

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत के बीच एक और मामला चिंता बढ़ा रहा है. अमेरिका ने Trade Act, 1974 की Section 301 के तहत भारत को लेकर जांच शुरू की है. इस जांच में यह देखा जा रहा है कि क्या भारत के किसी क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा औद्योगिक क्षमता मौजूद है और क्या भारतीय उत्पादन अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचा रहा है.

Section 301 के तहत अमेरिका पहले भी टैरिफ जैसे कदम उठा चुका है. पहले लगाए गए टैरिफ की दर 10 प्रतिशत रही थी. अगर नई जांच के बाद भारत के खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ लगाने का फैसला होता है, तो इसका सीधा असर दोनों देशों के बीच चल रही ट्रेड डील की बातचीत पर पड़ सकता है.

इससे भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में कारोबार करना महंगा हो सकता है और भारत की ओर से भी डील को लेकर बातचीत और कठिन हो सकती है.

अभी डील पर हस्ताक्षर के लिए करना होगा इंतजार

कुल मिलाकर भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत अंतिम दौर में जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि समझौते पर तुरंत हस्ताक्षर हो जाएंगे. टैरिफ दरें, रूस से भारत की तेल खरीद, FEMA से जुड़े नियम, विदेशी बैंकों की टैक्स दर और Section 301 की जांच जैसे कई मुद्दे अभी बातचीत को प्रभावित कर रहे हैं. भारत की कोशिश है कि उसके निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर टैरिफ और प्रतिस्पर्धी स्थिति मिले. वहीं अमेरिका अपनी कंपनियों के लिए ज्यादा बाजार पहुंच और व्यापार से जुड़े नियमों में बदलाव चाहता है. यही वजह है कि दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ने के बावजूद अंतिम ट्रेड डील पर हस्ताक्षर के लिए अभी और इंतजार करना पड़ सकता है.