Rupee : अमेरिकी डॉलर को दुनिया की सबसे ताकतवर और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली करेंसी माना जाता है. ग्लोबल ट्रेड से लेकर विदेशी मुद्रा बाजार तक डॉलर की मजबूत पकड़ है. यूरो भी दुनिया की प्रमुख करेंसी में शामिल है. लेकिन अगर बात सिर्फ नोटों की संख्या यानी Currency in Circulation की करें, तो भारतीय रुपया इन दोनों से काफी आगे है. RBI के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू के मुताबिक, भारत में चलन में मौजूद रुपये के नोटों की संख्या अमेरिकी डॉलर के नोटों से करीब तीन गुना और यूरो के नोटों से लगभग छह गुना ज्यादा है. यह आंकड़ा इसलिए भी खास है क्योंकि डिजिटल पेमेंट के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद भारत में नकदी की मांग लगातार बनी हुई है.
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भारत में 176 अरब नोट चलन में
शिरीष चंद्र मुर्मू के मुताबिक, भारत में इस समय करीब 176 अरब करेंसी नोट चलन में हैं. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत हर साल अलग-अलग मूल्य के करीब 28 से 30 अरब नोट छापता रहा है. इसके साथ ही करीब 21 अरब पुराने या अनुपयोगी नोटों को हर साल चलन से बाहर किया जाता है. अगर इसकी तुलना अमेरिका और यूरोप से करें, तो अंतर काफी बड़ा नजर आता है. पिछले साल के अंत तक अमेरिका में करीब 56 अरब डॉलर के नोट और यूरो क्षेत्र में करीब 30 अरब यूरो के नोट चलन में थे. यानी नोटों की गिनती के हिसाब से भारत का रुपया डॉलर और यूरो दोनों से काफी आगे है.
ज्यादा नोट होने का मतलब ज्यादा ताकतवर करेंसी नहीं
हालांकि यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. किसी देश की करेंसी के ज्यादा नोट चलन में होने का मतलब यह नहीं है कि वह करेंसी डॉलर या यूरो से ज्यादा ताकतवर है. नोटों की संख्या कई आर्थिक और व्यवहारिक चीजों पर निर्भर करती है. इनमें देश की GDP, महंगाई, ब्याज दरें और लोगों की कैश इस्तेमाल करने की आदत शामिल हैं. भारत में कम मूल्य वाले नोटों का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में होता है. इसलिए समान रकम के लेनदेन के लिए दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा नोटों की जरूरत पड़ सकती है. इसी वजह से भारत में नोटों की संख्या ज्यादा होना मुख्य रूप से Currency Usage और Cash Economy को दिखाता है, न कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय ताकत या उसकी विनिमय दर को.
डिजिटल पेमेंट बढ़ा, फिर भी कैश की मांग कायम
भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. UPI जैसे डिजिटल माध्यमों ने छोटे से लेकर बड़े भुगतान तक लोगों की आदत बदल दी है. इसके बावजूद कैश की मांग कम नहीं हुई है. शिरीष चंद्र मुर्मू ने बताया कि डिजिटल पेमेंट बढ़ने के कारण अलग-अलग लेनदेन में नकदी की हिस्सेदारी कम हो रही है, लेकिन इसके बावजूद Currency in Circulation दोहरे अंकों की दर से बढ़ रही है. यानी लोग डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल भी कर रहे हैं और जरूरत के हिसाब से कैश भी अपने पास रख रहे हैं.
इसी स्थिति को उन्होंने Cash Paradox से जोड़ा. इसका मतलब है कि डिजिटल पेमेंट बढ़ने के बावजूद नकदी की कुल मात्रा लगातार बढ़ रही है. इससे भविष्य में कितने नोटों की जरूरत होगी, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं रहता.
RBI हर साल करोड़ों नोट क्यों छापता है
भारत जैसे बड़े देश में करेंसी नोटों की सप्लाई बनाए रखना अपने आप में एक बड़ा लॉजिस्टिक्स ऑपरेशन है. RBI को न सिर्फ नए नोटों की जरूरत का अनुमान लगाना होता है, बल्कि पुराने और खराब हो चुके नोटों को भी सिस्टम से बाहर करना पड़ता है. मुर्मू के मुताबिक, भारत हर साल करीब 28 से 30 अरब नए नोट छापता है और करीब 21 अरब नोटों को चलन से हटा देता है. इस पूरी प्रक्रिया में नोटों की मांग, उनकी उम्र, इस्तेमाल की मात्रा और अलग-अलग मूल्य के नोटों की जरूरत को ध्यान में रखा जाता है.
देशभर में कैसे पहुंचते हैं नोट
नोटों की छपाई के बाद उन्हें आम लोगों तक पहुंचाना भी एक बड़ी प्रक्रिया है. RBI अपने 19 क्षेत्रीय कार्यालयों के साथ-साथ कमर्शियल और कोऑपरेटिव बैंकों तथा सरकारी ट्रेजरी से जुड़े Currency Chests के नेटवर्क के जरिए करेंसी को अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाता है. इसके बाद बैंक शाखाओं के जरिए नोट लोगों तक पहुंचते हैं. इसके अलावा देशभर में 2.5 लाख से ज्यादा ATM और Cash Dispensers भी करेंसी वितरण में अहम भूमिका निभाते हैं. ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में Business Correspondents के जरिए भी लोगों तक नकदी पहुंचाई जाती है. यानी करेंसी का सफर नोट छापने से लेकर आम आदमी के हाथ तक पहुंचने तक कई स्तरों से होकर गुजरता है.
नोटों की उम्र बढ़ाने पर RBI का फोकस
करेंसी नोटों को बार-बार छापने और बदलने की लागत भी काफी महत्वपूर्ण है. इसी वजह से RBI नोटों की उम्र बढ़ाने के तरीकों पर भी काम कर रहा है. खबर के मुताबिक, RBI Polymer जैसे विकल्पों के इस्तेमाल के जरिए नोटों की टिकाऊ उम्र बढ़ाने और करेंसी मैनेजमेंट की लागत कम करने की कोशिश कर रहा है. अगर किसी नोट की उम्र बढ़ती है, तो उसे कम बार बदलने की जरूरत पड़ती है. इससे नोटों की छपाई और वितरण से जुड़ी लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.
आखिर रुपये के ज्यादा नोट क्या बताते हैं
भारत में 176 अरब नोटों का चलन यह बताता है कि देश की अर्थव्यवस्था में नकदी की भूमिका अभी भी काफी बड़ी है. भले ही डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन कैश की जरूरत खासकर छोटे शहरों, ग्रामीण इलाकों और रोजमर्रा के कई लेनदेन में बनी हुई है. दूसरी तरफ, नोटों की संख्या में बढ़ोतरी को भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और लोगों की बढ़ती लेनदेन जरूरतों से भी जोड़कर देखा जा सकता है. हालांकि आने वाले समय में डिजिटल पेमेंट के और विस्तार के साथ कैश के इस्तेमाल का तरीका बदल सकता है. लेकिन मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल इंडिया के दौर में भी नकदी की अपनी मजबूत जगह बनी हुई है. इसलिए रुपये का डॉलर और यूरो से आगे होना करेंसी की ताकत का नहीं, बल्कि चलन में मौजूद नोटों की संख्या का आंकड़ा है. भारत में बड़ी आबादी, अलग-अलग मूल्य के नोटों का इस्तेमाल और कैश की मजबूत मांग मिलकर रुपये के विशाल Currency in Circulation की तस्वीर पेश करते हैं.
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