ITR Filing 2026: 31 जुलाई की डेडलाइन नजदीक. रिटर्न भरते समय इन 10 गलतियों से बचें, वरना नोटिस, जुर्माना या रिफंड में हो सकती है देरी

तनीषा त्यागी

• 05:15 PM • 27 Jul 2026

31 जुलाई से पहले आईटीआर भर रहे हैं तो सही फॉर्म, पूरी आय, बैंक ब्याज और ई-वेरिफिकेशन जैसी जरूरी बातों पर ध्यान दें, वरना नोटिस या रिफंड में देरी भी हो सकती है.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

सिर्फ फॉर्म-16 के आधार पर रिटर्न भरना अब सुरक्षित नहीं

एआईएस, टीआईएस और 26एएस मिलान से डेटा गड़बड़ी जल्दी पकड़ी जाती

आयकर विभाग के पास अब लेनदेन का विस्तृत डेटा पहले से मौजूद

ITR Filing 2026: इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तारीख 31 जुलाई तेजी से करीब आ रही है. ऐसे में बड़ी संख्या में टैक्सपेयर्स अपने रिटर्न फाइल करने की तैयारी में जुटे हैं. हालांकि जल्दबाजी में की गई छोटी-सी गलती भी बाद में बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है. गलत जानकारी, अधूरी आय का खुलासा, गलत ITR फॉर्म का चयन या ई-वेरिफिकेशन भूल जाना जैसी चूक नोटिस, जुर्माने या टैक्स रिफंड में देरी की वजह बन सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि अब आयकर विभाग के पास टैक्सपेयर्स के वित्तीय लेनदेन से जुड़ा काफी विस्तृत डेटा उपलब्ध रहता है. इसलिए केवल फॉर्म-16 के आधार पर रिटर्न भरना पर्याप्त नहीं माना जा सकता.

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सिर्फ फॉर्म-16 पर भरोसा करना अब काफी नहीं

सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर और द रिचनेस अकादमी के संस्थापक तारेश भाटिया के मुताबिक सबसे बड़ी गलती टैक्स की गणना नहीं, बल्कि ऐसी आय को छोड़ देना है जिसकी जानकारी पहले से आयकर विभाग के पास मौजूद होती है. आयकर विभाग के पास AIS, TIS, फॉर्म 26AS, TDS, TCS, बैंक, म्यूचुअल फंड, ब्रोकर और अन्य रिपोर्टिंग संस्थानों से मिलने वाला डेटा मौजूद रहता है. ऐसे में रिटर्न दाखिल करने से पहले सभी रिकॉर्ड का मिलान करना जरूरी है ताकि बाद में किसी तरह का डेटा मिसमैच न हो.

1. सही ITR फॉर्म चुनना सबसे पहला कदम

रिटर्न भरने की शुरुआत सही ITR फॉर्म चुनने से होती है. असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए अलग-अलग श्रेणी के टैक्सपेयर्स के लिए अलग-अलग फॉर्म निर्धारित किए गए हैं.

  • ITR-1 उन लोगों के लिए है जिनकी सालाना आय 50 लाख रुपये तक है और जिनकी कमाई सैलरी, दो हाउस प्रॉपर्टी, ब्याज या अन्य सामान्य स्रोतों से होती है. खेती से 5,000 रुपये तक की आय भी इसमें शामिल की जा सकती है.
  • ITR-2 उन लोगों के लिए है जिन्हें बिजनेस या प्रोफेशन से आय नहीं होती लेकिन कैपिटल गेन जैसी आय होती है.
  • ITR-3 प्रोपराइटर बिजनेस या प्रोफेशन से आय वाले व्यक्तियों और HUF के लिए है.
  • ITR-4 प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम अपनाने वाले रेजिडेंट इंडिविजुअल्स, HUF और फर्म्स के लिए लागू होता है.
  • ITR-5, ITR-6 और ITR-7 क्रमशः फर्मों, कंपनियों और ट्रस्ट या चैरिटेबल संस्थाओं के लिए निर्धारित हैं.

2. टैक्स रिजीम चुनने में जल्दबाजी न करें

ओल्ड और न्यू टैक्स रिजीम में से किसी एक का चयन केवल दूसरों की सलाह या सोशल मीडिया पोस्ट देखकर नहीं करना चाहिए. हर व्यक्ति की आय, निवेश, टैक्स छूट, हाउसिंग लोन और अन्य वित्तीय स्थिति अलग होती है. इसलिए दोनों विकल्पों का हिसाब लगाने के बाद ही अपने लिए उपयुक्त टैक्स रिजीम चुननी चाहिए.

3. फॉर्म-16 के अलावा बाकी आय भी जरूर जोड़ें

कई सैलरीड कर्मचारी केवल फॉर्म-16 के आधार पर ITR भर देते हैं. जबकि बैंक ब्याज, फिक्स्ड डिपॉजिट का इंटरेस्ट, डिविडेंड, किराये की आय, कैपिटल गेन या दूसरे नियोक्ता से मिली आय जैसी जानकारी भी शामिल करना जरूरी होता है. अगर इनकम का कोई हिस्सा छूट जाता है तो बाद में आयकर विभाग स्पष्टीकरण मांग सकता है.

4. AIS, TIS और फॉर्म 26AS का मिलान जरूर करें

रिटर्न फाइल करने से पहले AIS, TIS और फॉर्म 26AS की जानकारी का मिलान करना बेहद जरूरी है. अगर किसी ट्रांजैक्शन की रिपोर्टिंग एक से ज्यादा बार दिखाई दे रही हो या जॉइंट ट्रांजैक्शन में पूरा अमाउंट आपके PAN से जुड़ गया हो तो उसे स्पष्ट करना चाहिए. ऐसा नहीं करने पर डेटा मिसमैच हो सकता है और बाद में नोटिस आने की संभावना बढ़ जाती है.

5. विदेशी संपत्ति की जानकारी छिपाना भारी पड़ सकता है

विदेश में बैंक खाता, शेयर, ब्रोकरेज अकाउंट, ESOP या अन्य विदेशी संपत्ति रखने वाले टैक्सपेयर्स को उसकी जानकारी ITR में सही तरीके से देनी चाहिए. विशेषज्ञों का कहना है कि कई देशों के बीच वित्तीय जानकारी साझा होती है. इसलिए ऐसी जानकारी छिपाने पर भारी पेनाल्टी लग सकती है.

6. कैपिटल गेन और कैपिटल लॉस दोनों की रिपोर्टिंग करें

कई निवेशकों को लगता है कि शेयर या म्यूचुअल फंड बेचने के बाद अगर पैसा खर्च नहीं किया गया तो टैक्स नहीं लगेगा. जबकि ऐसा नहीं है. कैपिटल गेन और कैपिटल लॉस दोनों की सही जानकारी ITR में देना जरूरी है. गलत रिपोर्टिंग से टैक्स लाभ भी प्रभावित हो सकता है.

7. प्रॉपर्टी से जुड़ी जानकारी पूरी दें

अगर आपने प्रॉपर्टी बेची है, किराये पर दी है या आपके पास एक से ज्यादा मकान हैं तो उनकी सही जानकारी देना जरूरी है. सेल डीड, खरीद लागत, सुधार पर हुए खर्च और ओनरशिप से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखें और रिटर्न में सही जानकारी दर्ज करें.

8. बैंक ब्याज को नजरअंदाज न करें

कई टैक्सपेयर्स बचत खाते, FD, RD या इनकम टैक्स रिफंड पर मिलने वाले ब्याज की जानकारी देना भूल जाते हैं. अगर किसी बैंक का ब्याज फॉर्म-16 में नहीं दिख रहा है तब भी उसे ITR में शामिल करना जरूरी होता है.

9. नौकरी बदलने पर दोनों कंपनियों की आय जोड़ें

अगर वित्त वर्ष के दौरान नौकरी बदली है तो पुराने और नए दोनों नियोक्ताओं से मिली सैलरी को एक साथ दिखाना जरूरी है. सिर्फ मौजूदा कंपनी के फॉर्म-16 के आधार पर रिटर्न भरने से आय अधूरी दिखाई दे सकती है.

10. बैंक खाता और IFSC अपडेट रखें

रिफंड समय पर पाने के लिए सही बैंक खाता, IFSC कोड और प्री-वैलिडेटेड अकाउंट होना जरूरी है. गलत या अपडेट न किए गए बैंक विवरण की वजह से टैक्स रिफंड अटक सकता है.

ई-वेरिफिकेशन करना बिल्कुल न भूलें

कई लोग ITR भरने के बाद सबसे जरूरी प्रक्रिया यानी ई-वेरिफिकेशन करना भूल जाते हैं. रिटर्न दाखिल करने के 30 दिनों के भीतर ई-वेरिफिकेशन या ITR-V प्रक्रिया पूरी करनी होती है. यदि तय समय के भीतर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती तो दाखिल किया गया रिटर्न अमान्य माना जा सकता है.

जल्दबाजी से बचें, रिकॉर्ड मिलाकर ही करें फाइलिंग

ITR फाइल करना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि अपनी पूरी वित्तीय जानकारी को सही तरीके से दर्ज करने की जिम्मेदारी भी है. इसलिए अंतिम तारीख का इंतजार करने के बजाय समय रहते सभी दस्तावेजों का मिलान करें, सही फॉर्म चुनें, सभी आय के स्रोत शामिल करें और रिटर्न दाखिल करने के बाद ई-वेरिफिकेशन जरूर पूरा करें. थोड़ी सी सावधानी आपको नोटिस, जुर्माने और रिफंड में होने वाली अनावश्यक देरी से बचा सकती है.