Closing Auction पर उठ रहे सवाल, भारत में क्यों नहीं चल रहा Global मॉडल?

चिराग ठाकुर

09 Aug 2026 (अपडेटेड: Aug 9 2026 3:23 PM)

एनएसई का नया सीएएस शुरू हुए एक हफ्ता हुआ है, लेकिन कम भागीदारी, कमजोर लिक्विडिटी और कैश-डेरिवेटिव समय के गैप से सही बंद भाव पर सवाल उठ रहे हैं.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

बंद भाव सूचकांकों, म्यूचुअल फंड और डेरिवेटिव सेटलमेंट के लिए अहम है

जिमीट मोदी बोले, सिर्फ नीलामी से सही कीमत तय नहीं होगी

भारत में सीएएस का हिस्सा कारोबार का सिर्फ 1.9 प्रतिशत है

NSE का नया Closing Auction Session यानी CAS शुरू हुए एक हफ्ता हो चुका है. इसे लाने का मकसद दिन की आखिरी कीमत को ज्यादा transparent और representative बनाना है. लेकिन शुरुआत के बाद अब एक अहम सवाल उठ रहा है - क्या भारत में CAS उसी तरह प्रभावी हो पाएगा, जैसा दुनिया के बड़े बाजारों में closing auctions काम करते हैं? या फिर यहां सबसे बड़ी चुनौती auction के design की नहीं, बल्कि उसमें हिस्सा लेने वाले investors और institutions की होगी?

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SAMCO Securities के फाउंडर Jimeet Modi ने इसी को लेकर कुछ अहम सवाल उठाए हैं. लेकिन इन चिंताओं को समझने से पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर Closing Auction Session है क्या और इसकी जरूरत क्यों पड़ी.

Closing price इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

दिनभर शेयर की कीमतें लगातार बदलती रहती हैं, लेकिन बाजार के लिए दिन की आखिरी कीमत बेहद महत्वपूर्ण होती है. इसी closing price का इस्तेमाल index levels, mutual funds और ETFs की valuation के साथ derivatives की settlement में भी होता है. इसलिए कोशिश रहती है कि दिन की अंतिम कीमत किसी एक छोटे trade या अचानक आई volatility से प्रभावित होने के बजाय ज्यादा representative तरीके से तय हो.

इसी वजह से दुनिया के कई बड़े stock exchanges closing price तय करने के लिए auction mechanism का इस्तेमाल करते हैं. भारत में भी CAS लाने का मकसद इसी price discovery को बेहतर बनाना है.

असली चुनौती auction नहीं, participation है

Jimeet Modi के मुताबिक, सिर्फ auction mechanism शुरू कर देने से बेहतर price discovery की गारंटी नहीं मिलती. उनके analysis के मुताबिक, global markets में closing auction इसलिए ज्यादा प्रभावी है क्योंकि institutional investors closing के समय बड़ी मात्रा में trade करते हैं. Pension funds, index funds, ETFs, proprietary trading firms और market makers मिलकर auction में काफी liquidity लाते हैं.

भारत में तस्वीर अभी अलग है. यहां participation largely voluntary है. अगर बड़े institutional investors और liquidity providers पर्याप्त संख्या में auction में हिस्सा नहीं लेते, तो order book उतना deep नहीं होगा और closing price की quality पर सवाल उठ सकते हैं.

दूसरे बाजारों से तुलना करें तो अंतर बड़ा है

बाजार Closing Auction का Daily Volume में हिस्सा
Europe 34.82%
Japan 23.80%
APAC 16.78%
United States 15.39%
India (CAS) 1.90%

यानी भारत में closing auction के दौरान होने वाली trading फिलहाल दूसरे बड़े markets के मुकाबले काफी कम है. यही Modi के analysis का अहम point है - auction liquidity पैदा नहीं करता, बल्कि मौजूद liquidity को सामने लाता है.

Cash और derivatives के बीच 25 मिनट का gap

Modi ने CAS की market structure को लेकर भी चिंता जताई है. उनके मुताबिक cash market 3:15 बजे बंद हो जाता है, जबकि futures और options की trading 3:40 बजे तक जारी रहती है. इससे करीब 25 मिनट का gap बनता है.

इस दौरान derivatives में price movement जारी रह सकती है, लेकिन underlying cash market में उसी वक्त trade करके position को hedge करने का विकल्प सीमित हो जाता है. Modi ने इसी स्थिति को लेकर एक तरह की "blind window" की चिंता जताई है.

Single auction price का असर कितना बड़ा होगा?

CAS से पहले closing price तय करने के लिए आखिरी 30 मिनट के trades का VWAP यानी Volume Weighted Average Price इस्तेमाल होता था. इसमें कई trades और उनके volumes को शामिल करके average price निकाली जाती थी.

अब CAS में एक auction के जरिए closing price तय होती है. ऐसे में अगर auction के दौरान order book shallow रहा या किसी वजह से price में असामान्य movement आया, तो उस एक price का महत्व ज्यादा हो सकता है. खासकर expiry के दिन, जब इसी closing price से बड़ी रकम की settlement जुड़ी होती है.

तो क्या CAS गलत है?

Jimeet Modi ने अपने एनालिसिस में CAS को खारिज नहीं किया है. उनका कहना है कि closing auction का concept सही है, लेकिन भारत में इसे ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए participation और market structure दोनों को मजबूत करना होगा.

इसके लिए cash और derivatives की trading को बेहतर तरीके से align करने, market-making obligations मजबूत करने, Securities Lending and Borrowing यानी SLB ecosystem को गहरा करने और auction में buy-sell imbalance की जानकारी real-time में उपलब्ध कराने जैसे कदम मदद कर सकते हैं.

आखिर में CAS की सफलता सिर्फ उसके design से तय नहीं होगी. असली सवाल ये होगा कि institutional investors, market makers और दूसरे बड़े participants इसमें कितनी सक्रियता से हिस्सा लेते हैं. क्योंकि बेहतर auction के लिए सिर्फ नियम नहीं, पर्याप्त liquidity भी चाहिए.