लोन की EMI रुकते ही आम आदमी पर सख्त बैंक, कॉरपोरेट्स के ₹7.73 लाख करोड़ राइट-ऑफ क्यों?

न्यूज तक डेस्क

• 08:31 PM • 21 Jul 2026

सरकारी बैंकों ने 7.73 लाख करोड़ रुपये के डूबे कर्ज को राइट ऑफ किया, पर अब तक 3.09 लाख करोड़ ही वसूले गए. बाकी रकम की वापसी कितनी तेज होगी, इस पर नजर है.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

सरकारी बैंकों ने ₹7.73 लाख करोड़ के बैड लोन किए राइट-ऑफ

राइट ऑफ राशि में से सिर्फ ₹3.09 लाख करोड़ की रिकवरी

राइट-ऑफ कर्ज माफी नहीं, डिफॉल्टर्स पर कार्रवाई जारी

अगर कोई आम आदमी होम लोन या कार लोन की एक-दो EMI भी नहीं भर पाता, तो बैंक उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई शुरू कर देते हैं. लेकिन जब बड़े कारोबारी और कंपनियां हजारों करोड़ रुपये का कर्ज नहीं चुकातीं, तो उसका असर सीधे बैंकों की बैलेंस शीट पर पड़ता है.इसी बीच सरकारी बैंकों के बैड लोन को लेकर एक बड़ा आंकड़ा सामने आया है. पिछले कुछ वर्षों में सरकारी बैंकों ने 7.73 लाख करोड़ रुपये के डूबे हुए कर्ज को अपने खातों से राइट-ऑफ किया है. हालांकि, इस रकम में से अब तक बैंक सिर्फ 3.09 लाख करोड़ रुपये ही वसूल कर पाए हैं.

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क्या होता है राइट-ऑफ?

राइट-ऑफ का मतलब कर्ज माफ करना नहीं होता. जब किसी लोन की वसूली लंबे समय तक नहीं हो पाती, तो बैंक उसे अपने अकाउंट बुक से हटा देते हैं. इससे बैंक की बैलेंस शीट साफ दिखाई देती है और वित्तीय रिपोर्टिंग आसान हो जाती है.हालांकि, बैंक उस कर्ज की वसूली की कोशिश जारी रखते हैं.

कितनी रकम हो सकी रिकवर?

सरकारी बैंकों के आंकड़ों के मुताबिक, राइट-ऑफ किए गए कुल लोन का सिर्फ करीब 40 फीसदी हिस्सा ही अब तक रिकवर हो पाया है. यानी 60 फीसदी से ज्यादा रकम अभी भी फंसी हुई है**, जिसे वापस लाने के लिए बैंक और दूसरी एजेंसियां लगातार कोशिश कर रही हैं.

डूबा हुआ पैसा वसूलने के क्या हैं कानूनी रास्ते?

बैंकों के पास डूबे हुए कर्ज की वसूली के कई कानूनी रास्ते होते हैं. इनमें प्रमुख हैं

  • नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT)
  • इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी प्रोसेस (IBC)
  • एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियां (ARC)
  • डिफॉल्टर की संपत्ति जब्त करना

हालांकि, इन प्रक्रियाओं में कई साल लग जाते हैं. इसी वजह से बड़ी रकम लंबे समय तक फंसी रहती है.

राइट-ऑफ पर सवाल क्यों?

राइट-ऑफ एक सामान्य अकाउंटिंग प्रक्रिया है लेकिन जब राइट-ऑफ की रकम लाखों करोड़ रुपये में पहुंच जाए और उसकी रिकवरी काफी कम रहे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है.इससे यह सवाल उठता है कि बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्टर्स पर कार्रवाई कितनी प्रभावी है और जनता के पैसे की सुरक्षा कितनी मजबूत है.

सरकारी बैंकों की हालत पहले से बेहतर

पिछले कुछ वर्षों में सरकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति में सुधार आया है.

  • NPA में कमी आई है
  • कई सरकारी बैंक रिकॉर्ड मुनाफा कमा रहे हैं
  • पिछले तीन वर्षों से सरकार को इन बैंकों में नई पूंजी नहीं डालनी पड़ी
  • बैंक अब बाजार से खुद पूंजी जुटाने में सक्षम हो गए हैं

सरकारी बैंकों का प्रदर्शन भले बेहतर हुआ हो, लेकिन 7.73 लाख करोड़ रुपये के बैड लोन का राइट-ऑफ और उसकी सीमित रिकवरी ये दिखाती है कि बड़े डिफॉल्टर्स से पैसा वसूलना अब भी बैंकिंग सिस्टम की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. ऐसे में भविष्य में रिकवरी प्रक्रिया को और तेज और प्रभावी बनाना जरूरी होगा, ताकि जनता के पैसे की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.