भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पिछले दो साल से रुपये को लगातार दबाव से बचाने के लिए कई कदम उठाता रहा है. विदेशी निवेशकों की बिकवाली, डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भारतीय मुद्रा पर लगातार दबाव बनाए रखा. ऐसे माहौल में RBI ने सिर्फ विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचने पर निर्भर रहने के बजाय एक अलग रणनीति अपनाई. यही रणनीति अब उसके लिए नई चुनौती बनती दिख रही है. मई 2026 तक RBI की शॉर्ट डॉलर फॉरवर्ड पोजीशन करीब 106.7 अरब डॉलर यानी लगभग 107 अरब डॉलर तक पहुंच गई. अब केंद्रीय बैंक इस बड़ी पोजीशन को धीरे-धीरे कम करना चाहता है. हालांकि, यही प्रक्रिया सबसे मुश्किल साबित हो सकती है.
ADVERTISEMENT
रुपये को बचाने के लिए RBI ने क्या किया?
जब बाजार में डॉलर की कमी की आशंका बढ़ती है, तब आयातक, निवेशक और दूसरे कारोबारी पहले से ज्यादा डॉलर खरीदने लगते हैं. इससे डॉलर महंगा हो जाता है और रुपया कमजोर होने लगता है.ऐसी स्थिति में RBI ने बाजार में तुरंत डॉलर बेचने के बजाय फॉरवर्ड डॉलर कॉन्ट्रैक्ट्स का सहारा लिया. आसान भाषा में समझें तो RBI ने बाजार को भरोसा दिया कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर डॉलर उपलब्ध कराया जाएगा. इससे बाजार में घबराहट कम हुई और लोगों ने तत्काल बड़ी मात्रा में डॉलर खरीदने की होड़ नहीं लगाई.इस रणनीति का एक बड़ा फायदा यह भी रहा कि RBI को उस समय अपने विदेशी मुद्रा भंडार से तुरंत डॉलर निकालकर बेचने की जरूरत नहीं पड़ी. यानी एक तरफ रुपये पर दबाव कम हुआ, वहीं दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा भंडार भी सुरक्षित बना रहा.
107 अरब डॉलर तक कैसे पहुंच गई पोजीशन?
समय के साथ RBI ने इस रणनीति का लगातार इस्तेमाल किया. धीरे-धीरे फॉरवर्ड डॉलर सौदों का आकार बढ़ता गया और मई 2026 तक यह आंकड़ा 106.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया. अब यही बड़ी पोजीशन RBI के लिए चुनौती बन गई है, क्योंकि इन सौदों को हमेशा जारी नहीं रखा जा सकता. किसी न किसी समय इन्हें खत्म करना ही होगा.
RBI एक साथ यह पोजीशन क्यों नहीं खत्म कर सकता?
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. अगर RBI एक साथ बड़ी मात्रा में अपनी फॉरवर्ड पोजीशन खत्म करता है, तो उसे डॉलर खरीदने पड़ेंगे. जब डॉलर की खरीद बढ़ेगी, तब बाजार में रुपये की बिक्री भी बढ़ेगी. इसका सीधा असर रुपये पर पड़ेगा और भारतीय मुद्रा फिर से कमजोर हो सकती है. यानी जिस रणनीति ने पिछले दो साल तक रुपये को संभालने में मदद की, उसी रणनीति से बाहर निकलना अब केंद्रीय बैंक के लिए सबसे कठिन काम बन गया है.
RBI अभी क्या कर रहा है?
RBI ने इस पूरी प्रक्रिया को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने का फैसला किया है.रिपोर्ट के मुताबिक जून के मध्य से अब तक केंद्रीय बैंक करीब 10 से 15 अरब डॉलर की फॉरवर्ड पोजीशन कम कर चुका है. हालांकि कुल पोजीशन अभी भी काफी बड़ी बनी हुई है. ऐसे में RBI को हर कदम बेहद सावधानी से उठाना होगा ताकि बाजार में अनावश्यक अस्थिरता न आए.
मुश्किल सिर्फ फॉरवर्ड पोजीशन नहीं है
RBI की चुनौती केवल 107 अरब डॉलर की पोजीशन तक सीमित नहीं है.जुलाई में रुपया एक बार फिर दबाव में आ गया है. दूसरी ओर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है. अगर तेल और महंगा होता है, तो भारत को आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे. इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. यानी बाहरी परिस्थितियां भी RBI के लिए मुश्किलें बढ़ा रही हैं.
आने वाले महीनों में क्यों बढ़ेगी चुनौती?
विशेषज्ञों के मुताबिक अगले तीन महीनों में करीब 29 अरब डॉलर के फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट पूरे होंगे. वहीं अगले एक साल के भीतर करीब 51 अरब डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट मैच्योर होंगे. इसका मतलब है कि अगले 12 महीने RBI के लिए काफी अहम रहने वाले हैं. केंद्रीय बैंक को हर मैच्योर होने वाले कॉन्ट्रैक्ट के साथ यह तय करना होगा कि उसे किस गति से अपनी पोजीशन कम करनी है.
रुपया कहां तक जा सकता है?
कुछ विदेशी विश्लेषकों का मानना है कि अगर मौजूदा हालात बने रहे, तो साल के आखिर तक डॉलर की कीमत करीब 98 रुपये तक पहुंच सकती है. हालांकि सभी विशेषज्ञ इस अनुमान से सहमत नहीं हैं और कई विश्लेषकों का अनुमान इससे कम है. फिलहाल यह साफ है कि आने वाले महीनों में रुपये की दिशा केवल वैश्विक डॉलर की मजबूती से तय नहीं होगी. RBI की रणनीति और उसकी ओर से फॉरवर्ड पोजीशन को कम करने की रफ्तार भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
RBI के सामने सबसे बड़ी परीक्षा
RBI इस समय दो मोर्चों पर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. एक तरफ उसे रुपये को ज्यादा कमजोर होने से बचाना है. दूसरी तरफ लगभग 107 अरब डॉलर की फॉरवर्ड पोजीशन भी धीरे-धीरे कम करनी है. अगर केंद्रीय बैंक बहुत तेजी से कदम उठाता है, तो रुपये पर नया दबाव आ सकता है. वहीं अगर प्रक्रिया बहुत धीमी रहती है, तो यह बड़ी पोजीशन लंबे समय तक उसके ऊपर बोझ बनी रह सकती है. यानी आने वाले समय में रुपये की चाल सिर्फ वैश्विक बाजार तय नहीं करेंगे. RBI की रणनीति और उसके फैसले भी भारतीय मुद्रा की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.
ADVERTISEMENT

