भारतीय रुपये पर हाल के दिनों में बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ऐसा कदम उठाया, जिसकी चर्चा सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि वैश्विक करेंसी बाजार में भी होने लगी. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर तक फिसलने से रोकने के लिए RBI ने पिछले शुक्रवार को विदेशी मुद्रा बाजार में करीब 7 बिलियन डॉलर बेचे. माना जा रहा है कि पिछले कई महीनों में यह केंद्रीय बैंक के सबसे बड़े प्रत्यक्ष हस्तक्षेपों में से एक था.
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RBI का यह कदम ऐसे समय पर आया, जब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक तनाव की वजह से भारतीय मुद्रा पर लगातार दबाव बन रहा था. हालांकि, इस हस्तक्षेप के बाद रुपये में सुधार देखने को मिला और लगातार कई कारोबारी सत्रों तक भारतीय मुद्रा मजबूत होती रही.
RBI ने बाजार में क्यों बेचे 7 बिलियन डॉलर?
रिपोर्ट्स के अनुसार, रुपये की तेज गिरावट को रोकने के लिए RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में बड़ी मात्रा में डॉलर बेचे. जब केंद्रीय बैंक बाजार में डॉलर बेचता है, तो उसके बदले रुपये की मांग बढ़ती है. इससे घरेलू मुद्रा को सहारा मिलता है और उसकी कमजोरी पर कुछ हद तक रोक लगाई जा सकती है. यह कदम इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि केंद्रीय बैंक रुपये में अचानक आने वाली बड़ी गिरावट को रोकने के लिए सक्रिय रूप से बाजार में हस्तक्षेप करने को तैयार है.
आखिर रुपये पर दबाव क्यों बढ़ा?
रुपये पर दबाव बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी रही. भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो देश का आयात बिल बढ़ जाता है. हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई थीं. इससे भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा. आयात के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ने से रुपये पर कमजोरी का असर दिखाई देने लगा.
सिर्फ भारत नहीं, एशिया के दूसरे देशों ने भी उठाए कदम
बढ़ते वैश्विक दबाव का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा. एशिया के कई देशों के केंद्रीय बैंक भी अपनी-अपनी मुद्राओं को स्थिर रखने के लिए सक्रिय हुए. ताइवान के केंद्रीय बैंक ने डॉलर की तेज खरीदारी को लेकर सख्ती दिखाई. वहीं फिलीपींस के केंद्रीय बैंक ने भी अपनी मुद्रा पेसो को समर्थन देने के लिए बाजार में हस्तक्षेप किया. इससे साफ है कि वैश्विक करेंसी बाजार में बढ़ती अस्थिरता कई देशों के लिए चुनौती बन चुकी है.
RBI के कदम का क्या असर हुआ?
RBI के हस्तक्षेप के बाद भारतीय रुपये को राहत मिलती दिखाई दी. केंद्रीय बैंक ने डॉलर बेचने के बाद भी अगले कुछ कारोबारी सत्रों तक बाजार पर नजर बनाए रखी, जिससे रुपये को लगातार समर्थन मिला. इसका असर यह रहा कि भारतीय रुपया लगातार पांचवें कारोबारी दिन मजबूत होकर बंद हुआ. गुरुवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 9 पैसे मजबूत होकर 95.67 के स्तर पर बंद हुआ. इससे पहले बुधवार को भी रुपये में करीब 6 पैसे की मजबूती दर्ज की गई थी. यानी 23 जुलाई के बाद से भारतीय मुद्रा में लगातार सुधार देखने को मिला.
सिर्फ RBI ही नहीं, इन वजहों से भी मिली मजबूती
रुपये की रिकवरी के पीछे केवल केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप ही जिम्मेदार नहीं रहा. घरेलू शेयर बाजार में तेजी, विदेशी निवेशकों की खरीदारी और डॉलर इंडेक्स में कमजोरी ने भी रुपये को सहारा दिया. गुरुवार को सेंसेक्स करीब 273 अंक की बढ़त के साथ 77,928 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 66 अंक चढ़कर 24,317 के स्तर पर पहुंच गया. वहीं विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII/FPI) ने भी भारतीय बाजार में खरीदारी की और बुधवार को करीब 2,981 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे. इन सभी कारकों ने मिलकर रुपये की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद की.
क्या खतरा अभी पूरी तरह टल गया है?
हालांकि फिलहाल रुपये में सुधार दिखाई दे रहा है, लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं. सबसे बड़ा जोखिम अब भी कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है. यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो भारत का आयात बिल और बढ़ सकता है. इसका सीधा असर एक बार फिर रुपये पर पड़ सकता है. इसके अलावा वैश्विक बाजार में अनिश्चितता और निवेशकों की धारणा भी आगे रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी.
क्या RBI के पास अभी भी पर्याप्त ताकत है?
अगर आने वाले समय में रुपये पर फिर दबाव बढ़ता है, तो RBI के पास उससे निपटने के लिए मजबूत संसाधन मौजूद हैं. 17 जुलाई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 676.2 बिलियन डॉलर पर पहुंच चुका था. पिछले तीन सप्ताह के दौरान इसमें 9 बिलियन डॉलर से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसके अलावा RBI के हालिया कदमों के बाद बैंकों ने करीब 32 बिलियन डॉलर भी जुटाए हैं, जिससे देश की विदेशी मुद्रा स्थिति और मजबूत हुई है. यही वजह है कि केंद्रीय बैंक के पास जरूरत पड़ने पर बाजार में दोबारा हस्तक्षेप करने की पर्याप्त क्षमता बनी हुई है.
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
आने वाले दिनों में रुपये की चाल कई अहम वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी. इनमें सबसे महत्वपूर्ण कच्चे तेल की कीमतों की दिशा, अमेरिका की ब्याज दरों को लेकर मिलने वाले संकेत और विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार में निवेश शामिल होगा. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि RBI ने एक दिन में करीब 7 बिलियन डॉलर बेचकर बाजार को साफ संदेश दिया है कि वह रुपये में तेज और अनियंत्रित गिरावट को रोकने के लिए पूरी तरह तैयार है. मौजूदा समय में रुपया अपने निचले स्तरों से संभलता दिखाई दे रहा है और मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार केंद्रीय बैंक के लिए सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है. अब नजर इस बात पर रहेगी कि वैश्विक परिस्थितियों के बीच यह मजबूती आने वाले समय में कितनी टिकाऊ साबित होती है.
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