डॉलर के मुकाबले रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार को संभालने के लिए कई कदम उठाए हैं. इनमें सबसे अहम है कुछ बड़े विदेशी मुद्रा सौदों पर 20 फीसदी रकम रिजर्व में रखने का नया नियम. इस कदम की तुलना चीन की उस नीति से हो रही है, जिसमें वहां के केंद्रीय बैंक ने इसी तरह की रिजर्व दर को घटाकर शून्य कर दिया था.
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लेकिन RBI को इस तरह का कदम उठाने की जरूरत क्यों पड़ी? बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा के सौदे महंगे होने से रुपये को कैसे मदद मिल सकती है? और चीन का उदाहरण भारत के लिए कितना प्रासंगिक है? आइए समझते हैं.
रुपये पर दबाव क्यों बढ़ रहा है?
भारत कच्चे तेल, मशीनरी और कई दूसरे जरूरी सामानों का आयात करता है. इनका भुगतान बड़े पैमाने पर डॉलर में होता है. जब डॉलर महंगा होता है, तो भारतीय कंपनियों को उतने ही डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं. इसका असर आयात की लागत और आगे चलकर महंगाई पर भी पड़ सकता है.
इसके अलावा, जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ सकती है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती भी रुपये पर दबाव डालती हैं.
ऐसे माहौल में RBI की कोशिश है कि विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग और रुपये की गिरावट के दबाव को नियंत्रित किया जा सके.
क्या है FERR और कैसे काम करेगा नया नियम?
RBI ने विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व यानी Foreign Exchange Risk Reserve (FERR) की व्यवस्था शुरू की है. इसके तहत तय शर्तों के दायरे में आने वाले 20 लाख डॉलर से ज्यादा के रुपये से जुड़े कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों पर बैंकों को सौदे की रुपये में कुल वैल्यू का 20 फीसदी हिस्सा नकद रिजर्व के तौर पर RBI के पास रखना होगा. यह रकम सौदा खत्म होने तक रिजर्व में रहेगी.
इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए, किसी पात्र सौदे की वैल्यू 100 करोड़ रुपये है. ऐसे में बैंक को 20 करोड़ रुपये रिजर्व में रखने होंगे. यह पैसा बैंक का ही होगा, लेकिन सौदा खत्म होने तक वह इस रकम का इस्तेमाल दूसरे कामों में नहीं कर पाएगा.
इससे बैंक की रकम का एक हिस्सा रिजर्व में बंध जाएगा और ऐसे सौदों की लागत बढ़ सकती है. बैंक इस अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से भी वसूल सकते हैं.
हालांकि, यह नियम हर डॉलर खरीद या हर हेजिंग सौदे पर लागू नहीं होता. इसका दायरा तय शर्तों वाले बड़े डेरिवेटिव सौदों तक सीमित है.
डॉलर के सौदे महंगे करने से रुपये को कैसे मदद मिलेगी?
जब कंपनियों को आशंका होती है कि भविष्य में डॉलर महंगा हो सकता है, तो वे अपने भुगतान की लागत तय करने के लिए पहले ही विदेशी मुद्रा के सौदे करती हैं. इसे हेजिंग कहा जाता है. यह कारोबार के जोखिम को कम करने का सामान्य तरीका है.
लेकिन बाजार में अनिश्चितता के दौरान विदेशी मुद्रा के सौदों की मांग बढ़ सकती है. रिजर्व की शर्त से ऐसे कुछ बड़े सौदों की लागत बढ़ेगी, जिससे उनकी मांग पर असर पड़ सकता है. RBI की कोशिश विदेशी मुद्रा बाजार में अतिरिक्त दबाव को कम करना है, न कि डॉलर की खरीद पर पूरी तरह रोक लगाना.
चीन ने क्यों हटाई थी रिजर्व की शर्त?
चीन के केंद्रीय बैंक ने मार्च 2026 में फॉरवर्ड फॉरेक्स सौदों पर लागू 20 फीसदी रिजर्व दर को घटाकर शून्य कर दिया था. इसका मतलब था कि बैंकों को ऐसे सौदों के लिए पहले की तरह रिजर्व रखने की जरूरत नहीं रही.
यह फैसला ऐसे समय आया, जब चीनी मुद्रा युआन मजबूत हो रही थी. चीन के केंद्रीय बैंक ने कहा था कि इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार को बढ़ावा देना और कंपनियों के लिए करेंसी जोखिम से बचाव आसान बनाना है.
यानी चीन ने रिजर्व की शर्त में ढील दी, जबकि भारत ने रुपये पर दबाव के बीच ऐसी शर्त लागू की है. हालांकि, दोनों देशों के बाजार की परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए दोनों फैसलों के असर की तुलना सावधानी से करनी होगी.
RBI के दूसरे कदम क्या हैं?
रुपये को संभालने के लिए RBI ने कुछ और बदलाव भी किए हैं.
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तेल कंपनियों के लिए विशेष व्यवस्था: 12 अक्टूबर से इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां तय बैंकों के जरिए डॉलर हासिल कर सकेंगी. इसका मकसद उनकी डॉलर की रोजमर्रा की जरूरतों का पूरा दबाव खुले बाजार पर पड़ने से रोकना है.
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कुछ सौदों की सीमा में कटौती: वास्तविक लेन-देन से जुड़ा आधार स्थापित किए बिना किए जा सकने वाले कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों की सीमा 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर कर दी गई है.
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दोबारा सौदे बुक करने पर रोक: रुपये से जुड़े रद्द किए गए कुछ डेरिवेटिव सौदों को दोबारा बुक करने पर पाबंदी लगाई गई है. हालांकि, मैच्योरिटी पर सौदे को आगे बढ़ाने यानी रोलओवर की अनुमति बनी हुई है.
क्या इन कदमों से रुपया संभल पाएगा?
RBI के ये कदम विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की अतिरिक्त मांग और कुछ बड़े सौदों से जुड़े जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं. लेकिन रुपये की चाल सिर्फ केंद्रीय बैंक के फैसलों पर निर्भर नहीं करती.
कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और वैश्विक आर्थिक हालात आगे भी अहम भूमिका निभाएंगे. इसलिए इन उपायों से रुपये की गिरावट रुकने की गारंटी नहीं है.
फिलहाल RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव कम करने के लिए कई मोर्चों पर कदम उठाए हैं. अब देखना होगा कि इनका असर रुपये की चाल और डॉलर की मांग पर कितना पड़ता है.
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