भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अगस्त मौद्रिक नीति बैठक से पहले ब्याज दरों को लेकर चर्चा तेज हो गई है. इस बीच 72 अर्थशास्त्रियों के एक सर्वे ने बाजार की उम्मीदों को नई दिशा दे दी है. सर्वे में शामिल लगभग सभी विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होगा. अगर ऐसा होता है तो इसका असर सिर्फ बैंकों की ब्याज दरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि होम लोन, कार लोन, EMI, शेयर बाजार और रुपये की चाल पर भी देखने को मिल सकता है.
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3 से 5 अगस्त के बीच होगी RBI की अहम बैठक
3 अगस्त से 5 अगस्त के बीच RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक होने जा रही है. इस बैठक में रेपो रेट समेत कई अहम मौद्रिक नीतिगत फैसले लिए जाएंगे. रेपो रेट वह ब्याज दर होती है, जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक कर्ज उपलब्ध कराता है. इसी दर के आधार पर बैंकों के लिए फंड की लागत तय होती है, जिसका असर आगे चलकर होम लोन, कार लोन और अन्य कर्जों की ब्याज दरों पर पड़ता है.
72 अर्थशास्त्रियों ने क्या अनुमान लगाया?
बैठक से पहले किए गए सर्वे में 72 अर्थशास्त्रियों से पूछा गया कि इस बार RBI क्या फैसला ले सकता है. सर्वे में शामिल 68 अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रेपो रेट में इस बार कोई बदलाव नहीं होगा. यानी ब्याज दर फिलहाल 5.25% पर ही बनी रह सकती है. यह संकेत देता है कि बाजार फिलहाल किसी बड़े नीतिगत बदलाव की उम्मीद नहीं कर रहा है.
महंगाई बढ़ रही है, फिर भी रेट क्यों नहीं बढ़ने की उम्मीद?
जून में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38% पर पहुंच गई. यह RBI के 4% के लक्ष्य से ऊपर है. इसके बावजूद अधिकांश अर्थशास्त्री फिलहाल ब्याज दर बढ़ाने की संभावना कम मान रहे हैं. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह वैश्विक अनिश्चितता को माना जा रहा है.
एक तरफ पश्चिम एशिया में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. अगर वहां हालात फिर बिगड़ते हैं तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है. दूसरी तरफ अमेरिका के टैरिफ का असर भारतीय कंपनियों और देश के निर्यात पर भी पड़ रहा है. ऐसे माहौल में ब्याज दर बढ़ाने से आर्थिक गतिविधियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
ब्याज दर बढ़ाने से क्या हो सकता है असर?
अगर मौजूदा परिस्थितियों में ब्याज दर बढ़ाई जाती है तो कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा. इसका असर निवेश पर पड़ सकता है और नए प्रोजेक्ट्स की रफ्तार धीमी हो सकती है. इसके साथ ही आर्थिक विकास पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है.
इसी वजह से माना जा रहा है कि फिलहाल केंद्रीय बैंक महंगाई को नियंत्रित रखने और आर्थिक विकास को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर सकता है.
महंगाई अभी कितनी चिंता की बात?
हालांकि जून में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38% पर पहुंची है, लेकिन इसे अभी ऐसी स्थिति नहीं माना जा रहा है जहां तुरंत ब्याज दर बढ़ाने की जरूरत पड़े. कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब तक महंगाई लंबे समय तक करीब 6% के आसपास नहीं बनी रहती, तब तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना सीमित रहेगी.
रुपये की कमजोरी पर क्या ब्याज दर बढ़ सकती है?
हाल के समय में रुपया दबाव में रहा है. इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ रुपये को मजबूत करने के लिए ब्याज दर बढ़ाना उचित रणनीति नहीं होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि इससे आर्थिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
यही कारण है कि केंद्रीय बैंक पहले ही विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए कई कदम उठा चुका है. हालांकि इन प्रयासों से विदेशी निवेश तो आया, लेकिन रुपये की कमजोरी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी.
पूरे 2026 में भी नहीं बदल सकती ब्याज दर?
सर्वे में शामिल ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सिर्फ अगस्त की बैठक ही नहीं, बल्कि पूरे 2026 के दौरान भी ब्याज दरों में बदलाव की संभावना काफी कम है. यानी आने वाले महीनों में भी मौजूदा ब्याज दरें बरकरार रह सकती हैं.
आम लोगों पर क्या होगा असर?
अगर अगस्त की बैठक में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होता है तो होम लोन, कार लोन और अन्य फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की EMI में भी फिलहाल कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलेगा. यानी जिन लोगों को ब्याज दर घटने के बाद EMI कम होने की उम्मीद है, उन्हें अभी थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है.
अब किस पर रहेगी नजर?
अब सभी की नजर 3 से 5 अगस्त के बीच होने वाली MPC बैठक पर रहेगी. अगर केंद्रीय बैंक बाजार की उम्मीदों के मुताबिक ब्याज दरों को 5.25% पर बरकरार रखता है तो मौजूदा स्थिति बनी रह सकती है. लेकिन अगर उम्मीदों के उलट कोई फैसला लिया जाता है, तो उसका असर शेयर बाजार, रुपये और करोड़ों कर्जधारकों की EMI पर एक साथ देखने को मिल सकता है.
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