RBI MPC Minutes: भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ संकेत दिया है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल महंगाई के रुख को लेकर और स्पष्टता का इंतजार करना चाहता है। उन्होंने कहा कि पॉलिसी रेट में किसी भी बदलाव पर विचार करने से पहले यह देखना जरूरी होगा कि महंगाई आने वाले समय में किस दिशा में जाती है और मौजूदा स्तर पर कितनी देर टिकती है.
RBI की अगस्त में हुई Monetary Policy Committee की बैठक के मिनट्स बुधवार को जारी किए गए। छह सदस्यीय MPC ने लगातार चौथी बैठक में रेपो रेट को यथावत रखने का फैसला किया था.
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महंगाई पर और स्पष्टता का इंतजार
गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, मौद्रिक नीति में बदलाव से पहले RBI महंगाई के आंकड़ों और उसके भविष्य के अनुमान को और करीब से देखना चाहता है. उनका कहना है कि यह समझना जरूरी है कि महंगाई मौजूदा या इससे ऊंचे स्तर पर कितने समय तक रह सकती है, आगे इसका अनुमान क्या है और आखिरकार यह किस स्तर पर जाकर स्थिर हो सकती है. यानी फिलहाल RBI का फोकस महंगाई के ट्रेंड को समझने पर है, न कि जल्दबाजी में ब्याज दरों में बदलाव करने पर.
महंगाई बढ़ी तो दरें बढ़ाने का विकल्प खुला
गवर्नर ने एक अहम चेतावनी भी दी है.अगर खाने-पीने की चीजों, ईंधन और दूसरी इनपुट लागत में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों तक फैलने लगता है और महंगाई व्यापक रूप लेती है, तो RBI को मौद्रिक नीति को सख्त करने की जरूरत पड़ सकती है.मल्होत्रा के मुताबिक, अगर महंगाई की उम्मीदें लोगों और कारोबारियों के बीच लंबे समय के लिए ऊपर जाने लगती हैं या महंगाई लगातार बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंक को इसका जवाब देना होगा. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल ऐसे जोखिमों के सामने आने के सबूत सीमित हैं.
फूड और फ्यूल की कीमतों पर नजर
RBI के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता यह है कि सप्लाई से जुड़ा कोई झटका सिर्फ कुछ चुनिंदा वस्तुओं तक सीमित न रहे. अगर खाद्य पदार्थों, ईंधन और दूसरी लागतों में बढ़ोतरी का असर व्यापक कीमतों पर पड़ने लगा, तो महंगाई का दबाव ज्यादा लंबे समय तक रह सकता है. यही वजह है कि RBI इन आंकड़ों पर नजर बनाए हुए है.
West Asia संकट और मानसून भी चुनौती
अगस्त की MPC बैठक ऐसे समय में हुई जब ग्लोबल इकोनॉमी में अनिश्चितता बनी हुई है.West Asia में संघर्ष के कारण सप्लाई चेन पर दबाव है। इसके अलावा मानसून का प्रदर्शन भी पूरी तरह सामान्य नहीं रहा है। इन दोनों फैक्टर का असर खाद्य कीमतों और दूसरी लागतों पर पड़ सकता है. Deputy Governor और MPC सदस्य पूनम गुप्ता ने भी ‘वेट एंड वॉच’ की नीति का समर्थन किया है. उनके मुताबिक, कुछ समय और इंतजार करने से मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं साफ होंगी और यह समझने में मदद मिलेगी कि सप्लाई से पैदा हुआ महंगाई का दबाव कितना स्थायी है.
साथ ही, इससे ग्लोबल इकोनॉमी से जुड़े जोखिमों को समझने के लिए भी ज्यादा डेटा मिलेगा.
अर्थव्यवस्था की ग्रोथ पर RBI का भरोसा
महंगाई को लेकर सतर्कता के बावजूद RBI गवर्नर ने भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं. उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है. इसका मतलब है कि फिलहाल RBI के सामने महंगाई और ग्रोथ के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है.
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
RBI के मिनट्स से फिलहाल यही संकेत मिलता है कि तुरंत ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद पर ब्रेक लग सकता है. अगर आने वाले महीनों में महंगाई नियंत्रण में रहती है और कोई बड़ा सप्लाई शॉक नहीं आता, तो RBI के पास आगे चलकर अपनी नीति में बदलाव की गुंजाइश बनी रहेगी. लेकिन अगर खाद्य, ईंधन और इनपुट लागत बढ़ने से महंगाई व्यापक होती है, तो स्थिति उलट भी सकती है और दरें बढ़ाने का विकल्प फिर से चर्चा में आ सकता है. इसलिए आने वाले समय में बाजार की नजर खास तौर पर महंगाई के आंकड़ों, कच्चे तेल की कीमतों, मानसून और ग्लोबल घटनाक्रम पर रहेगी. कुल मिलाकर RBI का संदेश फिलहाल साफ है जल्दबाजी नहीं, पहले महंगाई की दिशा को समझेंगे और जरूरत पड़ी तो नीति में सख्ती का रास्ता भी खुला रहेगा.
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