लाल सागर में हमले के दावे और होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से बने तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है. ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जिससे भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देशों की चिंता बढ़ गई है.
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इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, तो पेट्रोल, डीजल, गैस सिलेंडर, ढुलाई और रोजमर्रा के कई सामान पर दबाव बढ़ सकता है. असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि घर के खर्च तक पहुंच सकता है.
क्या हुआ
यमन के हूती विद्रोहियों ने दावा किया है कि उन्होंने लाल सागर में सऊदी अरब के दो बड़े तेल टैंकरों पर हमला किया. यह दावा ऐसे समय आया है जब ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव पहले से बना हुआ है.
अब तक दुनिया की नजर होर्मुज जलडमरूमध्य पर थी, लेकिन अब लाल सागर भी चिंता का बड़ा कारण बन गया है. यानी दुनिया के दो अहम समुद्री तेल रास्तों पर एक साथ खतरे की बात हो रही है.
लाल सागर क्यों अहम है
दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल समुद्री रास्तों से एक देश से दूसरे देश जाता है. लाल सागर में बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में गिना जाता है.
हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है.दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का करीब 12 से 15 प्रतिशत इसी मार्ग से निकलता है.इस व्यापार की कीमत 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा बताई जाती है.
अगर इस रास्ते पर खतरा बढ़ता है, तो जहाजों की आवाजाही धीमी पड़ सकती है. बीमा महंगा हो सकता है. शिपिंग का खर्च बढ़ सकता है. यही दबाव आगे चलकर तेल की कीमतों में दिखता है.
बाजार में क्या असर दिखा
गुरुवार को दुनिया के तेल बाजार में तेज उछाल देखा गया. ब्रेंट क्रूड 6 फीसदी से ज्यादा चढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया. यह करीब 8 हफ्तों का सबसे ऊंचा स्तर बताया गया.
उधर अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड करीब 92 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. सिर्फ 1 महीने में कच्चा तेल करीब 35 फीसदी महंगा हुआ है. पूरे साल की बात करें तो इसमें 60 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी बताई गई है.
भारत पर क्या असर पड़ सकता है
भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इसलिए दुनिया के बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. सबसे पहले असर तेल कंपनियों की लागत पर पड़ता है.
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर के ऊपर रहता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने का दबाव बढ़ सकता है.डीजल महंगा होने पर ट्रकों का किराया और ढुलाई का खर्च बढ़ सकता है.इसका असर सब्जियां, दूध, राशन, सीमेंट, स्टील और डिलीवरी जैसे खर्चों पर पड़ सकता है.यानी महंगाई (Inflation) धीरे-धीरे घर के बजट तक पहुंच सकती है.
रुपया और लोन पर दबाव
तेल खरीदने के लिए भारत को ज्यादा डॉलर देने पड़ सकते हैं. इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है. डॉलर मजबूत होने पर रुपया कमजोर पड़ सकता है. ऐसे में विदेश से आने वाले दूसरे सामान भी महंगे हो सकते हैं.
इलेक्ट्रॉनिक सामान और मशीनरी जैसी चीजों की लागत पर भी असर पड़ सकता है. इसके साथ ही भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने का जोखिम भी रहता है.
अगर महंगाई बढ़ती है, तो रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो सकता है. इसका असर होम लोन, कार लोन और कारोबार के कर्ज की लागत पर भी पड़ सकता है.
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर सिर्फ युद्ध पर नहीं, बल्कि उन समुद्री रास्तों पर है जिनसे तेल की सप्लाई चलती है. अगर लाल सागर और होर्मुज दोनों जगह तनाव बना रहता है, तो इसका असर सिर्फ तेल कंपनियों पर नहीं, बल्कि भारत में आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है.
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