Share Market : ईरान तनाव से सहमा शेयर बाजार, सेंसेक्स-निफ्टी में बड़ी गिरावट. निवेशकों के करीब 3 लाख करोड़ रुपये डूबे.

तनीषा त्यागी

• 12:08 PM • 13 Jul 2026

अमेरिका-ईरान तनाव, होर्मुज स्ट्रेट की चिंता और महंगे कच्चे तेल के डर से भारतीय शेयर बाजार दबाव में आया. जानिए सेंसेक्स-निफ्टी की गिरावट का बड़ा कारण.

NewsTak
Google CTA

न्यूज़ हाइलाइट्स

अमेरिका और ईरान के तनाव ने वैश्विक बाजारों में बेचैनी बढ़ाई

होर्मुज स्ट्रेट पर खतरे से तेल सप्लाई अटकने का डर बढ़ा

ब्रेंट क्रूड चढ़ने से आयात बिल और महंगाई की चिंता बढ़ी

निवेशकों के करीब 3 लाख करोड़ रुपये डूबे

सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत तेज गिरावट के साथ हुई. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी, जिसका सीधा असर घरेलू बाजार पर देखने को मिला. शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 700 अंकों से ज्यादा टूट गया, जबकि निफ्टी में भी 210 अंकों से अधिक की गिरावट दर्ज की गई. बाजार में आई इस कमजोरी के चलते निवेशकों की कुल संपत्ति में करीब 3 लाख करोड़ रुपये की कमी आ गई. हालांकि कारोबार आगे बढ़ने के साथ बाजार ने निचले स्तरों से कुछ रिकवरी दिखाई, लेकिन पूरे सत्र के दौरान निवेशकों का रुख सतर्क बना रहा.

Read more!

शुरुआती कारोबार में बाजार पर रहा दबाव

कारोबार की शुरुआत में सेंसेक्स तेज गिरावट के साथ खुला और कुछ ही समय में 700 अंकों से ज्यादा नीचे चला गया. बाद में इसमें आंशिक सुधार देखने को मिला और यह अपने निचले स्तर से संभलता नजर आया. निफ्टी में भी शुरुआती दबाव काफी ज्यादा रहा. इंडेक्स 24,000 के करीब पहुंच गया, लेकिन बाद में कुछ खरीदारी लौटने से गिरावट सीमित होती दिखाई दी. इससे साफ संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल बड़े जोखिम लेने से बच रहे हैं और वैश्विक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं.

गिरावट की सबसे बड़ी वजह क्या रही?

बाजार पर दबाव की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव रहा. दोनों देशों के बीच हालात बिगड़ने की खबरों ने वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ा दी. इसके साथ ही ईरान की ओर से होर्मुज स्ट्रेट को फिर से बंद करने का दावा भी बाजार की चिंता का कारण बना. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों में शामिल है. इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की सप्लाई होती है. ऐसे में इस मार्ग को लेकर किसी भी तरह की अनिश्चितता का असर सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है.

कच्चे तेल में तेजी ने बढ़ाई चिंता

भू-राजनीतिक तनाव का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी देखने को मिला. ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में 4 फीसदी से ज्यादा की तेजी आई और कीमत 79 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है. ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ने, महंगाई में तेजी आने और कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका मजबूत हो जाती है. यही वजह रही कि ऊर्जा बाजार में आई तेजी ने शेयर बाजार की धारणा को कमजोर किया.

रुपये और वैश्विक बाजारों का भी पड़ा असर

तेल की कीमतों में उछाल के साथ रुपये पर भी दबाव देखने को मिला. डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा कमजोर हुई, जिससे आयात आधारित कंपनियों के लिए लागत बढ़ने की चिंता पैदा हुई. इसके अलावा एशियाई बाजारों में भी कमजोरी का माहौल रहा. वैश्विक निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनानी शुरू की, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दिया.

किन सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा दबाव रहा?

सोमवार के कारोबार में आईटी सेक्टर ने बाजार को कुछ हद तक सहारा देने की कोशिश की. टीसीएस, एचसीएल टेक, एनटीपीसी और पावरग्रिड जैसे कुछ शेयर अपेक्षाकृत मजबूत रहे. इसके उलट मेटल, फार्मा, रियल्टी, ऑटो और प्राइवेट बैंकिंग सेक्टर में बिकवाली का दबाव ज्यादा देखने को मिला. इन सेक्टर्स में कमजोरी के चलते प्रमुख सूचकांकों पर अतिरिक्त दबाव बना रहा.

बढ़ा डर का संकेत

बाजार में अनिश्चितता का संकेत देने वाला वोलैटिलिटी इंडेक्स यानी VIX भी तेजी के साथ ऊपर गया. इसमें लगभग 10 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. आम तौर पर VIX में तेजी यह संकेत देती है कि निवेशक आने वाले दिनों में बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव की आशंका देख रहे हैं.

निवेशकों की संपत्ति में बड़ी गिरावट

बाजार में आई गिरावट का सीधा असर बीएसई के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन पर पड़ा. शुक्रवार के मुकाबले सोमवार के कारोबार के दौरान कुल मार्केट कैप में करीब 3 लाख करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई. मार्केट कैपिटलाइजेशन में गिरावट का मतलब है कि सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार मूल्य में कमी आई, जिसका सीधा असर निवेशकों की संपत्ति पर पड़ा.

आगे किन बातों पर रहेगी नजर?

आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक अमेरिका और ईरान के बीच हालात पर निर्भर करेगी. यदि भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ता है या कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. इसके साथ ही निवेशकों की नजर वैश्विक ऊर्जा बाजार, रुपये की चाल और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भी बनी रहेगी. फिलहाल बाजार के लिए सबसे बड़ा ट्रिगर कॉर्पोरेट नतीजों से ज्यादा मिडिल ईस्ट की स्थिति बन गई है.