चांदी ने पिछले एक साल में निवेशकों को करीब 98% का शानदार रिटर्न दिया है. इतनी बड़ी तेजी के बाद चांदी में निवेशकों की दिलचस्पी भी तेजी से बढ़ी. लेकिन हैरानी की बात यह है कि चांदी में पैसा लगाने वाले निवेशकों का रिटर्न चांदी की तेजी के मुकाबले काफी कम रहा.DSP Mutual Fund की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में चांदी में निवेश करने वाले औसत निवेशक को मनी-वेटेड आधार पर करीब 18% का रिटर्न मिला. वहीं, इसी अवधि में चांदी की कीमत करीब 98% बढ़ी.सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 31 जुलाई 2026 तक पिछले 12 महीनों में चांदी में लगाए गए कुल पैसे का 56% हिस्सा नुकसान में था.
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चांदी 98% चढ़ी, निवेशकों को सिर्फ 18% रिटर्न क्यों?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. किसी एसेट का रिटर्न और उसमें निवेश करने वाले व्यक्ति का रिटर्न एक जैसा होना जरूरी नहीं है.चांदी का 98% रिटर्न यह बताता है कि इस अवधि में चांदी की कीमत कितनी बढ़ी. लेकिन निवेशक ने किस तारीख को पैसा लगाया, कितना पैसा लगाया और किस स्तर पर निवेश बढ़ाया, इससे उसका वास्तविक रिटर्न तय होता है. जिन निवेशकों ने चांदी में पहले निवेश किया और पूरी तेजी के दौरान बने रहे, उन्हें इस रैली का बड़ा फायदा मिला. लेकिन जिन लोगों ने कीमतों में बड़ी तेजी आने के बाद निवेश करना शुरू किया, उनके पास आगे की तेजी का फायदा उठाने के लिए कम समय बचा. यही वजह है कि चांदी के शानदार प्रदर्शन के बावजूद निवेशकों का औसत रिटर्न सिर्फ 18% रहा.
FOMO ने बढ़ाई चांदी में खरीदारी
रिपोर्ट में निवेशकों के इस व्यवहार को FOMO यानी Fear of Missing Out से जोड़ा गया है. आसान भाषा में कहें तो जब किसी निवेश को तेजी से बढ़ते हुए देखते हैं, तो निवेशकों को लगता है कि अगर अभी पैसा नहीं लगाया तो मौका हाथ से निकल जाएगा.यही सोच कई बार निवेशकों को तेजी के बाद किसी एसेट में पैसा लगाने के लिए प्रेरित करती है. DSP Mutual Fund की रिपोर्ट का कहना है कि FOMO अक्सर पिछले रिटर्न को भविष्य की उम्मीद में बदल देता है. लेकिन निवेश में यह जरूरी नहीं कि जिसने पिछले साल 98% रिटर्न दिया है, वह अगले साल भी 98% रिटर्न दे. यानी सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि निवेशक गलत एसेट चुन रहा है. खतरा यह भी हो सकता है कि वह सही एसेट में बहुत देर से निवेश कर रहा हो.
Silver ETF में भी दिखा यही ट्रेंड
चांदी में बढ़ती दिलचस्पी का असर Silver ETF में भी देखने को मिला.रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 में Silver ETF में 11,761 करोड़ रुपये का निवेश आया. यह रकम सितंबर 2024 से अगस्त 2025 के बीच आए कुल निवेश के लगभग बराबर थी. खास बात यह है कि उस समय चांदी की कीमत 1.41 लाख रुपये से नीचे थी. यानी जब चांदी पहले ही काफी ऊपर जा चुकी थी, तब निवेशकों का पैसा भी बड़ी मात्रा में Silver ETF की तरफ आने लगा. इसे निवेश का Pro-Cyclical Behaviour कहा जा सकता है—यानी कीमत बढ़ती है तो निवेश भी बढ़ने लगता है.
निवेशकों के लिए क्या सीख?
चांदी की इस कहानी से निवेशकों के लिए एक अहम सबक निकलता है. सिर्फ यह देखकर किसी एसेट में पैसा लगाना कि उसने पिछले एक साल में कितना शानदार रिटर्न दिया है, सही रणनीति नहीं हो सकती. अगर कोई एसेट पहले ही बहुत तेजी से बढ़ चुका है, तो निवेश करने से पहले यह देखना जरूरी है कि आगे उस तेजी की कितनी गुंजाइश बची है. DSP Mutual Fund के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 12 महीनों में Silver ETF में लगाए गए 56% पैसे 31 जुलाई 2026 तक नुकसान में थे. यह इस बात का उदाहरण है कि तेज रैली के बाद सिर्फ FOMO में किया गया निवेश कितना जोखिम भरा हो सकता है. इसलिए निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे पिछले रिटर्न का पीछा करने के बजाय अपनी निवेश अवधि, जोखिम क्षमता और एसेट की मौजूदा वैल्यूएशन को देखकर फैसला लें. क्योंकि बाजार में सिर्फ सही एसेट चुनना ही काफी नहीं है, सही समय और सही कीमत पर निवेश करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
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