Tata Sons vs Tata Trusts: एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर क्यों बढ़ा विवाद? जानिए पूरा मामला

सौरभ दीक्षित

• 02:21 PM • 25 Sep 2026

टाटा संस में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर विवाद बढ़ा है. नोएल टाटा ने प्रक्रिया और नियमों पर सवाल उठाए. जानिए दोनों पक्षों की दलीलें और आगे के संकेत.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

विवाद चेयरमैन पद से ज्यादा नियुक्ति की सही प्रक्रिया पर केंद्रित है

नोएल टाटा ने आर्टिकल 118 की अलग व्याख्या रखते हुए सवाल उठाए

कंपनी का कहना है यह नियम सिर्फ नए चेयरमैन चयन पर लागू

टाटा ग्रुप का नाम आते ही भरोसा, कारोबार और एक लंबी कारोबारी विरासत की तस्वीर सामने आती है. लेकिन इस वक्त इसी टाटा ग्रुप के अंदर एक ऐसा विवाद चल रहा है, जिस पर कॉरपोरेट जगत की नजर बनी हुई है. मामला Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति से जुड़ा है. एक तरफ Tata Sons का बोर्ड है, जबकि दूसरी तरफ Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा हैं. विवाद सिर्फ इस बात को लेकर नहीं है कि एन चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाया जाना चाहिए या नहीं. असली सवाल उनकी दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया और उसके नियमों को लेकर है.

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Tata Sons ने नोएल टाटा की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा है कि एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का फैसला नियमों और लागू कानून के मुताबिक लिया गया है.

Tata Sons क्या है और चंद्रशेखरन की भूमिका क्या है?

Tata Sons पूरे Tata Group की होल्डिंग कंपनी है. ग्रुप की कई बड़ी कंपनियों में Tata Sons की अहम हिस्सेदारी है और इसी वजह से इसके चेयरमैन का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. एन चंद्रशेखरन लंबे समय से Tata Sons के चेयरमैन हैं. सितंबर 2026 में कंपनी के बोर्ड ने उनके मौजूदा कार्यकाल के खत्म होने के बाद उन्हें दोबारा चेयरमैन नियुक्त करने का फैसला किया. हालांकि, इस फैसले पर Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने आपत्ति जताई. नोएल टाटा Tata Sons के बोर्ड में Tata Trusts के नॉमिनी डायरेक्टर भी हैं. उनकी आपत्ति मुख्य रूप से इस बात को लेकर थी कि चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति के लिए कंपनी के Articles of Association में दी गई प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं.

Articles of Association यानी AoA क्या है?

Articles of Association यानी AoA को आसान भाषा में कंपनी के आंतरिक नियमों की किताब समझ सकते हैं. इसमें कंपनी के कामकाज, बोर्ड के अधिकार, फैसले लेने की प्रक्रिया और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति से जुड़े नियम दर्ज होते हैं. Tata Sons के मामले में Article 118 इस पूरे विवाद के केंद्र में है. इस प्रावधान में Tata Trusts की हिस्सेदारी एक तय सीमा से ऊपर होने की स्थिति में चेयरमैन के चयन को लेकर एक विशेष प्रक्रिया का प्रावधान है. इसके तहत एक Selection Committee बनाई जाती है. यह समिति चेयरमैन पद के लिए किसी व्यक्ति का चयन करती है और फिर बोर्ड उस सिफारिश के आधार पर नियुक्ति करता है.

नोएल टाटा की आपत्ति क्या है?

नोएल टाटा की आपत्ति इसी प्रक्रिया की व्याख्या से जुड़ी है. मामला यह है कि क्या Article 118 में दी गई विशेष प्रक्रिया सिर्फ किसी नए चेयरमैन की पहली नियुक्ति पर लागू होती है या मौजूदा चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति पर भी इसका इस्तेमाल होना चाहिए. यही वह बिंदु है जिस पर Tata Sons और Tata Trusts की राय अलग दिखाई दे रही है. Tata Sons का क्या कहना है? Tata Sons ने अपने जवाब में कहा है कि Article 118 के तहत दी गई विशेष प्रक्रिया नए चेयरमैन की पहली नियुक्ति से संबंधित है. कंपनी का तर्क है कि एन चंद्रशेखरन पहले से Tata Sons के चेयरमैन हैं. इसलिए उनकी दोबारा नियुक्ति पर Article 118 में दी गई प्रक्रिया लागू नहीं होती.

Tata Sons के मुताबिक, बोर्ड ने बहुमत से प्रस्ताव पारित करके चंद्रशेखरन को मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद दोबारा चेयरमैन बनाने का फैसला लिया है. कंपनी ने कहा है कि यह फैसला लागू कानून और Tata Sons के AoA के मुताबिक है.

कानूनी राय का भी लिया गया सहारा

इस विवाद में Tata Sons ने अपने फैसले के समर्थन में कानूनी राय का भी हवाला दिया है. कंपनी के मुताबिक, Senior Advocate सुदीप्तो सरकार की कानूनी राय बोर्ड के सदस्यों के सामने रखी गई थी. इसके बाद नोएल टाटा की आपत्ति सामने आने पर कंपनी ने पूर्व Chief Justice of India उदय ललित और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी.एन. श्रीकृष्ण से भी राय ली. Tata Sons का कहना है कि इन दोनों की राय भी कंपनी के उस रुख के अनुरूप थी, जिसके मुताबिक बोर्ड की ओर से चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर पारित प्रस्ताव वैध है.

600 पेज के दस्तावेज भी सौंपे गए

इस विवाद में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, Tata Sons ने Tata Trusts को RBI के साथ हुए पत्राचार से जुड़े करीब 600 पेज के दस्तावेज उपलब्ध कराए हैं. इससे पता चलता है कि विवाद सिर्फ मौखिक दावों तक सीमित नहीं है. दोनों पक्षों के बीच कंपनी के नियमों, कानूनी व्याख्या और नियामकीय पत्राचार को लेकर भी चर्चा हो रही है. पूरे विवाद को सिर्फ एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी. इसके पीछे Tata Sons और Tata Trusts के बीच कॉरपोरेट गवर्नेंस और अधिकारों से जुड़े सवाल भी हैं. Tata Trusts की Tata Sons में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है. ऐसे में कंपनी के महत्वपूर्ण फैसलों में ट्रस्ट्स की भूमिका और उसके अधिकार इस विवाद के अहम हिस्से हैं. इसके अलावा Tata Sons की संभावित लिस्टिंग को लेकर भी Tata Trusts और कंपनी के बीच अलग-अलग विचारों की खबरें पहले सामने आ चुकी हैं.

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल दोनों पक्षों का रुख अलग है. Tata Trusts की ओर से चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं, जबकि Tata Sons का कहना है कि बोर्ड ने बहुमत से फैसला लिया और कानूनी राय के आधार पर यह फैसला वैध है. इसलिए अब आगे की प्रक्रिया पर नजर रहेगी. इसमें बोर्ड स्तर पर होने वाले फैसले, शेयरहोल्डर से जुड़े कदम और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है.

क्या है पूरे विवाद का सार?

सीधी भाषा में समझें तो विवाद इस बात पर है कि एन चंद्रशेखरन को दोबारा Tata Sons का चेयरमैन बनाने के लिए कौन सी प्रक्रिया लागू होती है. Tata Sons का कहना है कि मौजूदा चेयरमैन की reappointment के लिए Article 118 वाली विशेष प्रक्रिया जरूरी नहीं है. वहीं, Tata Trusts की ओर से इसी प्रक्रिया और नियुक्ति की वैधता को लेकर सवाल उठाए गए हैं. यानी मामला सिर्फ इस बात का नहीं है कि Tata Sons की चेयरमैन की कुर्सी पर कौन रहेगा. बड़ा सवाल यह है कि उस कुर्सी पर नियुक्ति का अधिकार किसके पास है और कंपनी के नियमों के मुताबिक उस नियुक्ति की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए. इसी वजह से Tata Sons और Tata Trusts के बीच चल रहा यह विवाद आने वाले दिनों में कॉरपोरेट जगत के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा.