Tata Sons Listing: टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग को लेकर विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है. कंपनी के बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के बीच लिस्टिंग को लेकर मतभेद सामने आए हैं. जहां टाटा संस का बोर्ड लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने के पक्ष में दिखाई दे रहा है, वहीं टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने कंपनी के मौजूदा ढांचे में बदलाव का विकल्प सुझाया है. नोएल टाटा की ओर से सुझाए गए इस विकल्प में टाटा संस की रीस्ट्रक्चरिंग और कंपनी को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की संभावना भी शामिल है. यह सुझाव ऐसे समय में आया है जब टाटा संस पर भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI के अपर-लेयर NBFC से जुड़े नियम लागू हैं.
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टाटा संस की लिस्टिंग पर क्यों बढ़ा विवाद
टाटा संस टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है और इसके जरिए ग्रुप के कई बड़े कारोबारों में हिस्सेदारी रखी जाती है. कंपनी के पोर्टफोलियो में TCS, Tata Motors, Tata Steel, Tata Capital, Tata Communications, Tata Consumer Products, Tata Investment Corporation, Air India, Tata Digital और Tata Electronics जैसे कारोबार शामिल हैं. RBI ने टाटा संस को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी यानी NBFC के तौर पर क्लासीफाई किया है. इस कैटेगरी के तहत कंपनी पर ज्यादा सख्त रेगुलेटरी शर्तें लागू होती हैं. टाटा संस ने अपने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने के लिए RBI से अपील की थी, लेकिन यह अनुरोध स्वीकार नहीं हुआ. इसके बाद कंपनी के सामने रेगुलेटरी जरूरतों को पूरा करने के लिए लिस्टिंग का रास्ता महत्वपूर्ण हो गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक टाटा संस ने पब्लिक लिस्टिंग की तैयारियां शुरू कर दी थीं और फरवरी 2027 को एक संभावित इंटरनल टारगेट के तौर पर देखा जा रहा था.
नोएल टाटा ने दिया रीस्ट्रक्चरिंग का सुझाव
17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड मीटिंग में इस मुद्दे पर कंपनी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने लिस्टिंग के विकल्प के तौर पर टाटा संस की रीस्ट्रक्चरिंग पर विचार करने का सुझाव दिया. इस प्रस्ताव में कंपनी को कई हिस्सों में बांटने का विकल्प भी शामिल हो सकता है. टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि टाटा संस की होल्डिंग कंपनी को अनलिस्टेड ही रहना चाहिए और RBI की जरूरतों को पूरा करने के लिए पब्लिक लिस्टिंग के अलावा दूसरे विकल्प तलाशे जाने चाहिए. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि टाटा संस का बोर्ड इस रीस्ट्रक्चरिंग प्रस्ताव को किस तरह आगे बढ़ाएगा.
बोर्ड मीटिंग में लिस्टिंग और चेयरमैन की नियुक्ति पर मतभेद
17 सितंबर की बोर्ड मीटिंग में सिर्फ लिस्टिंग को लेकर ही मतभेद नहीं दिखे, बल्कि एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आई. बोर्ड के बाकी सदस्यों ने एन चंद्रशेखरन को टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त करने और लिस्टिंग की प्रक्रिया शुरू करने के पक्ष में वोट किया. वहीं नोएल टाटा ने दोनों ही कदमों का विरोध किया.
हालांकि RBI के निर्देश से जुड़े प्रस्ताव पर वोटिंग नहीं हुई. इस मुद्दे पर बोर्ड मीटिंग में लंबी चर्चा हुई. इसके बाद नोएल टाटा ने सुझाव दिया कि दोनों पक्षों को मिलकर एक टीम बनानी चाहिए, जो पूरे मामले और उपलब्ध विकल्पों की विस्तार से जांच करे.
रीस्ट्रक्चरिंग में कौन से विकल्प हो सकते हैं
अगर टाटा संस की लिस्टिंग के बजाय रीस्ट्रक्चरिंग का रास्ता अपनाया जाता है, तो इसके कई तरीके हो सकते हैं. जानकारों के मुताबिक इनमें डीमर्जर, एसेट्स को अलग-अलग सब्सिडियरी में ट्रांसफर करना, मर्जर या किसी बड़ी Scheme of Arrangement जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं. हालांकि टाटा संस के आकार और उसके कारोबारों की संख्या को देखते हुए यह प्रक्रिया काफी जटिल हो सकती है. इसमें रेगुलेटरी मंजूरियों के साथ-साथ कमर्शियल और टैक्स से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना होगा. रीस्ट्रक्चरिंग के बाद अलग-अलग कंपनियों या नई एंटिटीज का आपस में क्या संबंध होगा, किस कारोबार की क्या भूमिका होगी और किस तरह का गवर्नेंस स्ट्रक्चर बनाया जाएगा, ये भी अहम सवाल होंगे.
टाटा संस के कारोबार का आकार बहुत बड़ा
टाटा संस के पास टाटा ग्रुप के कई बड़े कारोबारों में हिस्सेदारी और होल्डिंग है. TCS, Tata Motors, Tata Steel और Tata Capital जैसे बड़े कारोबारों के साथ Air India, Tata Digital और Tata Electronics जैसे अनलिस्टेड बिजनेस भी इसके दायरे में आते हैं. यही वजह है कि टाटा संस के मौजूदा ढांचे में किसी बड़े बदलाव का असर सिर्फ होल्डिंग कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा. इसका प्रभाव ग्रुप के अलग-अलग कारोबारों के बीच पूंजी के प्रवाह और गवर्नेंस पर भी पड़ सकता है. FY26 में टाटा संस का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू 17 फीसदी बढ़कर 6.61 लाख करोड़ रुपये हो गया. हालांकि इसी अवधि में कंपनी का नेट प्रॉफिट 35.7 फीसदी गिरकर 17,923 करोड़ रुपये रह गया. अनलिस्टेड बिजनेस में हुए नुकसान का भी कंपनी के प्रदर्शन पर असर रहा. Air India, Tata Digital और Tata Electronics जैसे कारोबार इस संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं.
TCS से मिलने वाले फंड पर भी असर का सवाल
टाटा संस के मौजूदा ढांचे में एक अहम पहलू यह है कि TCS से मिलने वाले डिविडेंड जैसे संसाधनों का इस्तेमाल ग्रुप के उन कारोबारों को फंड करने में किया जाता है, जिन्हें पूंजी की जरूरत होती है. इनमें Air India, Tata Digital और Tata Electronics जैसे अनलिस्टेड बिजनेस शामिल हैं. ऐसे में अगर टाटा संस को अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है, तो इन कारोबारों के बीच पूंजी के प्रवाह का मौजूदा तरीका बदल सकता है. रीस्ट्रक्चरिंग के बाद अलग-अलग कारोबारों की फंडिंग, उनकी वित्तीय जरूरतों और उनकी स्वतंत्रता को लेकर भी नए सवाल खड़े हो सकते हैं.
SP Group के लिए भी अहम है टाटा संस की लिस्टिंग
टाटा संस की लिस्टिंग की चर्चा में Shapoorji Pallonji Group यानी SP Group भी एक अहम पक्ष है. टाटा संस में SP Group की करीब 18.37 फीसदी हिस्सेदारी है. SP Group टाटा संस की लिस्टिंग का समर्थन करता है, क्योंकि उसकी हिस्सेदारी के जरिए वैल्यू हासिल करने और कर्ज से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने का रास्ता खुल सकता है. SP Group ने हाल ही में 21,500 करोड़ रुपये की रीफाइनेंसिंग पूरी की है. ग्रुप ने निवेशकों को बताया था कि अगले 18 महीनों में टाटा संस की हिस्सेदारी की बिक्री या लिस्टिंग के जरिए पैसा जुटाने की योजना है. ऐसे में अगर टाटा संस लिस्ट होने के बजाय रीस्ट्रक्चरिंग के रास्ते पर जाती है, तो SP Group के लिए भी अपनी हिस्सेदारी से बाहर निकलने का रास्ता एक अहम सवाल बन सकता है.
रीस्ट्रक्चरिंग के सामने कई बड़ी चुनौतियां
टाटा संस जैसी बड़ी होल्डिंग कंपनी को कई हिस्सों में बांटना सिर्फ कॉरपोरेट स्ट्रक्चर बदलने का मामला नहीं होगा. इसके साथ रेगुलेटरी, कमर्शियल और टैक्स से जुड़े कई पहलुओं को भी संभालना होगा. नई एंटिटीज का गठन कैसे होगा, मौजूदा एसेट्स और बिजनेस किसके पास जाएंगे, फंडिंग का ढांचा क्या होगा और गवर्नेंस कैसे चलेगा, इन सभी सवालों का समाधान जरूरी होगा. इसके अलावा किसी भी बड़े रीस्ट्रक्चरिंग या कंट्रोल में बदलाव के लिए जरूरी रेगुलेटरी मंजूरियां भी अहम रहेंगी.
अब आगे क्या होगा?
टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर फिलहाल दो अलग-अलग रास्ते सामने दिखाई दे रहे हैं. एक रास्ता पब्लिक लिस्टिंग का है, जिसकी दिशा में कंपनी ने तैयारी शुरू की थी. दूसरा रास्ता रीस्ट्रक्चरिंग का है, जिसका सुझाव टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने दिया है. अभी यह साफ नहीं है कि टाटा संस का बोर्ड आखिरकार किस विकल्प पर आगे बढ़ेगा. लेकिन 17 सितंबर की बोर्ड मीटिंग के बाद इतना जरूर स्पष्ट है कि कंपनी के भविष्य के स्ट्रक्चर और लिस्टिंग को लेकर टाटा ग्रुप के भीतर अलग-अलग राय मौजूद हैं. आने वाले समय में टाटा संस की लिस्टिंग या रीस्ट्रक्चरिंग पर होने वाला फैसला सिर्फ कंपनी के लिए ही नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़े कई बड़े कारोबारों, शेयरहोल्डर्स और टाटा ग्रुप के भविष्य के कॉरपोरेट ढांचे के लिए भी महत्वपूर्ण होगा.
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