टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचाने के लिए टाटा ट्रस्ट ने नया प्लान तैयार किया है. टाटा ट्रस्ट ने सोमवार को टाटा संस के बोर्ड को एक प्रस्ताव भेजा है. इसमें दो कंपनियों टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स को टाटा संस में मिलाने की बात कही गई है. इस प्लान के जरिए टाटा ट्रस्ट्स का मकसद टाटा संस की रेगुलेटरी स्थिति बदलना और उसे अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी बनाए रखना है. इस प्रस्ताव की जानकारी देने के लिए ट्रस्ट्स ने मीडिया कॉन्फ्रेंस भी की.
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आखिर टाटा संस के सामने दिक्कत क्या है?
RBI ने टाटा संस को अपर लेयर NBFC यानी बड़ी नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी की कैटेगरी में रखा है. इस कैटेगरी में आने वाली कंपनियों पर RBI के ज्यादा सख्त नियम लागू होते हैं. इसी रेगुलेटरी स्थिति से बाहर निकलने के लिए टाटा संस अलग-अलग विकल्पों पर विचार कर रही थी. इसमें कंपनी की IPO के जरिए शेयर बाजार में लिस्टिंग भी एक विकल्प था. अब टाटा ट्रस्ट्स ने लिस्टिंग के बजाय कंपनी के पुनर्गठन का रास्ता सुझाया है.
Tata Trusts का प्लान क्या है?
टाटा संस में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट का कहना है कि अगर टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स को टाटा संस में मिला दिया जाए, तो टाटा संस की अपनी कमाई काफी बढ़ जाएगी. इससे कंपनी के पास सिर्फ दूसरी कंपनियों में निवेश से होने वाली आय नहीं होगी, बल्कि खुद के ऑपरेटिंग बिजनेस से भी बड़ी कमाई होगी. ट्रस्ट का तर्क है कि इसके बाद टाटा संस NBFC की परिभाषा में नहीं आएगी. साथ ही, दूसरी टाटा कंपनियों में निवेश का हिस्सा भी 90 फीसदी से नीचे आ जाएगा. इससे टाटा संस कोर इंवेस्टमेंट कंपनी यानी CIC की कैटेगरी से भी बाहर हो सकती है.
Tata Sons पहले भी ऑपरेटिंग कंपनी रही है
टाटा ट्रस्ट का कहना है कि टाटा संस का ऑपरेटिंग बिजनेस चलाने का इतिहास काफी पुराना है. करीब 100 साल के इतिहास में लगभग 80 साल तक टाटा संस खुद कई कारोबार चलाती रही है. इनमें TCS भी शामिल है. साल 2004 तक TCS, टाटा संस का ही एक बिजनेस डिवीजन था. बाद में इसे अलग कंपनी बना दिया गया. ट्रस्ट का कहना है कि नए विलय के बाद टाटा संस फिर से उसी तरह के मॉडल पर काम कर सकेगी—यानी एक तरफ टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी और दूसरी तरफ खुद के ऑपरेटिंग बिजनेस.
आंकड़ों में समझिए पूरा प्लान
अगर यह विलय होता है तो 31 मार्च 2026 के आंकड़ों के मुताबिक नई कंपनी की ऑपरेटिंग इनकम 1,05,043 करोड़ रुपये होगी, जबकि फाइनेंशियल एसेट्स से होने वाली आय 40,072 करोड़ रुपये रहेगी. यानी कंपनी की कुल आय में ऑपरेटिंग इनकम की हिस्सेदारी 64.3 फीसदी होगी. वहीं, नई कंपनी के पास कुल 2,00,158 करोड़ रुपये की नेट एसेट्स होंगी, जिसमें 1,77,120 करोड़ रुपये का निवेश टाटा ग्रुप की दूसरी कंपनियों में होगा. ट्रस्ट का कहना है कि ग्रुप कंपनियों में निवेश कुल नेट एसेट के 90 फीसदी से कम रहेगा. इसलिए नई कंपनी CIC की शर्तों को पूरा नहीं करेगी.
Tata Sons को अनलिस्टेड रखने की कोशिश
इस पूरे प्लान का एक बड़ा मकसद टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचाना भी है. टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड ने फैसला किया था कि टाटा संस को अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश की जाएगी. अब इसी फैसले के तहत यह पुनर्गठन प्रस्ताव सामने रखा गया है.
RBI की मंजूरी के बिना नहीं होगा विलय
हालांकि, यह प्लान सिर्फ बोर्ड की मंजूरी से लागू नहीं होगा. इसके लिए RBI की मंजूरी जरूरी होगी. टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस के बोर्ड से कहा है कि वह RBI से इस विलय के लिए जरूरी No-Objection Certificate यानी NOC लेने की प्रक्रिया शुरू करे. अगर यह पुनर्गठन पूरा हो जाता है और टाटा संस CIC की कैटेगरी से बाहर हो जाती है, तो उसे अपना CIC रजिस्ट्रेशन भी सरेंडर करना होगा.
SP Group के लिए क्या बदलेगा?
टाटा संस में हिस्सेदारी रखने वाले शापूरजी पालोनजी यानी SP ग्रुप के लिए भी यह प्रस्ताव अहम है. हालांकि, एक्सपर्ट्स के मुताबिक इससे SP ग्रुप की अपनी हिस्सेदारी बेचने की समस्या तुरंत खत्म नहीं होगी. बुटीक कैपिटल मार्केट एडवाइजरी फर्म श्रीयम एडवाइजर्स के फाउंडर हर्षल अंजारिया के मुताबिक, SP ग्रुप के पास अभी भी अपनी हिस्सेदारी बेचकर पैसा निकालने का कोई साफ रास्ता नहीं होगा. उनका कहना है कि अगर RBI को यह रीस्ट्रक्चरिंग उसके पहले के फैसले को दरकिनार करने की कोशिश जैसा लगा, तो इस पर रेगुलेटरी सवाल उठ सकते हैं.
TCS के डिविडेंड पर भी असर?
इस बदलाव का असर टाटा ग्रुप के अंदर पैसों के इस्तेमाल पर भी पड़ सकता है. फिलहाल TCS से मिलने वाले डिविडेंड का इस्तेमाल टाटा संस ग्रुप की दूसरी कंपनियों और नए कारोबारों में पैसा लगाने के लिए करती है. अगर कंपनी की संरचना बदलती है तो इस फंडिंग मॉडल पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में कुछ कंपनियों के लिए फंडिंग महंगी हो सकती है और बैंकों या रेटिंग एजेंसियों को भी उनके वित्तीय सपोर्ट का दोबारा आकलन करना पड़ सकता है.
अब आगे क्या?
फिलहाल यह टाटा ट्रस्ट का प्रस्ताव है. इसे लागू करने के लिए टाटा संस के बोर्ड की मंजूरी और सबसे अहम RBI की मंजूरी जरूरी होगी. यानी आने वाले दिनों में असली नजर इस बात पर होगी कि RBI इस पुनर्गठन को मंजूरी देता है या नहीं. अगर मंजूरी मिलती है, तो टाटा संस को अनलिस्टेड रखते हुए उसकी रेगुलेटरी स्थिति बदलने का रास्ता खुल सकता है.
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