अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विदेशी जेनेरिक दवाओं को लेकर नई टैरिफ नीति का ऐलान किया है. इस फैसले के तहत शुरुआती दो वर्षों तक आयातित जेनेरिक दवाओं पर कोई नया टैरिफ नहीं लगाया जाएगा. लेकिन इसके बाद एक साल के लिए 100% टैरिफ लागू होगा और अगले चरण में इसे बढ़ाकर 200% तक कर दिया जाएगा. इस घोषणा के साथ अमेरिका ने साफ संकेत दिया है कि वह दवा उत्पादन को अपनी सीमाओं के भीतर लाना चाहता है और विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. भारत जैसे बड़े जेनेरिक दवा निर्यातक देशों के लिए इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
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क्या है ट्रंप सरकार की नई योजना?
नई नीति के मुताबिक अमेरिका में आने वाली जेनेरिक दवाओं पर तीन चरणों में टैरिफ लागू किया जाएगा.
- पहले चरण में अगले दो वर्षों तक कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगेगा. इस दौरान कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन और उत्पादन रणनीति बदलने का समय मिलेगा.
- दूसरे चरण में दो साल पूरे होने के बाद विदेशी जेनेरिक दवाओं पर सीधे 100% आयात शुल्क लगाया जाएगा.
- तीसरे और अंतिम चरण में इस शुल्क को बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा. इस स्तर पर विदेशी दवाओं का अमेरिकी बाजार में आयात काफी महंगा हो जाएगा.
ट्रंप के फैसले के पीछे क्या है रणनीति?
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर कहा कि इस नीति का उद्देश्य अमेरिका में जेनेरिक दवाओं का उत्पादन बढ़ाना है. उनका कहना है कि जो कंपनियां तय समय के भीतर अमेरिका में अपने प्लांट और उत्पादन सुविधाएं विकसित नहीं करेंगी, उनके खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है. ट्रंप लंबे समय से अपनी 'मोस्ट-फेवर्ड-नेशन' दवा मूल्य निर्धारण नीति पर जोर देते रहे हैं. इसके जरिए दवा कंपनियों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे अमेरिका में भी दवाओं की कीमतें दूसरे विकसित देशों के समान रखें. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह नई व्यवस्था केवल जेनेरिक दवाओं पर लागू होगी. पेटेंट वाली, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं के लिए फिलहाल किसी बदलाव की घोषणा नहीं की गई है.
अमेरिका जेनेरिक दवाओं पर इतना निर्भर क्यों?
US Food and Drug Administration के मुताबिक अमेरिका में बिकने वाली 90% से ज्यादा दवाएं जेनेरिक कैटेगरी की होती हैं. यही वजह है कि इस सेक्टर में किसी भी नीति बदलाव का असर पूरी दवा इंडस्ट्री पर पड़ सकता है. पिछले वर्ष कई वैश्विक दवा कंपनियों ने अमेरिकी सरकार के साथ समझौते भी किए थे, जिनके तहत कुछ दवाओं को टैरिफ से राहत दी गई थी.
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है. भारतीय फार्मा कंपनियां लंबे समय से अमेरिकी बाजार में मजबूत मौजूदगी रखती हैं. सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला, ल्यूपिन और अरबिंदो फार्मा जैसी कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है. अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली करीब 40% जेनेरिक दवाएं भारत से सप्लाई की जाती हैं. ऐसे में अमेरिकी टैरिफ नीति का असर भारतीय फार्मा इंडस्ट्री पर पड़ना तय माना जा रहा है.
शुरुआती दो साल राहत क्यों?
नई नीति का सबसे बड़ा पहलू यह है कि शुरुआती दो वर्षों तक टैरिफ शून्य रहेगा. इसका मतलब है कि फिलहाल भारतीय कंपनियों को तत्काल किसी अतिरिक्त टैक्स का सामना नहीं करना पड़ेगा. इस दौरान कंपनियां अपनी निर्यात रणनीति की समीक्षा कर सकती हैं और भविष्य की तैयारी के लिए जरूरी फैसले ले सकती हैं.
आगे बढ़ सकती हैं चुनौतियां
दो साल की राहत अवधि खत्म होने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है. 100% और बाद में 200% टैरिफ लागू होने पर भारतीय दवाएं अमेरिकी बाजार में काफी महंगी हो जाएंगी. ऐसी स्थिति में कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है. साथ ही अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
अमेरिका में निवेश बढ़ाने का दबाव
अगर भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजार में अपनी मौजूदगी बनाए रखना चाहती हैं तो उन्हें अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करनी पड़ सकती है या स्थानीय कंपनियों के साथ जॉइंट वेंचर का रास्ता अपनाना होगा. इससे पूंजीगत खर्च यानी कैपेक्स बढ़ सकता है और कंपनियों की निवेश योजनाओं में भी बदलाव देखने को मिल सकता है.
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा फार्मा बाजार
आईईबीएफ के आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया के 200 से अधिक देशों को फार्मास्युटिकल उत्पाद निर्यात करता है. भारत के कुल फार्मा निर्यात का लगभग 50% हिस्सा नॉर्थ अमेरिका और यूरोप जैसे रेगुलेटेड बाजारों में जाता है. वित्त वर्ष 2025 में भारत के सबसे बड़े फार्मा निर्यात बाजारों में अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील, फ्रांस और दक्षिण अफ्रीका शामिल रहे. वित्त वर्ष 2025 के दौरान भारत के कुल फार्मा निर्यात में अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी 34.61% रही. वहीं वित्त वर्ष 2026 की अप्रैल से जुलाई अवधि में भी अमेरिका सबसे बड़ा आयातक बना रहा, जिसकी हिस्सेदारी 34.06% दर्ज की गई.
निर्यात के हालिया आंकड़े क्या बताते हैं?
वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में अप्रैल से दिसंबर के बीच अमेरिका को भारत का फार्मा निर्यात लगातार मजबूत बना रहा. अप्रैल 2025 में निर्यात 41.05 मिलियन डॉलर रहा. मई में यह बढ़कर 46.10 मिलियन डॉलर पहुंचा. जून में 50.60 मिलियन डॉलर का निर्यात हुआ. जुलाई में 49.87 मिलियन डॉलर, अगस्त में 44.79 मिलियन डॉलर, सितंबर में 45.79 मिलियन डॉलर, अक्टूबर में 40.79 मिलियन डॉलर, नवंबर में 41.23 मिलियन डॉलर और दिसंबर में 53.09 मिलियन डॉलर का निर्यात दर्ज किया गया. वहीं वर्ष 2026 में जनवरी के दौरान यह आंकड़ा 51.95 मिलियन डॉलर और फरवरी में 47.42 मिलियन डॉलर रहा.
भारतीय कंपनियों की मजबूत मौजूदगी
USFDA के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2023 तक भारतीय फार्मूलेशन कंपनियों को 6,316 मार्केट ऑथराइजेशन मिल चुके थे, जो किसी भी दूसरे देश की तुलना में सबसे अधिक हैं. इसके अलावा 2023 की पहली छमाही में भारतीय कंपनियों ने 410 Type II DMFs दाखिल किए, जबकि 2022 की समान अवधि में यह संख्या 350 थी. जनवरी 2023 तक भारतीय कंपनियों द्वारा दाखिल Type II Active DMFs की कुल संख्या 4,505 पहुंच चुकी थी.
आगे क्या देखना होगा?
फिलहाल भारतीय फार्मा कंपनियों के पास दो वर्षों की राहत जरूर है, लेकिन उसके बाद लागू होने वाला 100% और फिर 200% टैरिफ उनके लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. ऐसे में आने वाले समय में कंपनियां अमेरिकी बाजार में अपनी रणनीति कैसे बदलती हैं और स्थानीय उत्पादन पर कितना निवेश करती हैं, यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे अहम कड़ी होगी.
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