UPI पर MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू होने के बाद अब ब्रोकिंग इंडस्ट्री से भी सवाल उठने लगे हैं. जिरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ ने 16 सितंबर को एक पोस्ट के जरिए कहा कि UPI पर MDR लगना शायद समय के साथ जरूरी था और इससे पेमेंट मार्केट में कंपीटिशन भी बढ़ सकता है. लेकिन उनके मुताबिक इन्वेस्टिंग और ब्रोकिंग जैसे सेक्टर में मौजूदा MDR स्ट्रक्चर परेशानी पैदा कर सकता है.
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ब्रोकिंग में MDR की दिक्कत क्या है?
नितिन कामथ के मुताबिक, ब्रोकिंग में सबसे बड़ी समस्या यह है कि ग्राहक के अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करने का मतलब यह नहीं है कि वह ग्राहक शेयरों की खरीद-बिक्री भी करेगा.यानी ग्राहक ने UPI के जरिए ब्रोकर के पास पैसा जमा किया, लेकिन बाद में कोई ट्रेड नहीं किया. ऐसी स्थिति में ब्रोकर को कोई अतिरिक्त कमाई नहीं होती, लेकिन UPI ट्रांसफर पर MDR का खर्च उसे उठाना पड़ सकता है. कामथ ने कहा कि अगर ब्रोकर यह चार्ज ग्राहक से नहीं ले सकता, तो ग्राहक कितनी बार पैसा ट्रांसफर करता है और उसके बाद ट्रेड करता है या नहीं, इसका खर्च ब्रोकर के लिए बढ़ता जा सकता है.
कामथ ने दिया ₹2 करोड़ का उदाहरण
नितिन कामथ ने इस समस्या को समझाने के लिए एक उदाहरण भी दिया.उनके मुताबिक, अगर 10,000 ग्राहक एक महीने में 50-50 बार ₹2 लाख का UPI ट्रांसफर करें और इनमें से किसी भी ट्रांसफर के बाद कोई ट्रेड न हो, तो प्रस्तावित MDR के तहत ब्रोकर पर करीब ₹2 करोड़ का खर्च आ सकता है. ये कामथ का उदाहरण है, जिसके जरिए उन्होंने बताया कि बिना किसी ट्रेड या अतिरिक्त रेवेन्यू के भी ब्रोकर्स पर UPI की लागत बढ़ सकती है.
तिमाही सेटलमेंट से भी बढ़ सकती है लागत
नितिन कामथ ने तिमाही सेटलमेंट यानी QS का मुद्दा भी उठाया है.SEBI के नियमों के तहत ब्रोकरों को ग्राहकों के इस्तेमाल नहीं हुए फंड को तय समय पर वापस करना होता है. इसके बाद ग्राहक जब दोबारा निवेश या ट्रेड करना चाहता है तो वही पैसा वापस अपने ब्रोकिंग अकाउंट में ट्रांसफर करता है.कामथ के मुताबिक, इन फंड ट्रांसफर का एक बड़ा हिस्सा UPI के जरिए होता है. ऐसे में एक ही ग्राहक का पैसा ब्रोकिंग अकाउंट से बाहर जाने और फिर वापस आने के दौरान दोबारा UPI ट्रांजैक्शन हो सकता है.उनका तर्क है कि इस प्रक्रिया में ब्रोकर को MDR का खर्च उठाना पड़ सकता है, जबकि हर बार पैसा वापस आने पर कोई नया कारोबार या रेवेन्यू जरूरी नहीं बनता.
क्या फ्री इक्विटी डिलीवरी पर पड़ेगा असर?
जिरोधा फिलहाल इक्विटी डिलीवरी ट्रेड पर ब्रोकरेज नहीं लेता. कामथ के मुताबिक, मौजूदा बिजनेस मॉडल में इसकी गुंजाइश है.लेकिन उनका कहना है कि अगर ग्राहक के हर UPI ट्रांसफर पर अतिरिक्त लागत आने लगे, चाहे ग्राहक बाद में ट्रेड करे या नहीं, तो इस खर्च को हमेशा ब्रोकर के लिए वहन करना मुश्किल हो सकता है.इसका मतलब यह है कि लंबे समय में ब्रोकिंग कंपनियों के फ्री इक्विटी डिलीवरी मॉडल की लागत का गणित बदल सकता है. हालांकि, कामथ ने यह नहीं कहा है कि जिरोधा ने फ्री डिलीवरी ब्रोकरेज खत्म करने का फैसला कर लिया है. उन्होंने सिर्फ अतिरिक्त लागत को लंबे समय तक absorb करने की चुनौती बताई है.
नितिन कामथ ने क्या सुझाया?
नितिन कामथ ने कहा कि वह MDR के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन ब्रोकिंग के लिए MDR की दर और अधिकतम सीमा अलग होनी चाहिए.उन्होंने करीब 0.02% MDR और ₹5-10 प्रति ट्रांजैक्शन की कैप को ब्रोकिंग के लिए ज्यादा उचित बताया है. उनके मुताबिक, ₹300 तक की कैप ब्रोकिंग कारोबार के लिए ज्यादा लागत पैदा कर सकती है.
अभी क्या है UPI MDR का नियम?
NPCI के नए ढांचे के मुताबिक, 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से ज्यादा के चुनिंदा UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर MDR लागू होगा. कैपिटल मार्केट से जुड़े ट्रांजैक्शन के लिए MDR 0.02% और अधिकतम ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन रखा गया है. ग्राहक से यह शुल्क सीधे नहीं लिया जा सकता है.यही मौजूदा ढांचा है जिस पर नितिन कामथ ने ब्रोकिंग सेक्टर के नजरिए से सवाल उठाए हैं. उनका मुख्य सवाल यह है कि जिस UPI ट्रांसफर से कोई ट्रेड या रेवेन्यू पैदा ही नहीं होता, उसकी लागत ब्रोकर कितने समय तक उठा पाएगा.
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