US-Iran War Impact on India : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव एक बार फिर पूरी दुनिया की चिंता का कारण बन गया है. हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच गए हैं कि इसका असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है. खासतौर पर ऊर्जा आपूर्ति, कच्चे तेल की कीमतों, महंगाई और शेयर बाजार पर इसका असर देखने को मिल सकता है.हाल के घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ गई है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल है और भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए भी बेहद अहम माना जाता है. अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है, तो इसका असर कई मोर्चों पर दिखाई दे सकता है.
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तेल और गैस की सप्लाई पर बढ़ सकता है दबाव
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. युद्ध से पहले देश के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 40 प्रतिशत और एलएनजी आयात का लगभग 60 प्रतिशत होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता था. ऐसे में अगर इस समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ता है या आवाजाही प्रभावित होती है, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है. तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने की स्थिति में ईंधन की उपलब्धता और कीमतें दोनों प्रभावित हो सकती हैं.
बढ़ सकता है भारत का आयात बिल
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला हर बड़ा बदलाव सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर असर डालता है. अगर युद्ध के चलते कच्चा तेल और महंगा होता है, तो भारत को समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ेगी. इससे आयात बिल बढ़ सकता है और चालू खाते के घाटे पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी. इसका असर रुपये की मजबूती पर भी पड़ सकता है.
पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीद को झटका
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना कमजोर पड़ सकती है. ऊर्जा लागत बढ़ने का असर एलपीजी समेत दूसरे ईंधनों पर भी देखने को मिल सकता है. ऐसे में उपभोक्ताओं को ईंधन पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है.
महंगाई बढ़ने का खतरा
महंगा कच्चा तेल सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. इसका असर परिवहन लागत, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों पर भी पड़ता है. अगर तेल आयात महंगा होता है, तो आयातित वस्तुओं की लागत भी बढ़ सकती है. इससे महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी और आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है.
शेयर बाजार और निवेशकों पर बढ़ सकता है दबाव
वैश्विक तनाव बढ़ने पर निवेशक अक्सर जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाते हैं. ऐसी स्थिति में शेयर बाजारों में बिकवाली देखने को मिल सकती है. भू-राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ने से विदेशी निवेशकों का रुख भी सतर्क हो सकता है. इसका असर भारतीय शेयर बाजार की चाल पर दिखाई दे सकता है और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है.
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
आने वाले दिनों में निवेशकों और बाजार की नजर मिडिल ईस्ट के हालात, होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री गतिविधियों, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक निवेशकों के रुख पर रहेगी. इन कारकों के आधार पर भारत में ऊर्जा लागत, महंगाई और बाजार की दिशा तय हो सकती है.
निष्कर्ष.
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं है, बल्कि इसका असर देश की अर्थव्यवस्था के कई अहम क्षेत्रों पर पड़ सकता है. ऊर्जा सुरक्षा, आयात बिल, महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतें और शेयर बाजार सभी इस घटनाक्रम से प्रभावित हो सकते हैं. इसलिए आने वाले दिनों में वैश्विक हालात पर नजर बनाए रखना निवेशकों और आम उपभोक्ताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा.
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