दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन शुरू हो चुका है. इसी बीच अमेरिका ने भारत से आने वाले सोलर सेल और सोलर पैनल पर बहुत ऊंचा आयात शुल्क लगाने का फैसला किया है. यह कदम कारोबार के मोर्चे पर भारत-अमेरिका संबंधों में नया तनाव दिखा रहा है.
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अमेरिका ने भारतीय सोलर उत्पादों पर 123.04 फीसदी एंटी-डंपिंग शुल्क और 126.09 फीसदी काउंटरवेलिंग शुल्क तय किया है. अमेरिका का आरोप है कि भारत समेत कुछ देशों के निर्माता उसके बाजार में कम कीमत पर माल बेच रहे हैं और उन्हें सरकारी मदद भी मिल रही है. वहीं अंतिम फैसला अभी बाकी है, क्योंकि 14 अक्टूबर को यूएसआईटीसी अपना निर्णय देगा.
अमेरिका के फैसले में क्या है
अमेरिका ने यह शुल्क सिर्फ भारत पर नहीं लगाया है. इंडोनेशिया और लाओस से आने वाले सोलर सेल और सोलर पैनल भी इस फैसले के दायरे में हैं. अमेरिकी वाणिज्य विभाग का कहना है कि इन देशों के उत्पाद अमेरिकी कंपनियों के लिए बराबरी का मुकाबला मुश्किल बना रहे हैं.
मुख्य बातें
• भारत पर 123.04 फीसदी एंटी-डंपिंग शुल्क तय किया गया है.
• भारत पर 126.09 फीसदी काउंटरवेलिंग शुल्क भी लगाया गया है.
• इंडोनेशिया पर 94.36 फीसदी एंटी-डंपिंग शुल्क तय किया गया है.
• लाओस पर 65.43 फीसदी एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया गया है.
• इंडोनेशिया पर काउंटरवेलिंग शुल्क 73.2 फीसदी से 173.7 फीसदी तक है.
• लाओस पर काउंटरवेलिंग शुल्क 82.03 फीसदी से 153.67 फीसदी तक तय किया गया है.
अमेरिकी वाणिज्य विभाग का आरोप है कि भारत, इंडोनेशिया और लाओस के कुछ निर्माता सोलर उत्पाद कम कीमत पर बेच रहे हैं. कारोबार की भाषा में इसे डंपिंग कहा जाता है. अमेरिका का यह भी कहना है कि इन कंपनियों को सरकार की तरफ से ऐसी मदद मिल रही है, जिससे बाजार में कीमत का असर बदल रहा है.
यह फैसला अचानक नहीं आया है. अमेरिका में एलायंस फॉर अमेरिकन सोलर मैन्युफैक्चरिंग एंड ट्रेड नाम के एक समूह ने शिकायत की थी. इस समूह में फर्स्ट सोलर, हानव्हा क्यूसेल्स और मिशन सोलर एनर्जी जैसी कंपनियां शामिल हैं. इन कंपनियों का कहना है कि अमेरिकी सोलर निर्माताओं के लिए बराबरी का मुकाबला और अपने देश के सोलर कारोबार से जुड़े कर्मचारियों की सुरक्षा जरूरी है.
भारत के लिए इसका क्या मतलब है
अगर यह भारी शुल्क लागू रहता है, तो भारत से अमेरिका जाने वाले सोलर निर्यात पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर भारतीय सोलर कंपनियों और दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों पर भी पड़ सकता है. हालांकि अभी यह कहना ठीक नहीं होगा कि यह कदम सीधे ब्रिक्स सम्मेलन की वजह से उठाया गया है, क्योंकि यह मामला अमेरिकी कंपनियों की शिकायत और वहां की व्यापार जांच से जुड़ा हुआ है.
अमेरिकी वाणिज्य विभाग के फैसले के बाद अब यूएसआईटीसी का अंतिम फैसला आना बाकी है. यूएसआईटीसी 14 अक्टूबर को अपना निर्णय सुनाएगा. इसके बाद यह साफ होगा कि भारत पर तय शुल्क किस रूप में आगे बढ़ता है और नवंबर में अंतिम स्थिति क्या रहती है.
फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि भारत का बढ़ता सोलर उत्पादन और अमेरिका की अपने देश के सोलर कारोबार को बचाने की कोशिश अब आमने-सामने दिख रही है. अब नजर 14 अक्टूबर के फैसले और आगे तय होने वाले अंतिम शुल्क पर रहेगी.
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