US Treasury Yield का खेल ! क्या ले डूबेगा भारतीय शेयर बाज़ार ?

चिराग ठाकुर

• 06:24 PM • 26 Sep 2026

अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 5% पार पहुंची है. इसका असर रुपये, भारतीय बॉन्ड, रिजर्व बैंक की दरों और शेयर बाजार पर पड़ सकता है. पूरी बात यहां आसान भाषा में जानें

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न्यूज़ हाइलाइट्स

लंबी अवधि की अमेरिकी यील्ड कई साल के ऊंचे स्तर पर रही

ऊंची अमेरिकी यील्ड से डॉलर मजबूत और रुपये पर दबाव बढ़ सकता

कच्चा तेल महंगा रहा तो भारत का आयात बिल और बढ़ेगा

अमेरिका से आया एक आंकड़ा इस समय सिर्फ वहां के बॉन्ड मार्केट की कहानी नहीं बता रहा, बल्कि दुनिया भर के निवेशकों के लिए संकेत दे रहा है. US 10-Year Treasury Yield 5% के ऊपर पहुंच चुकी है. 24 सितंबर को यह 5.18% तक गई, जबकि 30-Year Yield 5.47% पर पहुंची. अमेरिकी ट्रेजरी के आधिकारिक आंकड़ों में भी इन स्तरों की पुष्टि होती है.

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अब सवाल है कि भारत के निवेशक को इससे क्या लेना-देना? असल में अमेरिकी बॉन्ड की Yield में बढ़ोतरी का असर डॉलर, रुपया, भारतीय बॉन्ड और शेयर बाजार तक पहुंच सकता है.

US Treasury Yield आखिर इतनी अहम क्यों है?

US Treasury को ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट का एक प्रमुख benchmark माना जाता है. दुनिया भर के निवेशक अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की Yield को देखकर दूसरे देशों के निवेश से मिलने वाले रिटर्न की तुलना करते हैं.

अगर अमेरिका जैसे बड़े बाजार में अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले सरकारी बॉन्ड से ही 5% से ज्यादा Yield मिल रही है, तो भारत जैसे emerging market में पैसा लगाने वाला निवेशक ज्यादा रिटर्न की मांग कर सकता है.

यानी कहानी सिर्फ Yield बढ़ने की नहीं है. इसके साथ दुनिया भर के निवेश की दिशा और जोखिम लेने की क्षमता भी बदल सकती है.

अमेरिकी Bond Yield क्यों बढ़ रही है?

लंबी अवधि की अमेरिकी Bond Yield पर कई चीजों का असर पड़ता है. मौजूदा तेजी के पीछे मजबूत अमेरिकी आर्थिक गतिविधि, महंगाई को लेकर चिंता और अमेरिकी सरकार की बड़ी borrowing जरूरतों जैसे कारण बताए जा रहे हैं. हालिया Treasury sell-off में मजबूत growth, persistent inflation और भारी Treasury issuance को भी दबाव की वजह बताया गया है.

24 सितंबर को 10-Year Yield 5.18% और 30-Year Yield 5.47% तक पहुंची थी. 25 सितंबर को भी दोनों Yield ऊंचे स्तर पर बनी रहीं.

भारत के रुपये पर क्या असर पड़ेगा?

यहां सबसे पहले असर Currency Market में नजर आ सकता है. US Yield बढ़ने पर डॉलर आधारित निवेश ज्यादा आकर्षक हो सकता है. दूसरी तरफ भारत जैसे बाजार में विदेशी निवेशक ज्यादा रिटर्न की मांग कर सकते हैं.

रुपये पर पहले से ही तेल की कीमतों और डॉलर की मांग का दबाव है. सितंबर में रुपया 96 प्रति डॉलर के आसपास भी कारोबार कर चुका है. Reuters के मुताबिक तेल की कीमतें और आयातकों की डॉलर मांग रुपये के लिए अहम दबाव बने हुए हैं.

और भारत के लिए कमजोर रुपये की समस्या सिर्फ Currency Market तक सीमित नहीं है.

Crude Oil महंगा हुआ तो दबाव और बढ़ सकता है

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है. इसलिए अगर एक तरफ डॉलर मजबूत हो और दूसरी तरफ Crude Oil महंगा हो जाए, तो भारत के लिए तेल खरीदना और महंगा पड़ सकता है.

इसे आसान तरीके से समझिए:

  • US Yield ऊपर → डॉलर की मांग बढ़ सकती है.
  • डॉलर मजबूत → रुपये पर दबाव.
  • रुपया कमजोर → डॉलर में होने वाला आयात महंगा.
  • Crude महंगा → आयात बिल पर अतिरिक्त दबाव.
  • दोनों साथ आएं → महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है.

भारतीय Bond Market पर भी असर

US Treasury Yield बढ़ने का असर भारत के Bond Market में भी दिखाई दे सकता है. भारत की 10-Year Government Bond Yield 24 सितंबर को 7.11% और 25 सितंबर को करीब 7.12% रही.

अगर निवेशक ज्यादा Yield की मांग करते हैं, तो सरकार और कंपनियों के लिए बाजार से पैसा जुटाने की लागत पर दबाव बढ़ सकता है. सरकार देश के सबसे बड़े borrowers में शामिल है, इसलिए लंबे समय तक ऊंची Bond Yield बनी रहना borrowing cost के लिए अहम हो सकता है.

RBI के सामने भी बढ़ सकता है मुश्किल संतुलन

अब इसका असर Monetary Policy तक पहुंचता है. अगर US Yield ऊंची बनी रहती है, डॉलर मजबूत होता है और रुपये पर दबाव रहता है, तो RBI के लिए ब्याज दरों में कटौती का फैसला ज्यादा जटिल हो सकता है.

क्योंकि Rate Cut से Growth को सहारा मिल सकता है, लेकिन दूसरी तरफ बहुत तेजी से दरें घटाने पर रुपये और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है.

यानी RBI के सामने Growth, Inflation और Rupee के बीच संतुलन साधने की चुनौती रह सकती है.

शेयर बाजार के निवेशकों को क्यों सतर्क रहना चाहिए?

US Yield बढ़ने का असर Equity Valuations पर भी पड़ सकता है. जब सरकारी बॉन्ड से ही ज्यादा Yield मिलने लगे, तो निवेशक शेयरों में पैसा लगाने के लिए ज्यादा रिटर्न की उम्मीद कर सकते हैं.

खासकर ऐसी कंपनियां प्रभावित हो सकती हैं जिनकी मौजूदा कीमत भविष्य में बहुत दूर मिलने वाले मुनाफे की उम्मीद पर टिकी है.

लेकिन यहां एक जरूरी बात है. US Yield बढ़ना अपने आप में भारतीय शेयर बाजार में गिरावट की गारंटी नहीं है. अगर Yield अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती के कारण बढ़ रही है, तो अमेरिका की मजबूत मांग से भारतीय IT और कुछ export-oriented कंपनियों को फायदा भी हो सकता है.

असली चिंता कब बढ़ेगी?

सबसे ज्यादा दबाव तब बन सकता है जब कई चीजें एक साथ हों:

  • US Treasury Yield ऊंची रहे.
  • डॉलर मजबूत बना रहे.
  • Crude Oil महंगा हो.
  • रुपया कमजोर हो.
  • भारत में महंगाई का दबाव बढ़े.

यानी अमेरिकी Bond Market में चल रही हलचल को सिर्फ अमेरिका की कहानी समझना सही नहीं होगा. इसका असर भारत के रुपये, बॉन्ड Yield, RBI की नीति और शेयर बाजार तक पहुंच सकता है. इसलिए आने वाले समय में निवेशकों के लिए सिर्फ Nifty या Sensex देखना ही नहीं, बल्कि US Treasury Yield, Dollar और Crude Oil की चाल पर भी नजर रखना अहम होगा.