भारत का Space Jackpot! Skyroot के Vikram-1 ने खोले 600 अरब डॉलर के बाजार के दरवाजे

चिराग ठाकुर

• 01:55 PM • 18 Jul 2026

स्काईरूट एयरोस्पेस ने श्रीहरिकोटा से विक्रम-1 की सफल ऑर्बिटल उड़ान भरकर बड़ा रिकॉर्ड बनाया. इससे भारत के निजी स्पेस सेक्टर को नई रफ्तार और वैश्विक पहचान मिली है.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

मिशन आगमन में रॉकेट ने पेलोड को तय कक्षा में स्थापित किया

विक्रम-1 करीब 450 किलोमीटर तक 350 किलोग्राम पेलोड ले जा सकता है

रॉकेट में ठोस और तरल ईंधन के साथ 3डी प्रिंट इंजन हैं

भारत ने अंतरिक्ष की दुनिया में एक बड़ी छलांग लगाई है. हैदराबाद की निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने अपना पहला ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है. श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च हुआ यह रॉकेट 'मिशन आगमन' के तहत अंतरिक्ष में भेजा गया. विक्रम-1 ने सफलतापूर्वक लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में पहुंचकर अपने साथ ले गए पेलोड को तय कक्षा में स्थापित किया.इस सफलता के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहां किसी निजी कंपनी ने खुद का ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करने की क्षमता हासिल की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस उपलब्धि को भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक नई शुरुआत बताया.

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आखिर Vikram-1 की सफलता इतनी बड़ी क्यों है?

विक्रम-1 की खास बात यह है कि यह सिर्फ अंतरिक्ष तक पहुंचने वाला रॉकेट नहीं है, बल्कि यह सैटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है. इससे पहले स्काईरूट ने साल 2022 में विक्रम-S लॉन्च किया था. लेकिन वह सिर्फ एक टेस्ट मिशन था. वहीं विक्रम-1 एक ऑर्बिटल रॉकेट है, जो छोटे सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए बनाया गया है.करीब सात मंजिला ऊंचाई वाला यह रॉकेट लगभग 450 किलोमीटर ऊपर लो-अर्थ ऑर्बिट तक पेलोड ले जा सकता है. इसकी क्षमता करीब 350 किलोग्राम तक का वजन अंतरिक्ष में पहुंचाने की है. इस रॉकेट में ठोस और तरल ईंधन दोनों तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. इसके कुछ इंजन 3D प्रिंटिंग तकनीक से बनाए गए हैं, जिससे रॉकेट को बनाने में समय और लागत कम करने में मदद मिल सकती है.

क्या है Skyroot का 'Cab to Space' आइडिया?

स्काईरूट सिर्फ रॉकेट बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती. कंपनी अंतरिक्ष तक पहुंचने के तरीके को आसान बनाने का सपना देख रही है.अभी छोटी सैटेलाइट बनाने वाली कंपनियों को लॉन्च के लिए बड़े रॉकेट का इंतजार करना पड़ता है. कई बार महीनों तक सही मौका नहीं मिलता और उन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव करने पड़ते हैं.

स्काईरूट इसी समस्या को हल करना चाहती है.कंपनी का कहना है कि भविष्य में ग्राहक अपनी जरूरत के हिसाब से रॉकेट लॉन्च बुक कर सकेंगे. यानी जैसे आप कहीं जाने के लिए ट्रेन का इंतजार करने के बजाय कैब बुक करते हैं, वैसे ही सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए अलग लॉन्च बुक किया जा सकेगा. इसी सोच को कंपनी "Cab to Space" मॉडल कहती है.

स्काईरूट की नजर सिर्फ भारत पर नहीं

स्काईरूट का लक्ष्य सिर्फ भारतीय ग्राहकों तक सीमित नहीं है. कंपनी दुनिया भर की सैटेलाइट कंपनियों को लॉन्च सर्विस देना चाहती है.मिशन आगमन में भारतीय पेलोड के साथ विदेशी पेलोड भी भेजे गए हैं. इससे साफ है कि कंपनी शुरुआत से ही ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है. दुनिया में छोटे सैटेलाइट की संख्या तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में ऐसी कंपनियों की मांग बढ़ रही है, जो कम समय में छोटे सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचा सकें.

600 अरब डॉलर की स्पेस इंडस्ट्री में भारत का बड़ा मौका

आज दुनिया की स्पेस इंडस्ट्री करीब 600 अरब डॉलर की हो चुकी है. इसमें सिर्फ रॉकेट लॉन्च ही शामिल नहीं हैं, बल्कि सैटेलाइट, इंटरनेट सर्विस, कम्युनिकेशन, नेविगेशन और अंतरिक्ष से मिलने वाले डेटा जैसी कई सेवाएं भी आती हैं. स्काईरूट का मानना है कि आने वाले समय में सैटेलाइट लॉन्च की मांग तेजी से बढ़ेगी, लेकिन इस मांग को पूरा करने के लिए अभी कंपनियां कम हैं. अगर स्काईरूट लगातार सफल लॉन्च करती रहती है, तो भारत इस तेजी से बढ़ते बाजार में अपनी मजबूत जगह बना सकता है.

इसरो के दो पूर्व वैज्ञानिकों ने शुरू की थी कंपनी

स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत साल 2018 में इसरो के दो पूर्व वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी. जब साल 2020 में भारत सरकार ने स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोला, तो स्काईरूट ने अपने रॉकेट प्रोजेक्ट पर तेजी से काम शुरू किया. कई साल की मेहनत और टेस्टिंग के बाद कंपनी अब विक्रम-1 के साथ इस मुकाम तक पहुंची है.

आगे क्या है Skyroot का प्लान?

विक्रम-1 की सफलता सिर्फ शुरुआत है. कंपनी आगे और टेस्ट मिशन करेगी ताकि रॉकेट की क्षमता और भरोसे को और मजबूत किया जा सके.इसके बाद स्काईरूट की योजना कमर्शियल लॉन्च सर्विस शुरू करने की है.कंपनी ज्यादा रॉकेट बनाने और बार-बार सफल लॉन्च करने की क्षमता विकसित करना चाहती है. क्योंकि स्पेस बिजनेस में सिर्फ एक सफल लॉन्च काफी नहीं होता, बल्कि लगातार सफलता और ग्राहकों का भरोसा सबसे बड़ी चुनौती होती है.

भारत के लिए क्यों अहम है यह सफलता?

विक्रम-1 की उड़ान सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च नहीं है. यह दिखाता है कि भारत की निजी कंपनियां भी अब अंतरिक्ष के बड़े बाजार में उतरने के लिए तैयार हैं.आने वाले समय में अगर स्काईरूट जैसी कंपनियां लगातार सफल रहती हैं, तो भारत दुनिया के लिए सैटेलाइट लॉन्च करने का बड़ा केंद्र बन सकता है.इससे नई नौकरियां पैदा होंगी, निवेश बढ़ेगा और भारत की स्पेस इकोनॉमी को नई रफ्तार मिल सकती है.यानी विक्रम-1 सिर्फ एक रॉकेट नहीं, बल्कि भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के नए दौर की शुरुआत है.