शेयर बाजार में तेजी के बावजूद यस बैंक के शेयरों में गुरुवार को भारी बिकवाली देखने को मिली. शेयर इंट्राडे में 20 फीसदी तक टूटकर 16.96 रुपये पर आ गया. आखिर में शेयर 14.53 फीसदी टूटकर 18 रुपये के करीब बंद हुआ. इसकी बड़ी वजह सुप्रीम कोर्ट का 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड से जुड़ा फैसला रहा. कोर्ट ने इन बॉन्ड को राइट ऑफ करने के बैंक के फैसले को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. इससे एक तरफ बॉन्डधारकों को कानूनी राहत मिली है, तो दूसरी तरफ यस बैंक पर संभावित वित्तीय देनदारी को लेकर बाजार की चिंता बढ़ गई है.
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AT-1 बॉन्ड क्या होते हैं?
AT-1 का पूरा नाम Additional Tier-1 है. ये ऐसे बॉन्ड होते हैं जिनके जरिए बैंक अपनी पूंजी जुटाते हैं. इनका मकसद बैंक की वित्तीय स्थिति को मजबूत बनाना और संकट के समय नुकसान सहने की क्षमता बढ़ाना होता है. आसान भाषा में समझें तो जब कोई बैंक AT-1 बॉन्ड जारी करता है, तो निवेशक बैंक को पैसा देते हैं. इसके बदले बैंक बॉन्ड की शर्तों के मुताबिक उन्हें ब्याज देता है. लेकिन इन बॉन्ड में रिस्क भी काफी ज्यादा होता है. सामान्य बॉन्ड के मुकाबले AT-1 बॉन्ड की एक बड़ी खासियत ये है कि बैंक की वित्तीय स्थिति बिगड़ने या तय शर्तें पूरी होने पर इन्हें पूरी तरह राइट ऑफ किया जा सकता है या शेयरों में बदला जा सकता है. ऐसी स्थिति में निवेशकों को अपनी पूरी रकम गंवानी पड़ सकती है.
बॉन्ड क्यों राइट ऑफ किए?
साल 2018 से 2020 के बीच यस बैंक वित्तीय दबाव से जूझ रहा था. बैंक के खराब कर्ज और वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं. मार्च 2020 में हालात गंभीर होने पर RBI ने बैंक की रिस्ट्रक्चरिंग की प्रक्रिया शुरू की. बैंक को संकट से निकालने के लिए एक रिस्ट्रक्चरिंग प्लान लागू किया गया. इस प्लान में SBI समेत दूसरे निवेशकों ने भी हिस्सा लिया. इसी प्रक्रिया के दौरान मार्च 2020 में यस बैंक ने 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड राइट ऑफ कर दिए. इसका मतलब था कि इन बॉन्ड में निवेश करने वाले लोगों और संस्थानों की रकम खत्म हो गई. इनमें म्यूचुअल फंड कंपनियों जैसे संस्थागत निवेशकों के साथ रिटेल निवेशक भी शामिल थे. बॉन्डधारकों ने इस फैसले को चुनौती दी. उनका कहना था कि बैंक के रिस्ट्रक्चरिंग की योजना में बॉन्ड राइट ऑफ करने का स्पष्ट आधार नहीं था. इसी विवाद ने आगे चलकर कानूनी लड़ाई का रूप ले लिया.
बॉन्डधारक कोर्ट क्यों पहुंचे?
यस बैंक के AT-1 बॉन्ड में पैसा लगाने वाले निवेशकों ने अपने निवेश को पूरी तरह खत्म किए जाने के फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया. जनवरी 2023 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने निवेशकों के पक्ष में फैसला सुनाया और बॉन्ड राइट ऑफ करने के आदेश को रद्द कर दिया. इसके बाद यस बैंक, RBI और केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.अब सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है. यानी बॉन्ड राइट ऑफ करने के फैसले को रद्द करने वाला आदेश कायम रहेगा. इस फैसले से निवेशकों के दावे को कानूनी मजबूती मिली है.
SC के फैसले से क्या फायदा होगा?
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन निवेशकों को मिल सकता है जिनका पैसा यस बैंक के AT-1 बॉन्ड में लगा था. बॉन्ड राइट ऑफ होने के बाद उनका निवेश खत्म हो गया था. अब हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से बरकरार रखे जाने के बाद उन्हें अपना दावा आगे बढ़ाने का आधार मिला है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सभी निवेशकों को तुरंत उनकी पूरी रकम वापस मिल जाएगी. निवेशकों को कितना पैसा मिलेगा, भुगतान कैसे होगा और इसमें कितना समय लगेगा, यह कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा.
यस बैंक को चुकाने पड़ेंगे 8,415 करोड़ रुपये?
ये इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल है. बॉन्ड राइट ऑफ किए जाने के फैसले को रद्द करने वाला आदेश बरकरार रहने से यस बैंक पर संभावित वित्तीय देनदारी को लेकर चिंता बढ़ सकती है. लेकिन 8,415 करोड़ रुपये की पूरी रकम तत्काल चुकाने का सीधा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा. वास्तविक देनदारी, ब्याज और भुगतान की प्रक्रिया पर फैसले के क्रियान्वयन तथा लागू शर्तों का असर पड़ेगा. यही वजह है कि बाजार इस मामले को बैंक के लिए संभावित वित्तीय जोखिम के रूप में देख सकता है. हालांकि, शेयर में आई गिरावट को सिर्फ इसी फैसले का नतीजा मानने से पहले कारोबार के दूसरे कारणों और बाजार के रुझान को भी देखना जरूरी है.
निवेशकों के लिए क्या है सबक?
ज्यादा ब्याज मिलने के लालच में किसी निवेश को चुनने से पहले उसके जोखिम को समझना जरूरी होता है. AT-1 बॉन्ड सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह सुरक्षित नहीं होते. बैंक पर संकट आने की स्थिति में इनसे जुड़ी रकम का बड़ा हिस्सा या पूरा निवेश भी खत्म हो सकता है. इस मामले में निवेशकों को अदालत से राहत मिली है, लेकिन हर AT-1 बॉन्ड निवेश में ऐसा नतीजा निकलेगा, इसकी गारंटी नहीं है. निवेश करने से पहले बॉन्ड की शर्तों, जोखिम और अपनी जोखिम सहने की क्षमता को समझना जरूरी होता है.
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