छत्तीसगढ़: लोक कला और पंडवानी गायन को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, AIIMS में ली अंतिम सांस

सुमी राजाप्पन

• 09:45 AM • 05 Jul 2026

देश की प्रतिष्ठित लोक गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रायपुर AIIMS में निधन हो गया. सामाजिक बंधनों को तोड़कर महाभारत की कथा (पंडवानी) को वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाली तीजन बाई के जाने से सांस्कृतिक जगत में एक युग का अंत हो गया.

पद्म विभूषण गायिका तीजन बाई ने लंबी बीमारी के बाद दुनिया को कहा अलविदा (Photo-ITG)
पद्म विभूषण गायिका तीजन बाई ने लंबी बीमारी के बाद दुनिया को कहा अलविदा (Photo-ITG)
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भारतीय लोक संस्कृति के एक स्वर्णिम अध्याय का आज अंत हो गया. देश की मशहूर पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं. लंबी बीमारी के बाद रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में उन्होंने आखिरी सांस ली. AIIMS रायपुर के पीआरओ ने उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि की है. उनके जाने से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है.

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तड़के बिगड़ी तबीयत, AIIMS में ली अंतिम सांस

जानकारी के मुताबिक, तीजन बाई पिछले कई हफ्तों से गंभीर रूप से बीमार थीं और रायपुर AIIMS में उनका इलाज चल रही था. आज तड़के करीब 3:15 बजे अचानक उनकी सेहत ज्यादा बिगड़ गई, जिसके बाद डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका.

सामाजिक बंधनों को तोड़कर 'तंबूरे' के दम पर जीती दुनिया

1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव गनियारी में जन्मी तीजन बाई का पूरा जीवन संघर्ष, साहस और कामयाबी की एक अनोखी दास्तान है. उन्होंने उस दौर में लोक कला 'पंडवानी' (महाभारत की पारंपरिक कथा गायन) को अपनाया, जब इस कला पर पूरी तरह पुरुषों का कब्जा माना जाता था.

खासकर पंडवानी की 'कापालिक शैली' में कदम रखने के लिए उन्हें भारी सामाजिक विरोध, रूढ़ियों और बंदिशों का सामना करना पड़ा. लेकिन तीजन बाई ने हार नहीं मानी. जब वह हाथ में अपना तंबूरा लेकर, कड़क आवाज और बेजोड़ अभिनय के साथ मंच पर उतरती थीं, तो सामने बैठी भीड़ मंत्रमुग्ध हो जाती थी.

पांच दशकों का सफर और देश-दुनिया में परचम

पिछले पांच दशकों से भी ज्यादा समय से तीजन बाई मंचों पर देश की मिट्टी की खुशबू बिखेर रही थीं. उन्होंने पंडवानी को सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एशिया से लेकर यूरोप तक, दुनिया के कोने-कोने में इस पारंपरिक विधा का डंका बजाया. उन्होंने तमाम शुरुआती विरोधों के बावजूद न सिर्फ इस लोक परंपरा को जिंदा रखा, बल्कि इसे एक नई पहचान देकर कलाकारों की कई पीढ़ियों को प्रेरित भी किया.

इन बड़े सम्मानों से नवाजी जा चुकी थीं तीजन बाई:

  • पद्म श्री (1987-88)
  • पद्म भूषण (2003)
  • पद्म विभूषण (2019)

संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

तीजन बाई का जाना लोक कला के एक युग का अंत है. महाभारत के पात्रों को अपनी आवाज से जीवंत कर देने वाली तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन कला की दुनिया में उनकी दमदार आवाज और उनका तंबूरा हमेशा गूंजता रहेगा.

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