आम आदमी पार्टी की मुश्किलें आने वाले दिनों में काफी बढ़ सकती हैं. पार्टी के राजनीतिक दर्जे और उसके शीर्ष नेताओं के चुनावी भविष्य को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है, जिसने देश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है. इस याचिका के सामने आने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या आम आदमी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाएगा और क्या मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा मनीष सिसोदिया अब कभी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. विस्तार से जानिए पूरी कहानी.
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चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के खिलाफ याचिका
दिल्ली हाईकोर्ट में यह जनहित याचिका सतीश कुमार अग्रवाल नाम के एक व्यक्ति द्वारा दाखिल की गई है. इस याचिका में केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और आम आदमी पार्टी को पक्षकार बनाया गया है. याचिकाकर्ता ने सीधे तौर पर मांग की है कि चुनाव आयोग जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29 ए(5) के उल्लंघन के आरोप में आम आदमी पार्टी का रजिस्ट्रेशन तुरंत प्रभाव से रद्द करें.
इसके साथ ही याचिका में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और पार्टी के वरिष्ठ नेता दुर्गेश पाठक को भविष्य में चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह अयोग्य घोषित करने की भी गुहार लगाई गई है.
अदालती कार्रवाई के बहिष्कार का आरोप
याचिकाकर्ता ने इस पीआईएल को दाखिल करने के पीछे दिल्ली आबकारी नीति (Liquor Scam) से जुड़े मामलों का हवाला दिया है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि आम आदमी पार्टी के इन नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने होने वाली अदालती कार्रवाई में शामिल होने से कथित तौर पर इनकार कर दिया था.
याचिका के मुताबिक, अदालत की कार्यवाही का इस तरह से बहिष्कार करना सीधे तौर पर देश की न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाना है. दलील दी गई है कि नेताओं का ऐसा आचरण भारतीय संविधान के प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा न रखने जैसा है.
न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक परंपरा की शुरुआत
इस जनहित याचिका में कई बेहद गंभीर और कड़े तर्क दिए गए हैं. याचिका में कहा गया है कि देश की न्यायिक प्रणाली किसी भी असंतुष्ट पक्ष को ऊपरी अदालतों में अपील करने का पूरा मौका देती है. इसके बावजूद कोई भी वादी सिर्फ इस आधार पर अदालती कार्रवाई का बहिष्कार नहीं कर सकता कि वह कोर्ट के फैसलों या आदेशों से खुश नहीं है. नेताओं का इस प्रकार का रवैया देश में एक बेहद खतरनाक और गलत परंपरा की शुरुआत कर सकता है, जिससे हमारी न्याय व्यवस्था पर आम जनता का भरोसा कमजोर होगा.
कोर्ट में हिस्सा लेना वैकल्पिक नहीं
याचिका में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि अदालत की कार्यवाही में हिस्सा लेना कोई ऑप्शनल या वैकल्पिक विषय नहीं है कि जब मन किया तो गए और जब मन नहीं किया तो नहीं गए. देश की न्याय प्रणाली का सम्मान हर परिस्थिति में होना चाहिए, चाहे किसी भी व्यक्ति का राजनीतिक पद या कद कितना भी बड़ा क्यों न हो.
दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल हुई इस याचिका ने निश्चित तौर पर आम आदमी पार्टी की राजनीतिक राह में एक नया रोड़ा अटका दिया है. अब यह देखना काफी अहम होगा कि आने वाले दिनों में दिल्ली हाईकोर्ट इस जनहित याचिका पर क्या रुख अपनाती है और आम आदमी पार्टी की तरफ से इस पर क्या कानूनी प्रतिक्रिया सामने आती है.
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