दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शराब नीति से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला लिया है. दोनों नेताओं ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत की कार्यवाही में हिस्सा न लेने का निर्णय किया है. केजरीवाल के वकील ने इसे 'सत्याग्रह' का नाम दिया है और स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी भी प्रकार की अदालत की अवमानना नहीं है, बल्कि अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग है.
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क्या है पूरा मामला?
दरअसल अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया सहित सात अन्य लोगों ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में एक 'रिक्यूज़ल एप्लीकेशन' (Recusal Application) दाखिल की थी. इस याचिका में मांग की गई थी कि जस्टिस स्वर्ण कांता इस मामले की सुनवाई न करें. हालांकि, 20 अप्रैल को अदालत ने इस अर्जी को खारिज कर दिया और अगली सुनवाई के लिए 29 तारीख तय कर दी.
अदालत में पेश न होने का फैसला क्यों?
केजरीवाल के वकील के अनुसार, याचिका में उन कारणों का विस्तार से जिक्र किया गया था कि आखिर क्यों केजरीवाल और सिसोदिया को इस अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है (Apprehension of not getting justice). जब अदालत ने उन दलीलों को सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी तो अब उसी अदालत के सामने फिर से अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता.
वकील ने दी 'सत्याग्रह' की दलील
वकील ने साफ किया कि यह फैसला कानूनी रूप से पूरी तरह सही है. उन्होंने कहा:
- हिस्सा न लेना अधिकार: यह आरोपी का अधिकार है कि वह कार्यवाही में शामिल होना चाहता है या नहीं। केजरीवाल और सिसोदिया ने तय किया है कि वे न तो खुद पेश होंगे और न ही अपने वकील को पेश करेंगे.
- कोई अवमानना नहीं: यह अदालत की अवमानना नहीं है. उन्होंने यह नहीं कहा कि अदालत सुनवाई न करे या फैसला न दे. वे बस इस प्रक्रिया से खुद को अलग (Abstain) कर रहे हैं.
- आगे का रास्ता: अगर अदालत एकतरफा आदेश पारित करती है, तो केजरीवाल और सिसोदिया के पास उस आदेश को ऊपरी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में चुनौती देने का विकल्प खुला रहेगा.
केजरीवाल के खेमे ने इसे शांतिपूर्ण 'सत्याग्रह' बताया है जहां वे अपनी बात रखने के बाद अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले पड़ाव का इंतज़ार करेंगे.
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