भारत निर्वाचन आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली को लेकर उठे सवाल अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए हैं. CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है. इसमें आरोप लगाया गया है कि आयोग के दूसरे चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कई अहम फैसले लिए गए. यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से दायर की गई है. याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर लिए गए ऐसे फैसलों को असंवैधानिक और अमान्य घोषित करने की मांग की है.
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चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा तरीके से फैसले लेने और वैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन करने के आरोप लगाए गए हैं. इसमें कहा गया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों पर दूसरे चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी. याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की लिखित आपत्तियों का भी हवाला दिया गया है. इनमें सॉफ्टवेयर में किए गए बदलाव और 'फॉर्म 6' से जुड़ी प्रक्रिया में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं. इसके अलावा चुनाव आयोग के आईटी डिवीजन की प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़े 28 जुलाई के आदेश को भी चुनौती दी गई है.
10 महीने में 14 बार लिखित आपत्ति का दावा
यह मामला इंडियन एक्सप्रेस की इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट के बाद सामने आया है, जिनमें चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों का दावा किया गया था. रिपोर्टों के मुताबिक, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों और निर्देशों को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी. इन आपत्तियों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, SIR से संबंधित फैसलों, अपीलों तथा मतदाता सूची के डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दों का जिक्र बताया गया था. हालांकि, इस पूरे विवाद पर चुनाव आयोग का पक्ष भी सामने आया है. ECI ने फैसलों को एकतरफा बताए जाने के दावे को खारिज किया है और कहा है कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे.
T.N. शेषन मामले का भी हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 1995 के T.N. शेषन बनाम भारत सरकार मामले का भी हवाला दिया गया है. इसमें दलील दी गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग में 'बराबरों में प्रथम' यानी primus inter pares की स्थिति रखते हैं.
याचिकाकर्ता का कहना है कि CEC को दूसरे चुनाव आयुक्तों के ऊपर ऐसा वीटो अधिकार या अंतिम फैसला लेने की सर्वोच्च शक्ति हासिल नहीं है. इसी आधार पर याचिका में आरोप लगाया गया है कि आयोग के दूसरे सदस्यों की राय को दरकिनार करके लिए गए फैसलों की न्यायिक जांच होनी चाहिए.
आपराधिक कार्रवाई और SIT की मांग
याचिका में केवल कथित फैसलों को चुनौती देने तक मामला सीमित नहीं है. इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्यों के कथित उल्लंघन को लेकर आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की मांग भी की गई है.
इसके साथ ही पूरे मामले की जांच के लिए एक स्वतंत्र SIT गठित करने का अनुरोध किया गया है. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया. हालांकि, इन सभी आरोपों पर अंतिम न्यायिक फैसला अभी नहीं हुआ है.
23 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी जुड़ा मामला
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है. 23 सितंबर 2026 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले में अलग-अलग राय दी.
दोनों जज इस बात पर सहमत नहीं थे कि 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बड़ी संविधान पीठ में सुनवाई होनी चाहिए या नहीं. दोनों की राय अलग होने के बाद मामले को आगे के फैसले के लिए मुख्य न्यायाधीश के सामने रखने को कहा गया.
अब इस मामले में बड़ी संविधान पीठ बनाई जाएगी या नहीं, इस पर फैसला होना है. यानी एक तरफ चुनाव आयोग के अंदर फैसले लेने के तरीके को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले कानून की वैधता का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा हुआ है.
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