Delhi Electricity Bill Hike: दिल्ली में महंगी होगी बिजली! जानिए 200 और 400 यूनिट फ्री वालों के बिल पर क्या पड़ेगा असर?

Delhi Electricity Bill Hike: दिल्ली में बिजली महंगी होने जा रही है. DERC ने PPAC बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद बिजली बिल पर असर को लेकर चर्चा तेज हो गई है. जानिए 200 यूनिट फ्री बिजली और 400 यूनिट तक सब्सिडी पाने वाले उपभोक्ताओं के बिल पर कितना असर पड़ेगा, किन इलाकों में सप्लाई करने वाली कंपनियों ने दरें बढ़ाईं और व्यापारियों ने क्यों जताई नाराजगी.

Delhi Electricity Bill Hike
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वैशाली

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दिल्ली वासियों के घरों के बिजली बिल को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है. दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (DERC) ने पावर परचेसिंग एडजस्टमेंट कॉस्ट (PPAC) में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. इस फैसले के बाद हर तरफ चर्चा शुरू हो गई है कि अब दिल्ली में बिजली का बिल जनता को तगड़ा झटका देने वाला है. इस बीच दिल्ली सरकार के ऊर्जा मंत्री आशीष सूद का एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने साफ किया है कि आम उपभोक्ताओं और खास तौर पर मुफ्त बिजली का लाभ ले रहे लोगों पर इस फैसले का क्या असर पड़ेगा. वहीं दूसरी तरफ, दिल्ली के व्यापारियों ने इस बढ़ोतरी को लेकर अपनी कड़ी नाराजगी जताई है.

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आखिर क्यों बढ़ानी पड़ी बिजली खरीद की लागत?

ऊर्जा मंत्री आशीष सूद के मुताबिक, पश्चिम एशिया में चल रहे संकट और अन्य अंतरराष्ट्रीय कारणों की वजह से ईंधन की कीमतों में वैश्विक स्तर पर भारी वृद्धि हुई है. इस अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण बिजली कंपनियों के लिए बिजली खरीद की लागत लगभग 31% तक बढ़ गई है. इसी बढ़ी हुई लागत को एडजस्ट करने के लिए कंपनियों ने पीपीएसी (PPAC) बढ़ाने की मांग की थी. डीईआरसी (DERC) के नए आदेशों के मुताबिक, पीपीएसी की सीमा जो पहले 31 मार्च तक 14.5% थी, उसे अब बढ़ाकर 17.5% कर दिया गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि पीपीएसी में औसतन लगभग 2.5% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

किस बिजली कंपनी ने कितनी बढ़ाई दरें?

दिल्ली में अलग-अलग क्षेत्रों में बिजली सप्लाई करने वाली कंपनियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा भार दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली पर पड़ने वाला है, जहां बीआरपीएल (BRPL) बिजली सप्लाई करती है. बीआरपीएल क्षेत्र में बिजली खरीद की लागत 31% तक बढ़ी है और डीईआरसी ने यहां पीपीएसी को 17.94% करने की अनुमति दी है. दूसरी कंपनी बीवाईपीएल (BYPL - यमुना पावर लिमिटेड) के क्षेत्र में बिजली खरीद की लागत 35% बढ़ी है, जिसके लिए डीईआरसी ने पीपीएसी को 17.43% करने की मंजूरी दी है. इसके अलावा, टाटा पावर लिमिटेड (Tata Power) के क्षेत्र में बिजली खरीद की लागत 16% बढ़ी है और डीईआरसी ने इसे 16% करने की ही अनुमति दी है, जबकि वर्तमान में यहां यह लिमिट 14.5% है.

मुफ्त और सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर?

आम जनता को सबसे ज्यादा परेशान करने वाले इस सवाल पर ऊर्जा मंत्री ने साफ किया है कि कुछ लोग इस विषय पर सिर्फ भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि सरकार उपभोक्ता हितों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. सरकार के मुताबिक, जो उपभोक्ता दिल्ली सरकार की बिजली सब्सिडी यानी 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली योजना का लाभ ले रहे हैं, उनका बिल पहले की तरह शून्य ही रहेगा और उन पर इस बढ़ोतरी का कोई असर नहीं पड़ेगा. 

वहीं, महीने में 400 यूनिट तक बिजली की खपत करने वाले उपभोक्ताओं को सरकार की तरफ से ₹850 तक की सब्सिडी मिलती है, इसलिए उन पर भी इस बढ़ोतरी का कोई खास असर देखने को नहीं मिलेगा. हालांकि, 200 यूनिट से ज्यादा बिजली इस्तेमाल करने वालों के लिए पीपीएसी शुल्क लगभग 3% बढ़ाया गया है, लेकिन कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस लागत की वसूली चरणबद्ध तरीके से करें ताकि उपभोक्ताओं को एक साथ बड़ा झटका न लगे.

व्यापारियों और उद्यमियों में भारी नाराजगी

घरेलू उपभोक्ताओं को भले ही इस फैसले से थोड़ी राहत मिली हो, लेकिन दिल्ली के व्यापारियों और उद्यमियों में इस बढ़ोतरी को लेकर भारी आक्रोश है. दिल्ली के प्रमुख व्यापारिक संगठन चेंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) का कहना है कि बिजली महंगी होने से दुकानदारों और फैक्ट्री मालिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा. सीटीआई के चेयरमैन बृजेश गोयल ने इस बढ़ोतरी को तुरंत रोकने के लिए सीधे मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को एक चिट्ठी भेजी है और इस मामले में उनसे तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है.

सरकार ने दी सफाई, कहा- बड़े झटके से बचाया

व्यापारियों के विरोध के बीच सरकार का तर्क है कि दिल्ली में आखिरी बार टेरिफ ऑर्डर 30 सितंबर 2021 को पास हुआ था. यह पीपीएसी बढ़ोतरी पिछले 5 सालों में ग्लोबल मार्केट के दबाव के कारण ईंधन और बिजली खरीद की बढ़ी हुई वास्तविक लागत को दर्शाती है. सरकार ने दावा किया है कि उन्होंने कड़े कदम उठाकर उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले कुल असर को सिर्फ 2.4% से 2.5% तक ही सीमित रखा है, अन्यथा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण उपभोक्ताओं पर सीधे 31% तक का भारी आर्थिक बोझ पड़ सकता था. कुल मिलाकर साफ है कि अगर आपकी मासिक खपत 200 या 400 यूनिट तक है तो घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन कमर्शियल और भारी इस्तेमाल करने वाले घरेलू उपभोक्ताओं की जेब पर इसका असर जरूर पड़ेगा.

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