दिल्ली में पिछले कई सालों से बिजली की दरों में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है, लेकिन अब दिल्ली वासियों की जेब पर बोझ बढ़ने की पूरी संभावना नजर आ रही है. बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) के भारी-भरकम बकाये को लेकर आए एक ताजा अदालती फैसले ने दिल्ली सरकार और दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
ADVERTISEMENT
क्यों बढ़ सकते हैं बिजली के दाम?
दरअसल, टाटा पावर, बीएसईएस राजधानी और बीएसईएस यमुना जैसी बिजली वितरण कंपनियों का दिल्ली सरकार पर करीब ₹30,000 करोड़ का बकाया है. पिछले साल अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि सभी राज्य सरकारों को डिस्कॉम्स का यह बकाया 2028 से 2031 तक चुकाना होगा.
इसी मामले में डीईआरसी (DERC) ने 'एप्टेल' (APTEL - एप्लेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी) के सामने याचिका दायर कर और मोहलत मांगी थी. साथ ही डिस्कॉम्स के खातों का सीएजी (CAG) ऑडिट कराने की भी मांग की थी. लेकिन 20 अप्रैल को एप्टेल ने डीईआरसी की इस अपील को खारिज कर दिया है.
तीन हफ्ते में देना होगा जवाब
एप्टेल द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद अब डीईआरसी को अगले तीन हफ्तों के भीतर यह बताना होगा कि वितरण कंपनियों का यह ₹30,000 करोड़ का बकाया कैसे और कब तक चुकाया जाएगा. विशेषज्ञों और डिस्कॉम्स के वकीलों का मानना है कि अब बिजली की दरें बढ़ाने के अलावा सरकार के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है.
आर्टिफिशियली कम दरों का असर
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई सालों से सरकार ने बिजली की दरों को कृत्रिम रूप से कम रखा था. सरकार कंपनियों से कहती थी कि वे लागत का पूरा पैसा उपभोक्ताओं से न लें और इसे बाद में सेटल किया जाएगा. अब यही 'बाद' की राशि बढ़कर ₹30,000 करोड़ हो गई है. दिल्ली के अलावा राजस्थान, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों ने भी बकाया चुकाने के लिए बिजली की दरें बढ़ा दी हैं.
आगे क्या होगा?
सूत्रों के मुताबिक, डीईआरसी इस फैसले के खिलाफ एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की समयसीमा और एप्टेल के कड़े रुख को देखते हुए दिल्ली में बिजली महंगी होना लगभग तय माना जा रहा है. अब देखना यह होगा कि डीईआरसी अगले 3-4 हफ्तों में क्या कदम उठाती है.
ADVERTISEMENT


