राजधानी दिल्ली का पालम इलाका और वहां की साधनगर की वो तंग गलियां, जहां कल तक बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, आज वहां सन्नाटा और सिर्फ चीखें हैं. एक रिहायशी इमारत में लगी भीषण आग ने देखते ही देखते 9 जिंदगियों को लील लिया. लेकिन इस खौफनाक मंजर के बीच एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाए. यह कहानी है कश्यप परिवार की 70 साल की लाडो और उनकी जांबाज बेटी हिमांशी की.
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भाग सकती थी हिमांशी, पर मां को कैसे छोड़ती?
हादसे के वक्त दूसरी मंजिल पर मौजूद हिमांशी के पास अपनी जान बचाने का पूरा मौका था. वह जवान थी, भाग सकती थी और शायद छत पर जाकर खुद को सुरक्षित कर लेती. लेकिन कमरे के दूसरे कोने में उसकी बूढ़ी मां लाडो कश्यप फंसी थीं, जिनका शरीर उम्र के इस पड़ाव पर साथ नहीं दे रहा था. पड़ोसियों का कहना है कि लाडो जी वैसे भी घर से कम ही बाहर निकलती थीं. ऐसे में एक बेटी अपनी मां को धधकती लपटों के बीच तड़पने के लिए अकेला कैसे छोड़ देती? हिमांशी ने भागने के बजाय अपनी मां का हाथ थामना बेहतर समझा.
बाथरूम बना 'मौत का जाल'
जब आग की तपन और काला धुआं फेफड़ों को जलाने लगा, तो बचने की आखिरी उम्मीद में दोनों मां-बेटी बाथरूम की तरफ भागीं. उन्हें लगा होगा कि पानी और कंक्रीट की दीवारें मौत को रोक लेंगी. पर उन्हें क्या पता था कि घर में रखा प्लास्टिक और कॉस्मेटिक का सामान जहरीली गैस उगल रहा है. जब दमकलकर्मी अंदर पहुंचे, तो दोनों के शव एक-दूसरे से सटे हुए मिले. मानो मरते दम तक बेटी ने अपनी मां का साथ नहीं छोड़ा.
'धूं-धूं' जलता घर और बेबस रिश्तेदार
लाडो की बहन बाला, जो पास के ही गांव में रहती हैं, खबर मिलते ही बदहवास होकर पालम पहुंची थीं. अपनी आंखों के सामने बहन के घर को राख होते देख उनकी रूह कांप गई. उन्हें तब तक अंदाजा नहीं था कि उनकी बहन और भांजी अब इस दुनिया में नहीं रहे. कश्यप परिवार की खुशियां एक झटके में मातम में बदल गईं.
सिस्टम की नाकामी या किस्मत का खेल?
इस हादसे ने प्रशासन की पोल भी खोल कर रख दी है. सवाल उठ रहे हैं कि संकरी गलियों में लटकते बिजली के तार और फायर ब्रिगेड के हाइड्रोलिक सिस्टम की नाकामी का खामियाजा आम आदमी कब तक भुगतेगा? पालम की वह इमारत आज सिर्फ एक काला खंडहर है, जिसकी दीवारों पर जमी कालिख हमारे सिस्टम की सुस्ती और उन 9 बेगुनाहों की बेबसी की गवाही दे रही है.
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