दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ (DUSU) के चुनावी नतीजों ने इस बार सबको हैरान कर दिया है. डीयू की छात्र राजनीति में सालों से दबदबा रखने वाले बीजेपी के छात्र संगठन ABVP और कांग्रेस की स्टूडेंट विंग NSUI को पछाड़कर एक निर्दलीय प्रत्याशी ने इतिहास रच दिया है. शहीद भगत सिंह कॉलेज (इवनिंग) से 'बुद्धिस्ट स्टडीज' में पीजी कर रहे दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष (वाइस प्रेसिडेंट) पद का चुनाव जीतकर हर किसी को चौंका दिया है. डीयू के 72 साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब उपाध्यक्ष पद पर कोई निर्दलीय उम्मीदवार जीता हो.
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चुनावी नतीजों की बात करें तो दीपांशु शौकीन को कुल 30,615 वोट मिले हैं. उन्होंने अपने नजदीकी प्रतिद्वंद्वी ABVP के ईशू मौर्य (16,910 वोट) को 13,705 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया है. वहीं NSUI के प्रत्याशी वीर चतरथ को सिर्फ 4,313 वोट ही मिले हैं.
4 साल पुराना बयान हुआ सच
दीपांशु का साल 2022 का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह कॉलेज की फ्रेशर्स पार्टी के दौरान 'आज अकेला चल रहा हूं, एक दिन पीछे काफिला होगा' कहते दिख रहे हैं. लेकिन किसे पता था 4 साल पहले कही यह बात सच साबित हो जाएगी. लेकिन लगातार मेहनत से 2026 में दीपांशु ने इस बात को सच साबित कर दिखा दिया.
दीपांशु की जीत की 4 बड़ी वजहें!
1. चार साल की कड़ी मेहनत के बाद टिकट कटा
दीपांशु कॉलेज की शुरुआत से ही हर एक्टिविटी और खेलकूद में आगे रहते थे. वह NSUI से जुड़े और 2023 व 2024 के DUSU चुनावों में साथी उम्मीदवारों के लिए दिन-रात प्रचार किया. इससे आम छात्रों के बीच उनकी अपनी पहचान बन गई. 2025 और फिर 2026 में उन्होंने NSUI से टिकट मांगा, लेकिन संगठन ने उम्र और पैसों की कमी जैसी बातें कहकर उन्हें टिकट देने से मना कर दिया. जब अपनी ही पार्टी से बार-बार निराशा मिली तो दीपांशु ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. उनके मैदान में उतरते ही NSUI के कई पुराने साथी और आम छात्र भी उनके समर्थन में आ खड़े हुए.
2. आम छात्र वाली छवि का फायदा
दिल्ली के पीरागढ़ी में रहने वाले दीपांशु का परिवार बेहद साधारण है. उनके पिता दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (DTC) में बस कंडक्टर हैं और मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं. न कोई बड़ा राजनीतिक बैकग्राउंड और न ही पैसों का दम. इसी सादगी ने उन्हें आम छात्रों का चहेता बना दिया. दीपांशु ने प्रचार के दौरान कहा कि बड़ी-बड़ी गाड़ियों से घूमने वाले छात्र नेता कभी बस, मेट्रो और ई-रिक्शा से आने-जाने वाले छात्रों का दर्द नहीं समझ सकते.
3. 'सत्याग्रह' और नंगे पैर प्रचार करने का फैसला
चुनाव प्रचार के बीच 6 सितंबर को सत्य निकेतन इलाके में एक हॉस्टल की इमारत गिर गई थी, जिसमें सात लोगों की जान चली गई. इस हादसे के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए दीपांशु ने 12 सितंबर से 'सत्याग्रह' की शुरुआत की. उन्होंने कसम खाई कि जब तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिल जाता, वे जूते या चप्पल नहीं पहनेंगे. पैरों में छाले पड़े, दर्द हुआ और पट्टियां भी बंधीं, लेकिन उन्होंने पूरे चुनाव में नंगे पैर ही घूम-घूमकर प्रचार किया. जीत के बाद भी उन्होंने साफ किया है कि वे वाइस चांसलर दफ्तर के बाहर धरने पर बैठकर पीड़ितों के लिए आवाज उठाते रहेंगे.
4. लोकल जुड़ाव और सोशल मीडिया का साथ
दीपांशु की जीत के साथ दिल्ली के स्थानीय छात्रों का फैक्टर भी चर्चा में आया है. DUSU के चार प्रमुख पदों में से तीन पर दिल्ली से जुड़े छात्र जीते हैं. अध्यक्ष पद पर कंझावला के यश डबास और सचिव पद पर बदरपुर की रिया चावड़ी ने जीत दर्ज की. दीपांशु भी दिल्ली के रहने वाले हैं.
दीपांशु जाट समाज से आते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में जाट छात्रों की मौजूदगी और प्रभाव की चर्चा लंबे समय से होती रही है. इसके अलावा राजस्थान के निर्दलीय विधायक रविंद्र भाटी का समर्थन और हरियाणा के इंफ्लुएंसर ने भी उनका साथ दिया.
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