ADVERTISEMENT
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए CJP प्रोटेस्ट के बीच मोहम्मद इरफान की कहानी चर्चा में आ गई है. इरफान किसी छात्र संगठन या राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं. वह दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं और ठेला लगाकर अपना गुजारा करते हैं. हमारे सहयोगी चैनल द लल्लनटॉप ने इरफान से बातचीत की है.जो अब खूब वायरल है. आज हम आपको इरफान की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं.
बिना स्कूल गए गूगल बना ज्ञान का जरिया
इरफान बताते हैं कि वे कभी स्कूल की चौखट तक नहीं पहुंचे और न ही उन्हें लिखना-पढ़ना आता है. हालांकि, तकनीक ने उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया है. वे अपने स्मार्टफोन में गूगल वॉइस सर्च के जरिए सवाल पूछते हैं और देश-दुनिया, इतिहास तथा साहित्य से जुड़ी जानकारियां हासिल करते हैं. भगत सिंह के विचारों से प्रभावित इरफान, दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की कविताएं सुनते हैं. वे कहते हैं कि जब भी उन्हें किसी जानकारी पर संदेह होता है, वे गूगल से दोबारा वेरिफाई करते हैं. इसी स्वाध्याय के दम पर वे समसामयिक मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं.
"500 रुपये की दिहाड़ी पर भी देते हैं GST"
जंतर-मंतर पर चल रहे छात्रों के आंदोलन में शामिल होने पहुंचे इरफान का कहना है कि वे किसी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं जुड़े हैं. वे यहां केवल मजदूरों और वंचित वर्ग की आवाज बुलंद करने आए हैं.
इरफान के मुताबिक, जब एक गरीब मजदूर 500 रुपये की दिहाड़ी कमाता है और बाजार से तेल या नमक खरीदता है, तो वह भी GST चुकाता है. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि मजदूर किसी के टैक्स के पैसे पर पल रहे हैं, बल्कि वे भी इस देश के निर्माण में बराबर के कार्यदाता हैं.
न्यूनतम मजदूरी और 12-12 घंटे के काम पर सवाल
इरफान ने दिल्ली में तय न्यूनतम मजदूरी के जमीनी अमल पर गंभीर सवाल उठाए. उनका कहना है कि सरकारी कागजों में दिल्ली में मजदूरों की दर भले 18 हजार रुपये तय हो, लेकिन ठेकेदार और कंपनियां 10 से 11 घंटे काम करवाकर केवल 13 या 14 हजार रुपये ही देती हैं. बेरोजगारी का फायदा उठाकर मजदूरों का शोषण किया जाता है. यदि कोई आवाज उठाता है तो उसे काम से निकाल देने की धमकी दी जाती है. उन्होंने मांग की कि सरकार को केवल बड़े कारोबारियों को रियायत देने के बजाय मजदूरों को उनकी मेहनत का वाजिब हक दिलाने के सख्त नियम लागू करने चाहिए.
स्वास्थ्य व्यवस्था और मानसिक तनाव का सच
अपनी निजी जिंदगी के संघर्षों पर बात करते हुए इरफान ने बताया कि लगातार आर्थिक तंगी और अनिश्चितता के कारण वे बीते दो सालों से मानसिक तनाव और डिप्रेशन का सामना कर रहे हैं. सरकारी अस्पतालों और आयुष्मान भारत योजना पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि कागजी योजनाओं और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर है. आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद अस्पतालों में कागजी प्रक्रियाओं और मंजूरियों का ऐसा जाल होता है कि आपातकाल में गरीब मरीज दर-दर भटकने को मजबूर हो जाता है.
अहिंसा और गांधीवादी विचारों में भरोसा
इरफान का मानना है कि वे किसी भी तरह की हिंसा या उपद्रव के सख्त खिलाफ हैं. वे महात्मा गांधी के बताए अहिंसा के मार्ग पर चलकर अपनी बात रखना पसंद करते हैं. उनका कहना है कि वे भविष्य में न तो कोई नेता बनना चाहते हैं और न ही किसी चुनावी राजनीति का हिस्सा बनना चाहते हैं. उनका एकमात्र मकसद यह है कि देश के शीर्ष पदों पर बैठे लोग देश की तरक्की के दावों के साथ-साथ झुग्गियों और ग्रामीण इलाकों में रह रहे मजदूरों की बदहाली पर भी ध्यान दें.
ADVERTISEMENT


