दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और सीबीआई के बीच चल रही कानूनी जंग में नया मोड़ आ गया है. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में गुरुवार को हुई संक्षिप्त सुनवाई में केजरीवाल के उस हलफनामे को रिकॉर्ड पर ले लिया गया है, जिसमें उन्होंने 'हितों के टकराव' का मुद्दा उठाया था. विस्तार से जानिए कोर्ट रूम के अंदर क्या-कुछ हुआ.
ADVERTISEMENT
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई तीखी बहस
आज की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने पेश हुए. केजरीवाल ने कोर्ट से आग्रह किया कि उनके द्वारा दाखिल किए गए नए हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया जाए. इस हलफनामे में जस्टिस शर्मा के परिवार के सदस्यों पर आरोप लगाते हुए मामले की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं.
तुषार मेहता की दलील और कोर्ट का रुख
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सीबीआई इस पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना चाहती है. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इसे स्वीकार करते हुए सीबीआई को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जवाब दाखिल करने की अनुमति दे दी. साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि जवाब की एक प्रति अरविंद केजरीवाल को भी दी जाए.
'मैं इस मामले को दोबारा नहीं खोलूंगी' - जस्टिस शर्मा
लगभग 5 मिनट तक चली इस सुनवाई में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि फैसला पहले ही सुरक्षित रखा जा चुका है. उन्होंने कहा, 'हम इस हलफनामे को रिकॉर्ड पर ले रहे हैं, लेकिन इस पर अब कोई नई बहस नहीं होगी. मैं इस मामले को अब दोबारा नहीं खोलूंगी.' इसका मतलब है कि कोर्ट अब सीधे अपना फैसला सुनाएगी.
क्या है केजरीवाल का 'हलफनामा दांव'?
अरविंद केजरीवाल ने इस हलफनामे के जरिए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के बेटे और बेटी पर गंभीर आरोप लगाए हैं. केजरीवाल का तर्क है कि इन संबंधों की वजह से 'हितों का टकराव' पैदा होता है, इसलिए जस्टिस शर्मा को इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस हलफनामे के बाद जस्टिस शर्मा खुद को केस से अलग करती हैं या फिर केजरीवाल की अर्जी को खारिज कर देती हैं.
सीबीआई आज शाम तक अपना जवाब दाखिल करेगी, जिसके बाद केजरीवाल की ओर से भी प्रति-उत्तर दिया जा सकता है. दिल्ली की सियासत और कानूनी गलियारों में इस फैसले का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है.
ADVERTISEMENT


