जून 2026 का अंत आते-आते दिल्ली से लेकर पंजाब तक की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ा सस्पेंस बना हुआ है. देश के सियासी गलियारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में होने वाले एक बड़े फेरबदल की सुगबुगाहट तेज है. सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 27 से 29 जून तक होने वाली सेशेल्स(Seychelles) यात्रा के तुरंत बाद, यानी जुलाई के पहले हफ्ते में इस कैबिनेट विस्तार पर अंतिम मोहर लग जाएगी.
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लेकिन इस पूरे फेरबदल का असली ट्विस्ट पंजाब के कोटे से आने वाली उस एक सीट पर फंसा है, जिसके लिए आम आदमी पार्टी (AAP) से पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में आए दो दिग्गजों के बीच कांटे की टक्कर चल रही है. एक तरफ राजनीति का तेजतर्रार युवा चेहरा राघव चड्ढा हैं, तो दूसरी तरफ देश के बड़े शिक्षाविद अशोक मित्तल हैं. दिलचस्प बात यह है कि जिसे राघव खुद उंगली पकड़कर बीजेपी में लाए थे, आज वही उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन चुके हैं. विस्तार से समझिए पूरी कहानी.
अप्रैल 2026 में आया था 'आप' में भूचाल
इस दिलचस्प मुकाबले को समझने के लिए थोड़ा फ्लैशबैक में जाना होगा. अप्रैल 2026 की शुरुआत में आम आदमी पार्टी के अंदर एक बड़ा भूचाल आया था. 2 अप्रैल 2026 को अरविंद केजरीवाल ने अचानक राघव चड्ढा को राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के डिप्टी लीडर पद से हटा दिया था और यह जिम्मेदारी लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के संस्थापक अशोक मित्तल को सौंप दी थी. पार्टी की यह अंदरूनी कलह यहीं नहीं रुकी. इसके बाद 24 अप्रैल को राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के 10 में से सात राज्यसभा सांसदों ने सीधे बगावत कर दी और दलबदल कानून के तहत बीजेपी में विलय कर लिया. मजेदार बात यह रही कि राघव चड्ढा ने जिस अशोक मित्तल को अपने खिलाफ खड़ा पाया था, वह उन्हें भी अपने साथ बीजेपी में ले आए थे.
राघव चड्ढा और अशोक मित्तल के बीच फंसा पेंच
जो राघव चड्ढा सात सांसदों को तोड़ने के मुख्य सूत्रधार थे, उन्हें पूरा भरोसा था कि आम आदमी पार्टी वाले कोटे से मंत्री पद के इकलौते दावेदार वही हैं. लेकिन अब उन्हें अपने ही साथी अशोक मित्तल से कड़ी चुनौती मिल रही है. बीजेपी आलाकमान इस वक्त भारी कशमकश में है क्योंकि दोनों ही नेताओं का पलड़ा अपनी-अपनी जगह भारी है. राघव चड्ढा के पक्ष की बात करें तो वे एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं, टीवी डिबेट्स में बेहद आक्रामक हैं और युवाओं व शहरी वोटर्स के बीच उनकी गजब की अपील है. बीजेपी उन्हें प्रमोट करके आम आदमी पार्टी के यूथ वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है. उन्हें वित्तीय या कॉरपोरेट जैसे मंत्रालयों में राज्य मंत्री बनाया जा सकता है.
दूसरी तरफ, अशोक मित्तल की बात करें तो वे एक शांत लेकिन बेहद रसूखदार नाम हैं. हाल ही में उनके ठिकानों पर ईडी (ED) की छापेमारी के बाद उनका पाला बदलना काफी सुर्खियों में रहा था. एलपीयू के जरिए उनका नेटवर्क पूरे देश में फैला है, जिससे बीजेपी पंजाब के एलीट और व्यापारिक वर्ग को साध सकती है. यही वजह है कि जिसे राघव चड्ढा खुद बीजेपी में लेकर आए थे, आज वही अशोक मित्तल उनके मंत्री बनने की राह में आड़े आ रहे हैं और राघव चड्ढा को अभी तक आलाकमान से कोई ठोस क्लेरिटी नहीं मिल पाई है.
बीजेपी का पंजाब को लेकर क्या है गेम प्लान?
आखिर बीजेपी पाला बदलने वाले इन नेताओं पर इतनी मेहरबान क्यों है, इसके पीछे पंजाब में पार्टी का एक बड़ा गेम प्लान छिपा है. बीजेपी राज्यसभा में मिले सात सांसदों के संख्या बल से तो मजबूत हुई ही है, साथ ही वह साल 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए अभी से एक मजबूत बेस तैयार कर रही है.
बीजेपी इस कैबिनेट फेरबदल के जरिए पूरे देश को यह 'रिवॉर्ड संदेश' भी देना चाहती है कि जो भी नेता विपक्ष को छोड़कर बीजेपी के विजन से जुड़ेगा, उसे उचित सम्मान और बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी. फिलहाल दिल्ली के सियासी गलियारों में यह सिक्का अभी हवा में ही है, लेकिन देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जुलाई के पहले हफ्ते में जब लिस्ट सामने आएगी तो लॉटरी राघव चड्ढा के आक्रामक युवा नेतृत्व की लगती है या अशोक मित्तल के प्रशासनिक और शैक्षणिक अनुभव की.
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