आम आदमी पार्टी (AAP) और उसके स्टार सांसद राघव चड्ढा के बीच चल रही अनबन अब खुलकर सामने आ गई है. पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को एक बेहद चौंकाने वाली चिट्ठी लिखी है, जिसमें कहा गया है कि राघव चड्ढा को बोलने के लिए पार्टी के कोटे से समय न दिया जाए. इस कदम के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या राघव चड्ढा अब सदन में सिर्फ एक मूकदर्शक बनकर रह जाएंगे? हालांकि, संसदीय नियमों के मुताबिक राघव चड्ढा को खामोश करना इतना आसान नहीं है. उनके पास अब भी चार ऐसे रास्ते हैं जिनसे वह अपनी बात सदन के पटल पर रख सकते हैं.
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1. सभापति का विवेकाधिकार (Chairman's Discretion)
संसदीय प्रक्रिया के अनुसार, पार्टी की चिट्ठी के बावजूद राज्यसभा के सभापति के पास यह अधिकार होता है कि वह किसी भी सांसद को बोलने की अनुमति दें. यदि सभापति चाहें, तो पार्टी के आग्रह को दरकिनार कर राघव चड्ढा को सदन में बोलने का मौका दे सकते हैं. सचिवालय या सभापति किसी सांसद का बोलने का मौलिक हक पूरी तरह नहीं छीन सकते.
2. शून्य काल (Zero Hour)
संसद के सत्र के दौरान 'शून्य काल' वह समय होता है जब कोई भी सांसद लोक महत्व के जरूरी मुद्दे उठा सकता है. इसके लिए उन्हें सभापति की अनुमति लेनी होती है और इसमें पार्टी के कोटे या समय की बंदिशें लागू नहीं होतीं. राघव चड्ढा इस विकल्प का इस्तेमाल कर जनता की आवाज उठा सकते हैं.
3. स्पेशल मेंशन (Special Mention)
राघव चड्ढा 'स्पेशल मेंशन' के जरिए भी अपनी बात रख सकते हैं. इसके तहत सांसद लिखित या मौखिक रूप से अपने मुद्दे सदन के सामने रखते हैं. इसके लिए सांसद को सीधे सचिवालय को नोटिस देना होता है, जिसमें पार्टी की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होती.
4. निर्दलीय या अनअटैच सदस्य (Unattached Member)
भविष्य में यदि पार्टी उन्हें निष्कासित कर देती है, तब भी सदन के नियमों के अनुसार 'चेयर' (सभापति) उन्हें बोलने का समय आवंटित करेगा. ऐसी स्थिति में उन्हें एक 'अनअटैच' या निर्दलीय सदस्य के तौर पर समय दिया जाता है. यानी निष्कासन के बाद भी उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकेगा.
दरार हुई जगजाहिर
आम आदमी पार्टी के इस कदम ने यह साफ कर दिया है कि राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच गहरी खाई पैदा हो चुकी है. तकनीकी तौर पर राघव चड्ढा को खामोश करना मुश्किल है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह 'आप' के भीतर मची कलह का सबसे बड़ा संकेत है. अब देखना यह होगा कि क्या राघव चड्ढा इन विकल्पों का इस्तेमाल कर बागी रुख अपनाएंगे या फिर पार्टी के साथ कोई बीच का रास्ता निकलेगा.
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