Saket Building Collapse: साकेत में भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इमारत ढही, 6 मासूमों की मौत का असली जिम्मेदार कौन?

Saket Accident News: दिल्ली के साकेत में अवैध निर्माण के चलते बहुमंजिला इमारत ढहने से 6 लोगों की मौत हो गई. हादसे के बाद MCD, प्रशासन और अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. जानिए इमारत गिरने से पहले क्या हुआ, अवैध निर्माण को लेकर क्या शिकायतें थीं, कोर्ट में दिए गए कथित हलफनामे पर क्यों विवाद है और आखिर इस दर्दनाक हादसे का जिम्मेदार कौन है.

Saket Building Collapse
Saket Building Collapse

दिनेश यादव

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राजधानी दिल्ली के साकेत इलाके में अवैध निर्माण के चलते एक बड़ा हादसा हो गया, जहां एक बहुमंजिला इमारत भरभराकर जमींदोज हो गई. इस दर्दनाक हादसे में अब तक 6 लोगों की मौत हो चुकी है. इस घटना ने एक बार फिर दिल्ली के सिस्टम और प्रशासनिक दावों की पोल खोलकर रख दी है. जान गंवाने वाले 6 लोगों में से 5 ऐसे छात्र थे, जो इस देश का भविष्य थे और आगे चलकर डॉक्टर या इंजीनियर बनते. ये छात्र इमारत में चल रहे एक मेस में खाना खाने गए थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि चंद पैसों की लालच में खड़ी की गई यह अवैध इमारत उनकी जान ले लेगी. इस घटना को महज एक हादसा नहीं, बल्कि एक संस्थागत हत्या कहा जा रहा है, क्योंकि यह पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही और मिलीभगत का नतीजा है.

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हादसे से पहले झुक गई थी इमारत, वीडियो आया सामने

इस दर्दनाक हादसे का एक लाइव वीडियो भी अब सोशल मीडिया पर सामने आया है. इस वीडियो में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि गिरने से ठीक पहले यह इमारत एक तरफ झुकी हुई थी यानी पूरी तरह से टेपर हो चुकी थी. इस इमारत के झुकने की सबसे बड़ी वजह इस पर धड़ल्ले से चल रहा अवैध कंस्ट्रक्शन था. पैसे कमाने की लालच में बिना किसी नक्शे और बिना किसी परमिशन के इस इमारत पर अतिरिक्त फ्लोर्स बनाए जा रहे थे. अवैध निर्माण के इस भारी-भरकम बोझ को पुरानी इमारत सहन नहीं कर पाई, जिससे वह असंतुलित होकर झुक गई और आखिरकार भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी यह इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई.

प्रशासन के सामने उठ रहे हैं ये 4 बड़े सवाल

इस हादसे के बाद अब सिस्टम की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिनका जवाब देने से हर कोई बच रहा है. पहला सवाल यह है कि इस पॉश इलाके में खुलेआम अवैध निर्माण कैसे और किसकी शह पर हो रहा था? दूसरा सवाल, जब स्थानीय निवासियों ने समय रहते इस खतरनाक होते निर्माण की शिकायत MCD और दिल्ली पुलिस से की थी, तो उस पर तुरंत एक्शन क्यों नहीं लिया गया? तीसरा सवाल यह खड़ा होता है कि जिस एमसीडी पर अवैध निर्माण को रोकने की जिम्मेदारी होती है, क्या उसके अफसरों को आंखों के सामने बन रही चौथी और पांचवीं मंजिल दिखाई नहीं दे रही थी? और चौथा सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अधिकारी किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे थे या फिर मोटी साठगांठ के कारण जानबूझकर कार्रवाई करने से बच रहे थे?

2015 से चल रहा था फाइलों का खेल, कोर्ट में दिया झूठा हलफनामा

इस पूरी इमारत का इतिहास गवाही देता है कि अफसरशाही किस कदर इस भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी. साल 2015 में ही एमसीडी ने इस 700 वर्ग मीटर की अवैध इमारत को बुक किया था, लेकिन कोई जमीनी कार्रवाई नहीं हुई. इसके बाद साल 2021 में हाईकोर्ट के निर्देशों पर एमसीडी ने इस निर्माण को अनाधिकृत मानते हुए इसे गिराने का फैसला किया था. 

हैरानी की बात यह है कि साल 2021 से लेकर 2026 तक इस तीन मंजिला इमारत को गिराने के बजाय इसे किराए पर दे दिया गया, जहां लोग रहने लगे. हद तो तब हो गई जब मार्च 2026 में स्थानीय लोगों की शिकायत पर पुलिस ने एमसीडी को रिपोर्ट भेजी कि इमारत में चौथी और पांचवीं मंजिल का अवैध निर्माण चल रहा है और यह बेहद खतरनाक स्थिति में है, लेकिन एमसीडी ने कोर्ट में उल्टा झूठा हलफनामा दे दिया कि वहां कोई इललीगल कंस्ट्रक्शन नहीं हो रहा है.

कार्रवाई के नाम पर सिर्फ सस्पेंशन का खेल

हादसा होने और 6 मासूमों की जान जाने के बाद अब हमेशा की तरह प्रशासन जागने का नाटक कर रहा है. मामले को शांत करने के लिए दो जूनियर इंस्पेक्टरों पर गाज गिराते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया गया है. वहीं मुख्यमंत्री ने भी आश्वासन दिया है कि इस हादसे में शामिल किसी भी दोषी या रसूखदार व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा. लेकिन हकीकत यह है कि यह सस्पेंशन का खेल हर हादसे के बाद शुरू होता है, जबकि मुख्य गुनहगारों तक आंच नहीं पहुंचती.

जांच पर भी उठे सवाल, आरोपी ही करेंगे मामले की जांच

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ यह है कि जिस प्रशासनिक तंत्र की नाक के नीचे यह पूरा खेल हुआ, जांच की कमान भी उन्हीं के हाथों में दे दी गई है. इस मामले की मजिस्ट्रियल इंक्वायरी के आदेश साउथ दिल्ली के डीसी (DC) को दिए गए हैं, जबकि कायदे से इस लापरवाही के लिए सबसे पहले जांच के दायरे में खुद साउथ दिल्ली के डीसी और एमसीडी के बड़े अधिकारियों को होना चाहिए था. तमाम लिखित शिकायतों के बावजूद समय रहते कदम न उठाना सीधे तौर पर सिस्टम की साठगांठ को उजागर करता है.

दिल्ली में अभी भी मंडरा रहा है खतरा

यह साकेत का हादसा दिल्ली में कोई पहला ऐसा मामला नहीं है, जहां अवैध कंस्ट्रक्शन के कारण मासूमों की बलि चढ़ी हो. दिल्ली के कई इलाकों में आज भी अफसरों, बिल्डरों और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत और लेनदेन का यह खेल धड़ल्ले से चल रहा है और कई इमारतें मौत का कुआं बनी हुई हैं.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस दर्दनाक हादसे के बाद भी क्या प्रशासन जागेगा या फिर दिल्ली की जनता को ऐसे ही भ्रष्टाचार और लापरवाही की वेदी पर अपनी जान गंवानी पड़ेगी. सरकार और प्रशासन आगे ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या कड़े कदम उठाता है, यह देखना अभी बाकी है.

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